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बांग्लादेश हिंसा, हिंदू और 1971: इतिहास खुद को दोहरा रहा है लेकिन हैरानी में डालती है विश्व समुदाय की खामोशी

सार

भारत सरकार को यूएनओ के माध्यम से तुरंत बांग्लादेश की हिंसा रुकवाने के लिए पहल करनी चाहिए। दंगाईयों को हिंदुओं का कत्लेआम रोकने की चेतावनी देनी चाहिए। जरूरत पड़े तो प्रभावी हस्तक्षेप करने से भी पीछे नहीं हटना चाहिए।
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बांग्लादेश में अशांति के कारण चिंताजनक हालात (फाइल) - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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पड़ोस के बांग्लादेश में दंगाई हिंसा का नंगा नाच कर रहे हैं और पूरा विश्व खामोशी से तमाशा देख रहा है। हस्तक्षेप करना तो दूर शांति की एक अपील तक किसी ने नहीं की! बांग्लादेश की सेना और पुलिस दंगाईयों को संरक्षण दे रही है, वहां की हिंसा 1971 के पाक सेना के अत्याचार और व्यभिचार की याद दिला रही है। तब पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) पाकिस्तान से मुक्ति की लड़ाई लड़ रहा था। उस समय भारत ने अपनी सेना नहीं भेजी होती तो बांग्लादेश का कोई नामलेवा भी नहीं बचता।

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पाक सेना गाजर मूली की तरह बंगाली मुसलमानों को काट रही थी। उनकी महिलाओं से सामूहिक दुष्कर्म खुलेआम किए जा गए थे। उस रेप से जन्में बच्चों की एक पूरी फौज वहां खड़ी हो गई थी। कहीं वे पाक के इशारे पर ऑपरेट तो नहीं कर रहे?

प्रधानमंत्री के सरकारी आवास 'गणबंधन' में घुसकर दंगाईयों ने शेख हसीना के अंतर्वस्त्रों का जिस तरह से सार्वजनिक प्रदर्शन किया, ऐसे ही प्रदर्शन बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के समय पकिरतानी सेना किया करती थी। यह साम्यता अनायास तो नहीं है? इस उपद्रव के तार कहां से जुड़े हैं, इस वाकए से स्पष्ट हो जाता है ?
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दरअसल, जिस मुजीबुर्रहमान (शेख हसीना के पिता) की अगुवाई में बंगाली मुसलमानों ने पाकिस्तान से लड़कर बांग्लादेश बनाया, ढाका में लगी उनकी मूर्ति को भीड़ ने गिरा दिया। उस भीड़ में कौन थे? इतना तो तय है कि वे बांग्लादेशी नहीं हो सकते, तभी अपने राष्ट्रपिता की मूर्ति से इस तरह की बदसलूकी की गई। इसके पीछे दंगाईयों की बंगबंधु  के प्रति घृणा साफ झलकती है। मंदिरों को जलाने और हिंदुओं की हत्या हिंदुस्तान के प्रति उनकी नफरत दर्शाती है। यह नोट करने लायक  है कि किसी मस्जिद या चर्च पर हमले नहीं हुए। 

ढाका के मशहूर हिंदू सिंगर राहुल आनंद के घर में पहले लूटपाट की गई फिर उसे आग के हवाले कर दिया। उनका घर  140 साल पुराना था। यानी वह घर तब बना था जब भारत अखंड था। विभाजन नहीं हुआ था। बांग्लादेश के निर्माण में हिंदुओं और हिंदुस्तानियों का भी खून बहा था, फिर हिंदू और हिंदुस्तान के प्रति इतनी घृणा समझ से परे है। यह किसी बड़ी साजिश की कहानी  कहती है।

भारत सरकार को यूएनओ के माध्यम से तुरंत बांग्लादेश की हिंसा रुकवाने के लिए पहल करनी चाहिए। दंगाईयों को हिंदुओं का कत्लेआम रोकने की चेतावनी देनी चाहिए। जरूरत पड़े तो प्रभावी हस्तक्षेप करने से भी पीछे नहीं हटना चाहिए।

भारत के मुस्लिम संगठनों/ नेताओं को भी आगे बढ़कर शांति की अपील करनी चाहिए। आतंकी संगठन हमास के पक्ष में मुस्लिम संगठन भारत में सड़कों पर उतरे थे, तो निरीह हिंदुओं की हत्या पर क्यों चुप हैं?  सबसे हैरानी हिंदू संगठनों की खामोशी पर होती हैं। विरोध प्रदर्शन तो किया ही जाना चाहिए।

 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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