अमेरिका, जिसके खुद तख्ता पलट साजिश में शामिल होने की आशंका है, उसने भी बांग्लादेश में हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है।
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मुस्लिम लीग ने उस दिन आम हड़ताल का आह्वान किया था, जिसका कांग्रेस और हिंदूवादी संगठनों ने विरोध किया। इसके बाद अविभाजित बंगाल के कोलकाता, नोआखाली व आसपास के इलाकों में भयंकर मारकाट शुरू हो गई, जिसमें करीब 4 हजार लोग मारे गए। 1 लाख से ज्यादा घायल हुए। हालांकि, इस हिंसा को शुरू करने को लेकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने एक दूसरे पर आरोप लगाए थे। लेकिन मानो यही काफी नहीं था।
देश में हिंसा का दूसरा दौर आजादी के समय शुरू हुआ। 14 और 15 अगस्त की आधी रात को पूर्व का अखंड भारत, भारत और पाकिस्तान नामक धर्म के आधार पर दो देशों में विभाजित कर दिया गया। शुरू में दोनों देशों का स्वतंत्रता दिवस एक ही था। लेकिन बाद में पाकिस्तान 14 अगस्त को अपना ‘यौम- ए- आजादी’ घोषित किया। उसी दिन कराची में सत्ता का हस्तांतरण पाकिस्तान मुस्लिम लीग को हुआ था।
1971 में पाकिस्तान से अलग होकर नवोदित बांग्लादेश बना और पूर्व में पाकिस्तान बनने वाली पाकिस्तान मुस्लिम लीग भी अप्रासंगिक हो गई। वहां 8 अगस्त 1976 को नई ‘बांग्लादेश मुस्लिम लीग’ नामक पार्टी की स्थापना हुई। अब यह पार्टी भी तीन धड़ो में बंट गई है और बांग्लादेश में वो कोई बड़ी राजनीतिक ताकत नहीं है। उसकी विचारधारा को आगे बढ़ाने का काम अब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमायते इस्लामी कर रही हैं।
यह भी विडंबना है कि जिस आधुनिक बांग्लादेश की स्थापना शेख मुजीबुर्रहमान ने की थी और जिन्हें आदर के साथ वहां ‘राष्ट्रपिता’ कहा जाता है, उनकी हत्या भी 15 अगस्त 1975 को हुई थी। और अब 5 अगस्त को बांग्लादेश में उनकी मूर्तियां तोड़ दी गईं। किसी देश के नागरिकों द्वारा अपने ही राष्ट्रपिता का यह अपमान हैरान करने वाला है। यह बात अलग है कि शेख मुजीब खुद 1947 में पाकिस्तान बनवाने वाली मुस्लिम लीग के सक्रिय युवा नेता थे। फिर भी बांग्लादेश के लोगों की नाराजी शेख हसीना और अवामी लीग के प्रति हो सकती है, लेकिन मुजीबुर्रहमान की मूर्तियां तोड़ने का क्या मतलब है?
भारत और बांग्लादेश, आखिर क्या रुख होगा सरकार का?
इधर भारत में तीन साल पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 14 अगस्त को विभीषिका दिवस मनाने का ऐलान किया था, तब उसकी आलोचना यह कहकर की गई थी कि वो देश विभाजन की हिंसक त्रासदी की यादों को फिर से जिंदा कर नए सिरे से साम्प्रदायिक नफरत फैलाना चाहते हैं। बेशक बुरी यादों को सहेजना कोई भी नहीं चाहता। लेकिन यह भी कड़वा सच है कि 14 अगस्त 1947 को भड़के दंगों में अकेले कोलकाता में ही 500 हिंदू मारे गए थे।
कोलकाता और नोआखाली में भड़के भयंकर साम्प्रदायिक दंगों को रुकवाने महात्मा गांधी को वहां जाना पड़ा। उसके बाद हिंसा थमी। अब 5 अगस्त 2024 को बांग्लादेश में राजनीतिक आंदोलन के समानांतर जो साम्प्रदायिक हिंसा देखने को मिली, वह इस बात की झलक जरूर है कि 14 अगस्त 1947 को तत्कालीन भारत में क्या और कैसे हुआ होगा, खासकर बंगाल और पंजाब में जहां भीषण रक्तपात हुआ। पंजाब में तो 2 लाख लोग मारे गए और 20 लाख लोग बेघर हुए।
दूसरा नैरेटिव परोक्ष रूप से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी कार्यशैली पर कटाक्ष है। अर्थात् उन्होंने जनता की बात नहीं सुनी और अपने हिसाब से ही काम करते रहे तो हालात भारत में भी बिगड़ सकते हैं। हम जिसे ‘तख्ता पलट’ कह रहे हैं, बांग्लादेश में उसे ‘नई क्रांति’ कहा जा रहा है। हालांकि, भारत और बांग्लादेश के राजनीतिक, सामाजिक चरित्र में बहुत अंतर है। एक आजादी का आंदोलन अलग रखें तो यहां कोई भी आंदोलन एक साथ समूचे देश को अपनी चपेट में नहीं ले सका है।
बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों में सेना कभी परोक्ष तो कभी प्रत्यक्ष रूप से सत्ता का संचालन करती रही है। भारत में वैसा नहीं है। हमारी व्यापक विविधता और विशालता और संप्रभुता ही हमारा आत्म अंकुश है। यहां कई बार बड़े राजनीतिक आंदोलन हुए हैं, जातीय हिंसा भी हुई हैं, साम्प्रदायिक दंगे भी हुए हैं, लेकिन उसकी व्याप्ति सीमित क्षेत्र तक ही रही है। चुनावों के अलावा सत्ता परिवर्तन का कोई भी औजार यहां आसानी से काम नहीं कर सकता।
अगर शेख हसीना की तरह येन केन प्रकारेण सत्ता में बने रहने की प्रवृत्ति हावी हुई तो सबसे पहले जनता ही आपका साथ छोड़ेगी, यह तय है। लेकिन भारत में उसका तरीका अलग होगा। यहां मोदी को हटाना होगा तो जनता ही हटाएगी और दूसरे किसी को लाना होगा तो जनता ही लाएगी। कोई नैरेटिव सेट करने के पहले हमे अपनी आत्मशक्ति और आंतरिक चरित्र की ताकत को कम आंकने की भूल नहीं करनी चाहिए।
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