फिश पॉयजन ट्री या सी पॉयजन ट्री, जिसे वनस्पति विज्ञान में बैरिंगटोनिया एशियाटिका के नाम से जाना जाता है, अपने मजेदार और रोचक प्राकृतिक गुणों के लिए प्रसिद्ध है।
पौधे का आकार और प्राकृतिक वास
यह छोटे से माध्यम आकार के होते हैं जिसकी ऊंचाई ७–२५ मीटर की हो सकती है। इसकी शाखाओं के सिरों पर पत्तों के बड़े रोसेट विशेष रूप से आकर्षक होते हैं। इनकी छतरी लगभग बराबर फैली होने हेतु ये बहुत छायादार होते हैं। इसकी पत्तियाँ संकरी, तिरछी, २०-४० सी.मी लंबी और १०-२० सी.मी चौड़ी होती हैं। युवा पत्तियों पर गुलाबी नसें पत्तों के सुंदर कांस्य रंग को और सुनहरा बनाते हैं। पर्याप्त वर्षा और आर्द्रता वाले द्वीप और तटीय क्षेत्र जैसे पश्चिमी प्रशांत और हिंद महासागर के द्वीप इसके वास के लिए उपयुक्त हैं। यह कई मैंग्रोव जंगलों का भी मूल निवासी है। मुंबई की तटीय सड़कों पर इन्हें कतारों में देखा जा सकता है।
विशिष्ट फल और फूल
उत्पादित फलों के विशिष्ट लालटेन आकार के कारण इसे बॉक्स फ्रूट के नाम से भी जाना जाता है। फल के भीतर असंख्य वायु कक्ष इसे अत्यधिक उछालदार और जल-प्रतिरोधी बनाते हैं। जमीन पर गिरे पके हुए फली के गुच्छे, किसी किनारे पहुंचने तक, समुद्री लहरों द्वारा सैंकड़ों मीलों तक बहते हैं। समुद्र में बहने वाले बीजों और फलियों में से यह सबसे व्यापक हैं क्योंकि यह समुद्र की सतह पर कई सालों तक जीवित रह सकते हैं। फलियाँ भूमि पर आते हैं और उष्णकटिबंधीय वर्षा के जल से पोषित होकर ज्वालामुखी मिट्टी में आसानी से अंकुरित हो जाते हैं।
इसके तारकिय आकार के फूल गुलाबी रंग के साथ सफ़ेद पुंकेसर की मनमोहक पफ बॉल जैसी दिखती हैं। पुंकेसर लाल या गुलाबी भी हो सकते हैं। यह रात में खुलते हैं और अपनी आकर्षक खुशबू से बड़े पतंगों और चमगादड़ों को आकर्षित करते हैं। अगली सुबह, आमतौर पर, फूल के पुंकेसर ज़मीन पर बिखरे हुए पाए जाते हैं।
पतंगे द्वारा परागण
सुगंधित, फैले हुए आकर्षक फूल रात में आने वाले आगंतुक जैसे चमगादड़ एवं कीट पतंगों को आकर्षित करते हैं। यह पेड़ अन्य प्राणियों के दिखावटी संभोग नृत्य के बराबर है। ‘अटैकस एटलस’ के नाम से एक पतंगा इसी का एक नमूना है। अपना सीमित जीवनकाल यह अपनी साथी की तलाश में बिताता है क्योंकि ऐसी स्थिति में प्रजनन ही एकमात्र उपाय है। हालांकि, यह अनजाने में परागणकर्ता के रूप में भी काम करता है। एटलस पतंगे के १० इंच पंखों के ऊपरी सिरे पर साँप के फन जैसे आकार बने हुए हैं। ऐसे बड़े, पारदर्शी सफ़ेद निशानों के कारण यह संभाव्य शिकारियों से बचाता है और इसलिए यह पतंगा वास्तव में बहुत प्रभावी है।
पर्यावरणीय लाभ एवं औषधीय उपयोग
ये पौधे जलाशयों के किनारे उगाई जाती हैं जिससे भूमि को अधिक निर्जलित होने में मदद मिले। अत्यधिक उछालदार होने के कारण यह मछली पकड़ने के जाल के लिए उपयुक्त हैं। इस पेड़ की लकड़ी का उपयोग भवन निर्माण तथा डोंगियां बनाने में किया जाता है। इसे भारत के कुछ हिस्सों में सजावट और छायादार उद्देश्यों के लिए सड़कों के किनारे उगाया जाता है।
पौधे के विभिन्न अंगों में मौजूद विषाक्त पदार्थों की वजह से यह मछलियों के लिए जहरीला होता है। इसमें अधिक मात्रा में सैपोनिन (एक अणु जिसमें डिटर्जेंट के गुण होते हैं) रहता है जो पौधों द्वारा स्वाभाविक रूप से निर्मित होते हैं। सैपोनिन कुछ हद तक ज़हरीला होता है और कोशिका मृत्यु को भड़काता है। ज़हर को निकालने हेतु बीजों एवं पौधे के अन्य हिस्सों को पीसकर, गूदा बनाकर या कद्दूकस करके इस्तेमाल किया जाता है। सूखे बीजों की फलियों को पीसकर मछलियों को अचेत करके आसानी से पकड़ने के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिस कारण इसका नाम ‘मछली जहर का पेड़’ पड़ा।
हालांकि, सैपोनिन ज़हर केवल मछलियों के तंत्रिका तंत्र को ही निशाना बनाता है, इसलिए मछली का मांस को खाने हेतु सुरक्षित है। स्थानीय लोग आंतों के कीड़ों से छुटकारा पाने के लिए भी फली के विषैले बीजों का उपयोग करते थे। सैपोनिन का प्रयोग दो गंभीर कीट, गोभी के कैटरपिलर या इल्ली और एडीज मच्छर (जो उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में डेंगू बुखार और मलेरिया फैलते हैं) के विरुद्ध कीटनाशक के रूप में किया जाता है।
इसके फलों, पत्तियों और बीजों का आयुर्वेदिक और जड़ी-बूटियों में उपयोग किया जाता है। इस पौधे के सामयिक अनुप्रयोग के साथ स्टोनफिश (नोहू) के डंक, मोच, सिरदर्द इत्यादि का इलाज किया जाता है। बीजों का उपयोग आंतों के कीड़ों से छुटकारा पाने के लिए किया जाता है। पत्तियों को सावधानी से पकाकर घाव या पुराने संक्रमण के इलाज के लिए त्वचा पर भी लगाया जाता है। पौधों के अर्क अपने एंटीफंगल और एंटीमाइक्रोबियल गुणों के लिए जाने जाते हैं।
ये प्रथाएं आज भी इस्तेमाल की जाती हैं। वैज्ञानिक इस पौधे के औषधीय गुणों के साथ प्रयोग करना जारी रखें हैं क्योंकि इसके इस्तमाल से चूहों में ट्यूमर की वृद्धि को कम करने में मदद मिली है।
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