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दूसरा पहलू: संस्कृत के 230 श्लोकों में दो हजार साल की पान की परंपरा, पान की शान के तो कहने ही क्या!

Mon, 20 Jul 2026 10:14 AM IST
ज्योति भास्कर भूपेंद्र कुमार, अमर उजाला।

सार

तारीख के जर्द पन्नों में पान की कितनी ही दास्तानें छिपी हैं। तुलसीदास से लेकर अमीर खुसरो ने अपनी रचनाओं में इसे स्थान दिया है। संस्कृत ग्रंथ तांबूल  मंजरी  तो जैसे पान का एनसाइक्लोपीडिया है। इस ग्रंथ के 230 श्लोकों में दो हजार साल की पान की परंपरा को समेटा गया है।
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कई सौ वर्ष पुरानी है पान पत्ते की कहानी (सांकेतिक) - फोटो : AI
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विस्तार
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16वीं सदी में सैयद उसमान ने अपनी रचना चित्रावती  में पान को बंगाल की नियामत माना है। वहीं फ्रांसीसी यात्री बर्नियर लिखते हैं कि पान को चूने व कई खुशबूदार जड़ी-बूटियों से तैयार किया जाता था। ौोजरा से पान के बीड़े की भला क्या औकात होती है, लेकिन जब यह बीड़ा उठाना पड़ जाए, तो वीरता और शौर्य की गाथा लिख दी जाती है।

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तारीख के जर्द पन्नों में पान की कितनी ही दास्तानें छिपी हैं। पान आम भी है और खास भी। पान के बारे में जिक्र सबसे पहले चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में मिलता है। पान शब्द संस्कृत के पर्ण से आया है, जिसका अर्थ होता है पत्ता।  पान की शान के तो कहने ही क्या। एक मुगल शहजादी को तो पान खर्च के नाम पर सूरत के समृद्ध बंदरगाह से होने वाली लाखों की आमदनी ही सौंप दी गई।

तुलसीदास ने रामचरितमानस में पान का जिक्र किया है, जब राजा जनक पान के बीड़े से राजा दशरथ का स्वागत करते हैं। वहीं मलिक मोहम्मद जायसी ने पद्मावत में पान की महिमा का बखान किया है। जब पद्मिनी से मिलने राजा रतन सेन पहुंचे, तो उनका स्वागत पान से ही किया गया। संस्कृत ग्रंथ तांबूल मंजरी तो जैसे पान का एनसाइक्लोपीडिया है। इस ग्रंथ के 230 श्लोकों में दो हजार साल की पान की परंपरा को समेटा गया है।
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1334 से 1341 ईस्वी तक भारत में रहे मोरक्को के यात्री इब्ने बतूता ने लिखा है कि पान को अंगूरों की तरह उगाया जाता है। बतूता लिखते हैं कि दिल्ली के सुलतान मोहम्मद बिन तुगलक के दरबार में रात के भोजन के बाद सभी को पान दिया जाता था। वहीं 14वीं सदी के महान जनकवि अमीर खुसरो ने अपनी एक मुकरी में लिखा है, मुंह आए तो रस बरसावे, तन-मन की सब तपन बुझावे, अधर लगावत रस की खान, क्यों सखि साजन? न सखि, पान।

इतिहासकार अबुल फजल लिखते हैं, बादशाह अकबर के लिए आगरा में खास तौर पर पान उगाए जाते थे। आइन ए अकबरी में उन्होंने लिखा है, पान खाकर भूख मिट जाती है, तो कभी पान खाने से भूख लगने लगती है। 16वीं सदी में सैयद उसमान ने अपनी रचना चित्रावती में पान को बंगाल की नियामत माना है। वहीं फ्रांसीसी यात्री बर्नियर लिखते हैं कि पान को चूने और कई खुशबूदार जड़ी-बूटियों से तैयार किया जाता था।

वेनिस से 1656 में सूरत बंदरगाह पहुंचे इतालवी यात्री निकोलो मनुची का विवरण तो बेहद दिलचस्प है। जलपोत से उतरते ही हर किसी को मुंह से लाल रंग की पीक छोड़ते देख उन्हें लगा यह खून है और यहां महामारी फैली हुई है। हालांकि बाद में उनकी भ्रांति दूर हो गई। राजपूतों में पान शौर्य और वीरता का प्रतीक था। पान का बीड़ा उठाने का मतलब था असंभव चुनौती को भी स्वीकार कर लेना। यानी पान एक और मिजाज हजार।

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