स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती
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अदालत ने नहीं माना वासुदेवानन्द को शंकराचार्य
स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती शरदापीठ के सर्वमान्य शंकराचार्य तो रहे हैं, लेकिन बद्रिकाश्रम स्थित हिमालयी पीठ ज्योतिष्पीठ पर उनके अलावा स्वामी वासुदेवानन्द और माधवाश्रम का भी दावा रहा है। यद्यपि विद्वता में कोई कमी न होने के बावजूद संन्यास से पहले परिवार वाले गृहस्थी होने के कारण स्वामी माधवाश्रम का दावा तो गंभीरता से नहीं लिया गया, मगर स्वामी वासुदेवानन्द ने स्वयं को पूर्व शंकराचार्य की वसीयत के अनुसार जब स्वयं को शंकराचार्य घोषित किया तो शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द ने 1989 में निचली अदालत में मामला दायर कर दिया था। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी जा पहुंचा मगर स्वामी वासुदेवानन्द को कहीं भी राहत नहीं मिली।
कानूनन भी स्वरूपानन्द ही ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य
दशकों की कानूनी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार इस मामले पर इलाहाबाद हाइकोर्ट में सुनवाई हुई और हाइकोर्ट की न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति के.जे. ठाकर की पीठ ने 22 सितम्बर 2017 को निचली आदालत के निर्णय को बरकरार रखते हुए वासुदेवानन्द के शंकराचार्य होने के दावे को खारिज करने के साथ ही शंकराचार्य के रूप में उनके द्वारा चावर, छत्र और सिंहासन का इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी थी जो कि अब भी बरकरार है।
यही नहीं अदालत ने ज्योतिष्पीठ बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य का पद रिक्त घोषित कर अखिल भारत काशी विद्वत परिषद को पंडितों, विद्वानों और तीन अन्य पीठों के शंकराचार्यों की मदद से तीन महीने के भीतर ज्योतिष्पीठ बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य का चयन करने का निर्देश दिया था।
इस आदेश के अनुरूप स्वरूपानन्द सरस्वती पुनः ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य चुने गए। स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती द्वारा जारी एक बयान के अनुसार, ‘‘आदि शंकराचार्य जी ने बौद्धों को परास्त कर वैदिक धर्म की स्थापना की थी। धर्म रक्षा के लिए भारत की चार दिशाओं में चार धर्मपीठ स्थापित किए थे। उत्तर में ज्योतिष्पीठ, दक्षिण में श्रृंगेरी, पूर्व में पुरी व पश्चिम में द्वारका। अयोध्या का क्षेत्र ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य की धर्म सीमा में आता है। ट्रस्ट निर्माता स्वयं पता कर लें कि वर्तमान में ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य कौन है।’’
स्वयंभू शंकराचार्यों की भीड़ से धार्मिक अराजकता
राजस्थान साधू समाज के अध्यक्ष महामण्डलेश्वर स्वामी वीरेंद्रानंद गिरी के अनुसार आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार सर्वोच्च पीठों के चार ही शंकराचार्य हो सकते हैं लेकिन वर्तमान में इन पीठों पर 78 दावेदार हो गए हैं। इनमें राज राजेश्वरानन्द भी हैं जो कि स्वयं को शारदा पीठ का शंकराचार्य बताते हैं।
वीरेन्द्रानन्द गिरी कहते हैं कि ”नकली शंकराचार्यों की बाढ़ से साधू समाज तथा हिन्दू समाज गुमराह हो रहा है, इसलिए समाजसेवी संगठन असली शंकराचार्यों का मार्ग दर्शन लें तथा नकली शंकराचार्यों जो राजनीतिक नेताओं ने बनाए हुए हैं उनका बहिष्कार करें।”जबकि काशी स्थित आद्य गुरु शोध संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष परिव्राजक स्वामी ज्ञानानन्द सरस्वती ने धर्माचार्यों को स्वयं को शंकराचार्य कहलाना बंद करने का सुझाव दिया है। स्वरूपानंद सरस्वती कांची कामकोटि को पूरी पीठ नहीं मानते हैं। इसलिउ उसके पीठाधीश्वर को भी शंकराचार्य नहीं मानते हैं।
महामठाम्नाय के अनुसार शंकराचार्य बनने की शर्तों में बाल ब्रह्मचारी होना और विदेश न जाना भी शामिल हैं।
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आद्यगुरू ने की थी चार दिशाओं में पीठों की स्थापना
लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व शिव गुरु और माता आर्याबा से जन्मे आदि गुरु शंकराचार्य ने बौद्धों को परास्त कर सनातन धर्म की रक्षा के लिए देश की चारों दिशाओं में चार पीठों की स्थापना की थी। इनमें उत्तर में ज्योतिष्पीठ, दक्षिण में श्रृंगेरी, पूरब में गोवर्धन और पश्चिम में शारदा पीठ शामिल हैं।
महामठाम्नाय अनुशासन के अनुसार इन पीठों का उत्तराधिकारी वही हो सकता है जिसमें शुचिता, इन्द्रियों पर नियंत्रण, वेद वेदांग विशारद और सभी शास्त्रों में समन्वय स्थापित करने की क्षमता हो। इनका चयन विद्वत परिषद और धर्म संघ के विद्वानों द्वारा बाकायदा शास्त्रार्थ के बाद किया जाता है।
महामठाम्नाय के अनुसार शंकराचार्य बनने की शर्तों में बाल ब्रह्मचारी होना और विदेश न जाना भी शामिल हैं। वसीयत के आधार पर कोई भी चारों पीठों में से किसी का भी पीठाधीश्वर नहीं बन सकता। मगर कई दर्जन साधुओं द्वारा स्वयं को शंकराचार्य घोषित किए जाने के बाद प्रतीत होता है कि आदि गुरु की परम्परा और करपात्री जी महाराज जैसे धर्म मर्मज्ञों द्वारा स्थापित मान मर्यादाओं का कोई महत्व नहीं रह गया है।
आद्य गुरु शंकराचार्य ने अद्वैतवाद की स्थापना कर चार पीठों की स्थापना की और उनकी तीन उप पीठें भी हुई इस हिसाब से देश में केवल 7 शंकराचार्य हो सकते हैं।
दशनाम सन्यासी परम्परा
प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार आद्य गुरु ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए गठित चार पीठों में अपने चार शिष्य बिठा दिए थे। इनमें पद्मपाद, हस्तामलक, सुरेश्वर और त्रोटक शामिल थे। लेकिन इन चार पीठाधीश्वरों को उन्होंने शंकराचार्य घोषित नहीं किया। इनमें पद्मपाद के शिष्यों के नाम के आगे तीर्थ और आश्रम, हस्तामलक के शिष्यों के नाम के आगे वन और अरण्य या आश्रम, सुरेश्वर के शिष्यों के आगे गिरी, पर्वत और सागर और त्रोटक के शिष्यों के नाम के आगे पुरी, भारती और सरस्वती लगाया गया। इन्हीं दस नामों से सन्यासी दसनाम कहलाता है।
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