दुनिया के सर्वाधिक विकसित और आधुनिक विश्व के सबसे पुराने लोकतंत्र संयुक्त राज्य अमेरिका में छह जनवरी को जो कुछ घटित हुआ वह सिर्फ अमेरिका के लिए ही नहीं बल्कि संसार के सभी लोकतांत्रिक देशों के लिए चिंता का विषय है। जो देश पूरी दुनिया को लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था का पाठ पढ़ाता हो, वहां जो हुआ उसकी कल्पना किसी भी लोकतांत्रिक देश में नहीं की जा सकती।
जिस तरह ट्रंप समर्थकों की हिंसक भीड़ ने अमेरिका कांग्रेस के परिसर कैपिटल हिल्स जिसे लोकतंत्र का मंदिर (टेंपल ऑफ डेमोक्रेसी) भी कहा जाता है, उसमें प्रवेश करके तोड़फोड़ और हिंसा की, जिसे रोकने के लिए सुरक्षा बलों को मोर्चा लेना पड़ा और चार लोगों की मौत हुई। इस घटना ने अमेरिका की लोकतांत्रिक प्रणाली और उसके मूल्यों पर गहरी चोट की है।
अमेरिका में 1814 के बाद कैपिटल हिल्स में हिंसा की ऐसी घटना हुई, जिसकी उम्मीद ही नहीं की जा सकती है। पूरे विश्व ने इस घटना की निंदा की और अपने ही देश में खुद डोनाल्ड ट्रंप भी अकेले पड़ गए, क्योंकि उनकी पार्टी रिपब्लिकंस का भी एक बड़ा तबका इस घटना के खिलाफ हो गया है। यहां तक पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, जार्ज बुश, बराक ओबामा समेत अनेक लोगों ने इसकी निंदा करते हुए इसे अमेरिकी लोकतंत्र के लिए शर्मनाक बताया है।
अमेरिका न सिर्फ आधुनिक विश्व का सबसे पुराना लोकतंत्र है, बल्कि उसने दो महायुद्धों के बाद विश्व में लोकतंत्र की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है और आज भी पूरी दुनिया को लोकतांत्रिक मूल्यों को विकसित और सुरक्षित करने में उसकी अहम भूमिका है, उसे देखते हुए अमेरिका में ही इस तरह की घटना दुनिया भर की लोकतांत्रिक शक्तियों के लिए एक चुनौती है।
हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस घटना पर दुख प्रकट करते हुए इसकी निंदा की है। क्योंकि अमेरिका भारत का मित्र देश है और अमेरिका की ही तरह भारत में भी लोकतंत्र की जड़ें बेहद मजबूत हैं। इस घटना से अमेरिकी कानून व्यवस्था एवं सुरक्षा तंत्र को लेकर भी एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। जिस देश का रक्षा बजट 740 अरब डॉलर से ज्यादा हो और आधुनिक संचार एवं सूचना तकनीक में जो दुनिया में सबसे आगे हो, वहां इस तरह अराजक और हिंसक भीड़ सदन के भीतर घुस जाए और तोड़फोड़ करे यह पूरे तंत्र की विफलता को भी दर्शाता है।
लेकिन इस घटना का अंत बेहद सुखद हुआ कि अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों (सीनेट और प्रतिनिधि सभा) के संयुक्त सत्र ने राष्ट्रपति पद पर जो बाइडन के निर्वाचन को औपचारिक रूप से प्रमाणित कर दिया। हालांकि यह महज एक वैधानिक औपचारिकता है और हर बार इसे बेहद शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न किया जाता रहा है, लेकिन इस बार शुरू से ही राष्ट्रपति ट्रंप के तेवरों ने इस प्रक्रिया को पूरा करने की एक बड़ी चुनौती अमेरिकी कांग्रेस के सामने पेश कर दी थी, जिसे उसने बहुत ही संयुमित और संतुलित तरीके से पूरा किया।
जिस तरह ट्रंप समर्थकों की अराजकता के बावजूद अमेरिकी कांग्रेस ने अपनी जिम्मेदारी को अंजाम दिया, उसने अमेरिका की लोकतांत्रिक व्यवस्था की जड़ों की मजबूती का ही प्रमाण दिया है। खुद डोनाल्ड ट्रंप को भी अहसास हो गया कि वह बाजी हार चुके हैं और उन्होंने 20 जनवरी को शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण के लिए अपनी मंजूरी दे दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति के सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी दुनिया में एक उदाहरण है और सारे देशों की नजर इस पर रहती है।
हमेशा यह पूरी प्रक्रिया शांतिपूर्ण तरीके से ही संपन्न हुई और चाहे कितना भी विरोध चुनाव में रहा हो लेकिन सत्ता हस्तांतरण हमेशा प्रसन्न और हंसी खुशी के वातावरण में ही हुआ है। अब जब ट्रंप सत्ता हस्तांतरण के लिए मान गए हैं तो उम्मीद की जानी चाहिए कि सब कुछ ठीकठाक और शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न होगा। अंत भला तो सब भला यह मानते हुए हमें उम्मीद की जानी चाहिए कि बाइडन प्रशासन के साथ भी भारत के रिश्ते उसी तरह और मजबूत होंगे जैसे कि क्लिंटन, बुश, ओबामा और ट्रंप के शासनकाल में होते रहे हैं।
उम्मीद की जानी चाहिए कि अमेरिका में अब एसी कोई घटना नहीं होगी जिससे वहां के लोकतंत्र को धक्का लगे। क्योंकि अमेरिकी समाज बुनियादी तौर पर एक लोकतांत्रिक और खुला समाज है जिसे इस तरह की हिंसा और अराजकता पसंद नहीं है। वहां की व्यवस्था में जो चेक एंड बैलेंस हैं उनसे दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों ने सीख ली है। भारत ने भी अमेरिकी संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था की कई सकारात्मक बातें अपनाई हैं। चुनावों के बाद सत्ता का शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक प्रणाली की बुनियादी शर्त है।
अजीत कुमार, संयुक्त राष्ट्र में भारत के पूर्व राजदूत