कर्नाटक की राजधानी बंगलूरू में आईपीएल में रॉयल चैलेंजर्स बंगलूरू (आरसीबी) की जीत का जश्न मातम में तब्दील हो गया और स्टेडियम के बाहर मची भगदड़ में 11 निर्दोष लोगों की जानें चली गईं, इसके पीछे प्रशासनिक लापरवाही तो है ही, असल कारण खेल में मिली जीत को परोक्ष रूप से राजनीतिक विजय में तब्दील करने की घटिया सोच है।
कर्नाटक में फिलहाल कांग्रेस की सरकार है, लेकिन दुर्भाग्य से आज भारत में कोई भी राजनीतिक पार्टी इस निम्नस्तरीय सोच और उसे जल्द से जल्द राजनीतिक रूप से भुनाने की दूषित मानसिकता से मुक्त नहीं है। वरना कोई कारण नहीं था कि आईपीएल फाइनल के दूसरे ही दिन आनन- फानन में बिना समुचित प्रबंध और आयोजना के आरसीबी की विक्ट्री परेड निकाली जाए।
गनीमत थी कि पुलिस के इंकार के बाद वह रद्द हो गई और कार्यक्रम स्टेडियम में विजेता टीम के स्वागत तक सीमित हो गया। स्वागत भी ऐसा, जिसे स्वीकार कर अब आरसीबी टीम खुश होने के बजाए शर्मिंदा ज्यादा है।
कुंद होती संवेदनाएं
आज राजनेताओं की संवेदनाएं कितनी कुंद हो चुकी है, यह इस बात का निकृष्ट उदाहरण है कि जब सारा देश मीडिया के माध्यम से जिस चिन्नास्वामी स्टेडियम के बाहर भगदड़ में कुचले मृत शरीरों और घायलों को निकाले जाते देख रहा था, वहीं स्टेडियम के भीतर आरसीबी टीम को मिली जीत की ट्राॅफी हाथों में उठाकर कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी. शिवकुमार गदगद हो रहे थे।
उसी दौरान राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया भी विजेता टीम के साथ फोटो सेशन करवा कर प्रसन्न थे।
क्या सरकार के सूचना तंत्र ने सीएम और डिप्टी सीएम को बाहर घट रहे इस भयंकर हादसे की तत्काल सूचना नहीं दी होगी, क्या स्टेडियम के भीतर स्वागत करवा रहे खिलाडि़यों को भी बाहर हो रही भगदड़ की जरा भी भनक नहीं लगी होगी?
आज जब हर आदमी, हर दूसरे मिनट सोशल मीडिया चेक करने की लत से पीड़ित है, क्या तब स्टेडियम के अंदर मौजूद कोई भी व्यक्ति बाहर दम तोडते खेल प्रशंसको की पीड़ा से संवेदित नहीं था?
कायदे से तो भगदड़ की पहली सूचना मिलते ही आयोजकों को तत्काल स्वागत समारोह रद्द कर हादसे में मृत लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त कर कार्यक्रम समाप्त कर देना चाहिए था। लेकिन ऐसा करने के बजाए कर्नाटक के डीसीएम सफाई दे रहे थे कि हादसे की जानकारी मिलने के बाद कार्यक्रम 10 मिनट में ही निपटा दिया गया?
लेकिन दस मिनट भी क्यों? इसका जवाब न तो कर्नाटक सरकार के पास है और न ही इसकी मूल आयोजक बताई जा रहे आरसीबी टीम की फ्रेचाइंजी कंपनी यूनाईटेड स्पिरिट्स लि. के पास है। हालांकि रात में कंपनी की ओर से मृतकों के प्रति शोक व्यक्त करने की औपचारिकता निभाई गई।
कई सवाल जिसके जबाव का इंतजार
सवाल यह भी उठ रहा है कि आरसीबी ने भले ही 18 साल बाद आईपीएल ट्रॉफी उठाई हो, लेकिन विजेता टीम का भव्य स्वागत करने की इतनी जल्दी क्या थी? बताया जा रहा है कि यह सब इसलिए किया गया कि आरसीबी फ्रेंचाइजी कंपनी सभी विजेता खिलाड़ियों को सम्मानित कर इसे अपने पक्ष में मेगा इवेंट में तब्दील करना चाहती थी। दूसरे, टीम के चार विदेशी सदस्यों को स्वदेश लौटने की जल्दी थी, इसलिए भी ताबड़तोड़ तरीके से यह जश्न आयोजित किया गया।
चूकि इस टीम के नाम के साथ बंगलूरू भी जुड़ा हुआ है, इसलिए इसे कन्नड अस्मिता और वर्चस्व के साथ जोड़ने का परोक्ष राजनीतिक प्रयोग भी हुआ। जबकि हकीकत में आरसीबी न तो किसी कन्नड व्यक्ति की कंपनी है और न ही टीम में कोई कन्नड खिलाड़ी है। मूलत: इस टीम की मालिक बैंक घोटाले में भगोड़े विजय माल्या के पास थी।
विजय जरूर कन्नडिगा हैं, लेकिन बाद में उन्होंने यह कंपनी ब्रिटिश मल्टीनेशनल कंपनी जायंट डिएगो को बेच दी है। अब यूनाइटेड स्पिरिट्स उसी एमएनसी की सहायक कंपनी है। यही नहीं, इस टीम के 11 में से चार खिलाड़ी तो विदेशी हैं और बाकी 7 सात गैर कन्नड और गैर कर्नाटकी हैं। टीम की कप्तानी मप्र के रजत पाटीदार के पास है तो टीम के हीरों विराट कोहली दिल्ली के हैं।