आज हमारा समाज गर्मी से राहत पाने के लिए लगभग पूरी तरह एयर कंडीशनर और रेफ्रिजरेटर जैसे साधनों पर निर्भर हो चुका है। ये उपकरण तुरंत राहत तो देते हैं, लेकिन इन के दुष्प्रभाव भी उतने ही गंभीर हैं। इन से निकलने वाली क्लोरोफ्लोरोकार्बन और हाइड्रोफ्लोरोकार्बन गैसें वातावरण को और अधिक गर्म बना रही हैं, यानी हम जिस चीज से बचने की कोशिश कर रहे हैं, उसी को और बढ़ा भी रहे हैं। यह एक ऐसा दुष्चक्र है, जिसका अंत और अधिक गर्मी के रूप में ही सामने आ रहा है।
ऐसे समय में जब हम इतिहास की ओर देखते हैं तो एक अलग ही तस्वीर दिखाई देती है। हमारे पूर्वज बिना बिजली, बिना कंक्रीट और बिना कृत्रिम साधनों के भीषण गर्मी में भी सहज जीवन जीते थे। उनकी वास्तुकला और जीवनशैली का आधार प्रकृति के साथ संतुलन था, न कि उसका दोहन। यही कारण है कि उनके पास ऐसे कई उपाय थे, जो आज भी हमारे लिए उपयोगी हो सकते हैं।
प्राचीन और मध्यकालीन भारत में घर बनाने के लिए जो सामग्री इस्तेमाल होती थी, वह आज की सीमेंट और कंक्रीट से बिल्कुल अलग थी। कंक्रीट दिन भर की गर्मी को सोखकर रात में भी छोड़ता रहता है, इसलिए घर लंबे समय तक गर्म रहता है। इसके विपरीत, चूना, सुर्खी, उड़द की दाल, मेथी, गूगुल और बेल के गूदे से तैयार मिश्रण का उपयोग किया जाता था।
चूने का लेप सूर्य की किरणों को वापस परावर्तित करता
प्राचीन स्थापत्य ग्रंथ ‘मयमतम्’ और ‘समरांगण सूत्रधार’ में बताया गया है कि चूने का लेप सूर्य की किरणों को वापस परावर्तित करता है। इससे गर्मी घर के अंदर कम प्रवेश करती है। दीवारें मोटी बनाई जाती थीं, जिससे गर्मी को भीतर पहुंचने में काफी समय लगता था। जब तक गर्मी अंदर आती, तब तक बाहर का तापमान कम हो जाता था। यह एक सरल लेकिन प्रभावी तरीका था, जिसे आज हम आधुनिक तकनीक के नाम पर महंगे तरीके से अपनाते हैं।
पत्थर की जालियां हवाओं का सहारा
राजस्थान की हवेलियों और जयपुर के हवा महल में बनी पत्थर की जालियां केवल सजावट के लिए नहीं थीं। वे हवा को ठंडा करने का काम करती थीं। भौतिकी के सिद्धांत, जिसे आज ‘वेंचुरी प्रभाव’ या ‘बर्नौली सिद्धांत’ कहा जाता है, उसके आधार पर जब हवा छोटे छिद्रों से गुजरती है तो उसका तापमान कम हो जाता है।
प्राचीन शिल्पकार इस सिद्धांत को समझते थे और उसका उपयोग भी करते थे। आज हमने अपने घरों को कंक्रीट और कांच से इस तरह बंद कर लिया है कि प्राकृतिक हवा का आना-जाना लगभग खत्म हो गया है। इसका सीधा असर घर के तापमान पर पड़ता है।
बावड़ियां जल प्रबंधन का उदाहरण
जल प्रबंधन और ठंडक का सबसे सुंदर उदाहरण हमें बावड़ियों में देखने को मिलता है। ‘अपरार्जितपृच्छा’ जैसे ग्रंथों में बावड़ियों के महत्व का उल्लेख मिलता है। गुजरात की ‘रानी की वाव’, राजस्थान की ‘चांद बावड़ी’ और दिल्ली की ‘अग्रसेन की बावड़ी’ केवल पानी के स्रोत नहीं थीं, बल्कि गर्मी से राहत देने वाले स्थान भी थीं।
जमीन के नीचे होने के कारण वहां का तापमान ऊपर की तुलना में कम रहता था। पानी के कारण वहां का वातावरण ठंडा बना रहता था। लोग वहां बैठकर गर्मी से राहत पाते थे। यह पूरी तरह प्राकृतिक शीतलन का तरीका था।
घर का आंगन भी है महत्व
पारंपरिक भारतीय घरों में आंगन एक जरूरी हिस्सा होता था। चाहे वह दक्षिण भारत का चेट्टिनाड घर हो, उत्तर भारत के आंगन वाले मकान हों या राजस्थान की हवेलियां, हर जगह आंगन का महत्व था। दिन में जब घर के अंदर की हवा गर्म होती थी तो वह ऊपर उठकर आंगन से बाहर निकल जाती थी और उसकी जगह बाहर की ठंडी हवा अंदर आ जाती थी। यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती थी और घर को ठंडा बनाए रखती थी। आज फ्लैट संस्कृति में आंगन पूरी तरह खत्म हो गया है, जिससे हवा का प्रवाह रुक गया है और गर्मी घर के अंदर ही फंस जाती है।
खस के पर्दों से ठंडी हवा
आज के कूलर से पहले खस के पर्दों का उपयोग होता था। बाणभट्ट की ‘कादम्बरी’ और ‘हर्षचरित’ में इसका उल्लेख मिलता है। इन पर्दों पर पानी डाला जाता था और जब हवा इनके बीच से गुजरती थी, तो ठंडी हो जाती थी। साथ ही, इससे वातावरण में सुगंध भी फैलती थी। यह तरीका पूरी तरह प्राकृतिक और स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी था।
कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में भी भवनों को ठंडा रखने के लिए जल नलिकाओं का उल्लेख मिलता है। महलों की दीवारों के भीतर से पानी बहाया जाता था, जिससे दीवारें ठंडी रहती थीं। साथ ही, फव्वारों के माध्यम से वातावरण को संतुलित रखा जाता था।
मिट्टी, गोबर और भूसे से बनी दीवारें गर्मी रोकती थीं
ग्रामीण भारत में भी स्थानीय सामग्री से बने घर गर्मी से बचाने में सक्षम थे। ‘कृषि-पाराशर’ और लोक परंपराओं में इसका उल्लेख मिलता है। मिट्टी, गोबर और भूसे से बनी दीवारें गर्मी को रोकती थीं, जबकि छप्पर की छतें घर को ठंडा रखती थीं। गर्मी से बचाव केवल भवनों तक सीमित नहीं था, बल्कि जीवनशैली भी इसमें महत्वपूर्ण थी।
‘चरक संहिता’ और ‘सुश्रुत संहिता’ में ग्रीष्म ऋतु के लिए विशेष आहार और दिनचर्या का उल्लेख है। सत्तू, छाछ, बेल का शरबत, कच्चे आम का पन्ना जैसे पेय शरीर को ठंडा रखते थे और लू से बचाते थे। इसके विपरीत, आज के ठंडे पेय शरीर को अस्थायी राहत तो देते हैं, लेकिन लंबे समय में नुकसान भी पहुंचाते हैं।
घर की दिशा और वृक्षों का नाता
प्राचीन भारत में नगरों और रास्तों का नियोजन इस प्रकार किया जाता था कि प्रकृति स्वयं छाया और शीतलता प्रदान करे। 'वराहमिहिर' की 'बृहत्संहिता' ग्रंथ के 'वृक्षायुर्वेद' अध्याय में स्पष्ट बताया गया है कि घर के किस दिशा में कौन सा वृक्ष होना चाहिए? उत्तर और पश्चिम दिशा में घने और बड़े पत्ते वाले वृक्ष, जैसे बरगद, पीपल, नीम, गूलर, लगाने का विधान था, ताकि दोपहर और संध्याकाल की तीखी धूप सीधे घर की दीवारों पर न पड़े।
प्राचीन नगरों की सड़कें पूरी तरह सीधी नहीं होकर हल्की घुमावदार बनाई जाती थीं, ताकि हवा का वेग बना रहे और सूर्य की सीधी किरणें लंबे समय तक सड़क की सतह को गर्म न कर सकें। सड़कों के दोनों ओर छायादार वृक्षों की कतार होती थीं, जिससे राहगीरों को कभी लू की चपेट में नहीं आना पड़ता था।
आधुनिक तकनीक को पारंपरिक तरीकों से जोड़ें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील हमें यह याद दिलाती है कि समाधान कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारी अपनी परंपराओं में ही मौजूद है। यह जरूरी नहीं कि हम पूरी तरह पुराने समय में लौट जाएं, लेकिन यह जरूरी है कि हम उनसे सीखें। आधुनिक तकनीक के साथ यदि हम इन पारंपरिक तरीकों को जोड़ें, तो हम एक बेहतर और संतुलित जीवन जी सकते हैं। हमें यह समझना होगा कि प्रकृति के साथ संतुलन ही असली विकास है और उसी में हमारे भविष्य की सुरक्षा भी छिपी हुई है।
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