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और भी ग़म हैं ज़माने में ‘मुहब्बत’ के सिवा

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उनका इशारा अयोध्या मसले पर सर्वोच्च न्यायालय के उस दिन आने वाले निर्णय की ओर था।  - फोटो : Social Media
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9 नवंबर  की सुबह  लगभग 5.30 बजे मैं प्रयागराज  स्थित अपने घर से वॉक के लिए निकल ही रहा था कि सामने वाले घर से एक बुज़ुर्ग तेज़ी से मेरी ओर आते हुए बोले - आज वॉक पर न जाएं तो बेहतर होगा।

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मैंने बड़ी हैरानी से उनसे पुछा , “कोई ख़ास बात है ?’ वह बोले , “अरे आपको पता नहीं ! आज फ़ैसला आने वाला है। ” उनका इशारा अयोध्या मसले पर सर्वोच्च न्यायालय के उस दिन आने वाले निर्णय की ओर था। रात ट्रेन लेट होने के कारण मैं इंदौर से घर देर से पहुंचा था और शायद इसीलिए यह न्यूज़ मुझसे मिस हो गई थी।

ख़ैर, मैं अंकल का शुक्रिया अदा करते हुए अपने घर के पास वाले पार्क की ओर पैदल निकल पड़ा और वहीं बने आऊटडोर जिम में मैंने साइकिलिंग शुरू कर दी। बगल में ही एयर-वॉकर पर पैरों को तेज़ी से आगे-पीछे करते हुए एक सज्जन जो अक्सर पार्क में आते हैं, मुझे नमस्कार करते हुए बोले, “देखिए आज क्या होता है? “ मैंने उत्तर दिया, “जो भी हो, बस शान्ति बनी रहनी चाहिए।“ इस पर वह भाई साहब बोले , “ भइया! हम-आप कुछ नहीं बोलेंगे , पर ‘वही’ लोग उपद्रव करते हैं।“ मुझे  उनकी इस बात पर हंसी आ गई और मैंने अपनी हंसी छिपाते हुए सिर नीचे कर लिया और अपनी साइकिलिंग की स्पीड बढ़ा दी। 

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आउटडोर जिम से निकलने के बाद मैं वाकिंग-ट्रैक पर आ गया। ट्रैक के बीच स्थित छोटे से  मैदान में कुछ बच्चे फुटबॉल खेलने के लिए जमा हो रहे थे। मैं ट्रैक पर चक्कर लगा रहा था और उनकी मासूम और मज़ेदार बातों का आनन्द ले रहा था। उनमें से एक बच्चा पैर से फुटबॉल को दबाए हुए दूसरे मित्र से बोला, “अरे ! अभी मैं सुबह जब उठा तो मम्मी बोलीं कि रात स्कूल से मैसेज आया है और आज स्कूल बंद रहेगा। मैंने तुरन्त फ़ोन चेक किया तो सचमुच उसमें प्रिंसिपल मैडम का मैसेज था कि अगले तीन दिनों तक सभी विद्यालय बंद रहेंगे। मजा आ गया भाई ।“  

इस पर दूसरे बच्चे ने कहा , “ तुझे पता नहीं कि आज ‘इलाहाबाद हाईकोर्ट’ का फैसला आने वाला है।“ पहले वाले बच्चे ने अनभिज्ञता जताते हुए कहा , “कैसा फ़ैसला ?” इस पर दूसरे बच्चे ने उसके पैर के नीचे दबे फुटबॉल को किक मारते हुए कहा , “मेरे को क्या पता,  रात में पापा दादा जी से बात कर रहे थे, तो मैंने इतना ही सुना।“ इसके बाद वह दोनों बच्चे अपने अन्य साथियों के साथ फुटबॉल खेलने में व्यस्त हो गए ।

अभी मैं अपने चक्कर पूरे कर ही रहा था कि एक सज्जन मोबाइल पर दूसरों से बेख़बर अपने किसी  ‘साथ बैठने वाले’  मित्र से ख़ास इलाहाबादी अंदाज़ में ये कहते हुए नज़र आये , “ अमें ! कुछ पता है तीन दिन तक शाप बंद रहेगी । घर पर कुछ स्टॉक है कि नहीं ? जल्दी चेक करो नहीं तो कई दिनों तक ड्राई-डे मनाना पड़ेगा।“   थोड़ा रुककर वह भाई साहब फिर बोले , “ पता नहीं का ? आज फैसला आए वाला है।”

उस दिन शनिवार था, तो मैं और मेरे एक अधिवक्ता मित्र दोनों ने कलक्ट्रेट परिसर के सामने एक ज़माने से लग रहे अंकुरित चने के ठेले पर जाने का इरादा किया। हम पार्क से निकल कर सीधे मित्र की कार में सवार हो कर कलक्ट्रेट लेबर चौराहे पर स्थित उस चने के ठेले पर जा पहुंचे, तभी किसी आला पुलिस अधिकारी की गाड़ी एस्कॉर्ट्स के साथ जिलाधिकारी के बंगले की ओर जाती नज़र आई ओर कुछ ही क्षणों के भीतर ही डीएम साहब की अगुवाई में वह दोनों अधिकारी शान्ति व्यवस्था सुनिश्चित  करने के लिए शहर की ओरजाते हुए नज़र आए।

हमने दो प्लेट्स चने ऑर्डर किए। अपनी प्लेट्स का इंतेज़ार करते हुए वहीं पर बैठे कुछ डेलीवेज मज़दूरों पर हमारी नज़र पड़ी। उनमें से एक, काम पर जाने से पहले रोटी बनाने के लिए जल्दी-जल्दी आटा गूंथ रहा था, तो उसका दूसरा साथी एक छोटी डंडी की कलछुली बनाकर बर्तन के अंदर की दाल या सब्ज़ी को ईंटों के बीच बने काम चलाऊ चूल्हे पर चला रहा था। 

वहीं पास में एक तीसरा मज़दूर पेंट के डिब्बे में पानी भरकर टूटे हुए किसी मग से नहा रहा था। चने खाकर लौटते हुए हमने यह भी देखा कि बहुत सारे मज़दूर पहले से ही चौराहे पर आकर बैठ चुके हैं और शिकारी की तरह हर आने-जाने वालों को उनकी नज़रें स्कैन कर रहीं थीं कि हो सकता है आज इनको हमारी ज़रुरत हो और दिहाड़ी का इंतेज़ाम हो जाए। शायद 9 नवम्बर की सुबह यह लेबर चौराहा ही एक ऐसी जगह थी जहां ‘फ़ैसला आने वाला है‘ की गूंज हमने नहीं सुनी। मेरे वकील दोस्त ने इस मंज़र को देख कर इक़बाल माहिर का बड़ा ही एक सुष्ठ शेर पढ़ा : 

कुछ और भी मसाएल - ए - हस्ती   हैं     सामने
एक ‘दर्द -ए- इश्क़’   ही  दिल-ए- बेताब में नहीं

और बोले- शायद इनके लिए आज के फैसले से अधिक ज़रूरी परिवार के लिए शाम की रोटी का इंतेज़ाम है। मुझे फ़ैज़ अहमद फैज़ की मशहूर नज़्म का मिसरा याद आया- 

‘मेरे महबूब …और भी ग़म हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा ।’ 

(लेखक रियाज़ ख़ान हैदराबाद स्थित एक आई.टी व इंजीनियरिंग सर्विसेज कम्पनी में  निदेशक  व स्तम्भकार हैं)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
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