बागों में छाया बावरा वसंत और मन में छा रहीं हरी-भरी स्मृतियां
- फोटो : अमर उजाला
वसंत पंचमी के दिन स्कूल और घर दोनों जगह पर मां सरस्वती का पूजन होता। स्कूल में मिलता चने-चिरौंजी और गुड़ के लाई (परमल) वाले लड्डू का प्रसाद या तिल्ली-मूंगफली की चिक्की। साथ में होती सरस्वती वंदना जो अब भी याद है। घर आते ही मां थाली में परोसती गरम-गरम केसर भात। आज भी घर में ये परम्परा जारी है और उस भात की खुशबू यादों में बसी हुई है।
बंगाली समुदाय में भी इस पर्व का खास महत्व होता है। इस दिन को सरस्वती पूजन के रूप में मनाया जाता है। कुछ साल पहले एक परिचित परिवार ने मुझे इस अवसर पर आमंत्रित किया था। पीले वस्त्रों के साथ मां सरस्वती की पूजन के अवसर पर आती धूप की खुशबू ने पूरे माहौल को पवित्र बना दिया।
लोग खुशी से एक दूसरे को बधाइयां दे रहे थे। पूजा के बाद मिली खिचुरी (दाल-चावल की खिचड़ी) और पायेश (खीर) का प्रसाद। बहुत सात्विक तरीके से खड़े मसालों से बनी इस खिचुरी और गोविंदभोग नामक चावल व गुड़ से बनी उस पायेश का स्वाद आज भी मन में ताजा है क्योंकि वह जुबान से उतरकर सीधे मन मे बस गया था।
बाद में पता चला कि वो सारा भोग पुरुषों ने मिलकर बनाया था और यह उनका हर सरस्वती पूजन का विधान था ताकि महिलाओं को भी एक दिन रसोई की जिम्मेदारी से निवृत्त होकर आनंद से उत्सव मनाने का मौका मिल सके। साथ ही पुरुषों को यह समझने का अवसर मिले कि महिलाएं किस प्रकार हर रोज रसोई में बिना शिकायत किये काम करती हैं।
बंगाली समाज में देवी पूजन सबसे अधिक महत्वपूर्ण अवसर होता है। इसी तरह कला और विद्या की देवी सरस्वती के प्रति आभार प्रकट करने के लिए भी वसंत पंचमी का त्योहार बहुत धूमधाम से मनाया जाता है।
कुछ साल पहले घर में सरस्वती पूजन का आयोजन था। यह मेरे बेटे के लिए पहला अवसर था माँ शारदा की पूजन का। हमने उसे प्रथम अक्षर लिखवाया और पुस्तकों व पेन के साथ ही पेड़-पौधों को भी प्रणाम करने को कहा। प्रश्न आना लाजमी था कि सरस्वती देवी तो विद्या की देवी हैं उनका पूजन और कॉपी-पेन को प्रणाम समझ आता है लेकिन ये पौधों और फूलों को प्रणाम क्यों?
जब उसको समझाया गया कि वसंत ऋतु का क्या अर्थ है और क्यों प्रकृति के प्रति हमारा सम्मान दर्शाना जरूरी है, तो उसने झट से कहा-"अच्छा मतलब आज फ्लॉवर्स और ट्रीज़ का भी बर्थडे है।" और उसकी इस बात ने बहुत बड़ा सन्देश दे दिया। चाहे जिस भी रूप में हो, प्रकृति का यह जन्मदिन प्रकृति के संरक्षण की भावना ऐसे परिपूर्ण होना चाहिए। नई पीढ़ी अगर इस तरह से भी प्रकृति से जुड़ी रहे तो यह एक सकारात्मक परम्परा होगी।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।