गौमूत्र पीने से कोविड19 महामारी नहीं होती। इसका क्या किया जाए।
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गौमूत्र पीने से कोविड19 महामारी नहीं होती। इसका क्या किया जाए। संविधान की शपथ लेने वाले सांसद जब इस तरह के बयान देते हैं तो क्या वे संविधान का मखौल नहीं उड़ाते। उसी संविधान का,जिसमें भारत के लोगों के बीच आधुनिक सोच और साइंटिफिक टेंपर विकसित करने का संकल्प लिया गया है। जो लोग शरीरक्रिया विज्ञान की मामूली समझ भी रखते हैं,वे जानते हैं कि हर व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता और बीमारियों का मुक़ाबला करने का एक व्यावहारिक चरित्र होता है।
ऐसे में संभव है गौमूत्र का यूरिया किसी के लिए मुफीद हो,पर वह डेढ़ सौ करोड़ नागरिकों पर लागू होगा,इसकी गारंटी कौन ले सकता है।सांसद के बयान की कड़ी निंदा हुई और देश के जाने माने चिकित्सा विशेषज्ञों ने गहरी हताशा जताई। सांसद की तो छोड़िए।क्या आज भारत का कोई आयुर्वेदिक डॉक्टर गारंटी ले सकता है कि वह गौमूत्र से किसी कोविड पॉजिटिव को ठीक कर सकता है। ज़ाहिर है कि कोई ऐसा दावा नहीं कर सकता।फिर एक लोकसभा सदस्य ऐसी बेतुकी बात कैसे कह सकता है ?
चंद रोज़ पहले एक अंतरराष्ट्रीय चैनल ने भारत की एक ख़बर दिखाई थी।ख़बर में दिखाया गया था कि गाय का गोबर शरीर पर मलने से कोरोना नहीं होता।रिपोर्ट में भारत के एक राज्य के कुछ लोग सामूहिक रूप से मंत्रोच्चार के बीच बदन पर गोबर का लेप कर रहे थे।उस वीडियो में उनका प्रवक्ता दावा कर रहा था कि गोबर लेप से कोरोना दूर भागता है।इसी रिपोर्ट में एक डॉक्टर और इंडियन मेडिकल कौंसिल के हवाले से इस दावे को खारिज़ किया गया था।सरकारी प्रवक्ता ने कहा था कि इसका कोई सुबूत नहीं है कि गोबर के लेप से कोरोना का संक्रमण दूर होता है।
सवाल पूछा जा सकता है कि क्या गोबर का लेप करने वाले अपने परिवार के सदस्यों को भी इस इलाज के लिए राज़ी कर सकते हैं ?ज़ाहिर है कि इस तरह के बेबुनियाद कथनों से हिंदुस्तान की प्रतिष्ठा पर आंच आती है।पश्चिम और यूरोप के लोग यक़ीनन पूछना चाहेंगे कि अगर भारत के पास कोरोना से मुक्ति के लिए गोबर और गौमूत्र जैसी अचूक दवाएं प्रचुर मात्रा में हैं तो फिर तमाम देशों से दवाएं,रॉ मैटेरियल,इंजेक्शन और ऑक्सीजन की भीख हम क्यों मांग रहे हैं।
यदि एलोपैथिक चिकित्सा प्रणाली बेकार है और किसी काम की नहीं है तो भारत सरकार हर प्रांत में ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज याने एम्स क्यों खोल रही है ?जहां भी एम्स काम कर रहे हैं,उनमें भरती के लिए मरीजों को आसमानी ताक़त क्यों लगानी पड़ती है।
भारतीय संसद हर साल एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति से डॉक्टर तैयार करने पर अरबों रुपए क्यों खर्च कर रही है। हमें याद है कि इस देश के एक सिद्धांतवादी प्रधानमंत्री प्रतिदिन स्वमूत्र पान करते थे और उन्होंने लंबी उमर पाई। मगर उन्होंने अपनी आस्था का न तो कभी ढिंढोरा पीटा और न अपनी थैरेपी के कारण अन्य चिकिसा प्रणालियों को खारिज़ किया।उनके कार्यकाल में भी एलोपैथिक इलाज चलता रहा।राष्ट्रपिता महात्मा गांधी स्वयं प्राकृतिक और देसी इलाज में भरोसा करते थे,पर उन्होंने एलोपैथी को कभी नहीं दुत्कारा ।प्रश्न मीडिया पर भी है कि वह ऐसे फिज़ूल के बयानों को स्थान क्यों देता है ?
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