देश के अमृतकाल में ये एक सुखद संकेत है कि पगडण्डी के अंतिम छोर पर खड़े हिन्दुस्तानी की कहानी भी अब जगह बनाने लगी है।
- फोटो : डॉक्टर आशीष कौल
मैं बस्तर: द नक्सल स्टोरी को किसी सियासी चश्मे की बजाये उस सृजनात्मक लेंस से देखना पसंद करूँगा जहां आखिर सुदूर झारखंड, छत्तीसगढ़, केरला के गाओं मोहल्लों के नाम, उनकी समस्याएं, उनकी खुशियां मुंबई-दिल्ली होती हुई समस्त विश्व में पहुँच रही हैं। निर्माता अब सिर्फ रिस्क नहीं ले रहा, वो ऐसी कार्ययोजना भी गढ़ रहा है कि जिस से कम से कम इन मुद्दों पर बातचीत नए सिरे से शुरू हो।
'हम कलाकारों को भी अब इस तरह की कहानियां जोशपूर्ण प्रोत्साहन दे रही हैं, क्यूंकि हमें भी लगता है कि सिर्फ पात्र नया नहीं है, उस पात्र के ज़रिये हम उस पात्र और कहानी को दुनिया तक सही ढंग से ले जाने की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं। 'कहते हुए कंपनी। बुद्धा इन ट्रैफिक जैम , पेज 3 , एक हसीना थी जैसी फिल्मों मके बाद 'बस्तर द नक्सल स्टोरी में आई जी के सचिव 'श्रीवास्तवजी ' का बेहतरीन किरदार निभाने वाले गोपाल के सिंह बड़े दिलचस्प ढंग से कहानी, कलाकार और चुनौतियों की बात कह जाते हैं।
ये चुनौतियां अब अक्सर कलाकारों को झेलनी होंगी क्यूंकि जनता भी इन ज़मीनी कहानियों में खुद को पहचानने लगी है , फिर चाहे वो बॉलीवुड में बनी'१२वी फेल हो' या OTTपर पंचायत जैसा मीठा कटाक्ष। अब कलाकार भी वो ही चलेगा जो इन जमीनी कहानियों को अपना सा लगेगा। अब वो बात पुरानी हुई कि जो बिक जाये वो हिट। जनता ने अपनी पसंद न पसंद बताकर जता दिया है कि और भी गम हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा। देश के अमृतकाल में ये एक सुखद संकेत है कि पगडण्डी के अंतिम छोर पर खड़े हिन्दुस्तानी की कहानी भी अब जगह बनाने लगी है।
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नोट : लेखक डॉक्टर आशीष कौल, वरिष्ठ मीडिया कर्मी होने के साथ साथ शोध कर्मी हैं जिन्होंने सिनेमा और समाज के अन्तर्सम्बन्धों से जुड़े आयामों पर शोध परख काम किये हैं। आशीष कश्मीर से जुडी चार बेस्टसेलर किताबों के लेखक भी हैं।
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