विजय जड़धारी ने अस्सी के दशक के आसपास ‘बीज बचाओ आंदोलन’ की भी शुरुआत की थी। इसकी प्रेरणा उन्हें ‘चिपको आंदोलन’ से मिली थी, जिसके वह कार्यकर्ता थे। परंपरागत देसी बीजों के लुप्त होने से चिंतित होकर उन्होंने बीजों के संरक्षण व संवर्धन का काम शुरू किया था। हेंवलघाटी के गांवों से शुरू हुई यह पहल अब देशभर में फैल चुकी है। विजय बताते हैं कि शुरुआत में जब वह गांवों में देसी बीजों की तलाश करने जाते थे, तब लोग उनका मजाक उड़ाते थे। वह आगे कहते हैं कि बारहनाजा का शाब्दिक अर्थ बारह अनाज है, पर इसके अंतर्गत बारह से ज्यादा अनाज आते हैं। मंडुआ बारहनाजा परिवार का मुखिया कहलाता है। जब गेहूं नहीं था, तब लोग मंडुआ की ही रोटी खाते थे। पोषण की दृष्टि से यह बहुत पौष्टिक है। वह बताते हैं कि बारहनाजा मिश्रित फसल पद्धति है। इसकी फसलें अलग-अलग होते हुए भी एक-दूसरे की सहायक हैं। बारहनाजा की फसलों की बुआई मई-जून में, जबकि कटाई सितंबर-अक्तूबर में होती है। यह बिना लागत वाली खेती है। बीज खुद किसानों का होता है, जिसे वे घर के बिजुड़े (पारंपरिक भंडार) से लेते हैं। पशुओं व फसलों के अवशेष से जैविक खाद मिल जाती है। परिवार के सदस्यों की मेहनत से फसलों की बुआई, निराई-गुड़ाई, देखरेख व कटाई आदि हो जाती है। बारहनाजा जैसी मिश्रित पद्धतियों में प्रतिकूल परिस्थिति में भी किसानों को कुछ न कुछ मिल जाता है, जबकि एकल फसलों में पूरी फसल का नुकसान होता है।
कुल मिलाकर, बारहनाजा की फसलों से प्रकृति को बिना नुकसान पहुंचाए पैदावार बढ़ाई जा सकती है। इससे पशुपालन व कृषि का समन्वय किया जा सकता है। इससे गांवों में स्थाई, टिकाऊ खेती से आजीविका व भोजन सुरक्षा की जा सकती है। दीर्घकालीन दृष्टि रखकर मिट्टी व पानी का संरक्षण भी किया जा सकता है। ऐसी पद्धतियां सूखे में भी उपयोगी हैं। ऐसी कई और मिश्रित पद्धतियां भी हैं, जो देश में अलग-अलग नामों से प्रचलित हैं। ये किसानों को आत्मनिर्भर बनाने में भी उपयोगी साबित हो सकती हैं।