चुनावी रंग में डूबे दक्षिण भारत के दो राज्य तमिलनाडु और पुड्डुचेरी के मतदाता इन दिनों अलग ही हिसाब में लगे हैं। पैसा पानी की तरह बह रहा है। एआईएडीएमके यानी जयललिता अम्मा की पार्टी दस साल से सत्ता में है, उनकी तुलना में डीएमके याने करूणानिधि की पार्टी कमज़ोर दिखाई देती है।
यह पहला चुनाव है ,जब इन दलों के पास कोई शिखर राजनेता का चेहरा नहीं है। इन दक्षिणी राज्यों के वोटर के मन की थाह लेना बहुत कठिन नहीं है। अनुभव बताता है कि अतीत में पैसा लेने के बाद भी उसने सरकार बदली है। इस नज़रिए से एआईएडीएमके के लिए यह निर्वाचन तनिक कठिन बनता जा रहा है।
मतदाता और पार्टियां
दरअसल, दक्षिण भारत की राजनीति में पहले महंगे उपहारों का प्रचलन था। उम्मीदवार और पार्टियां बांटते थे। जब टी एन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त बने तो उन्होंने सख़्ती से इस पर क़ाबू पाया। उनके बाद कृष्णमूर्ति के ज़माने में भी यह बीमारी नियंत्रण में रही। बाद में यह सियासी दलों के घोषणा-पत्रों में शामिल हो गया।
पार्टियां सरकार बनने पर टीवी ,फ्रिज़ ,कुकर ,वाॅशिंग मशीन और लेपटॉप से लेकर साइकिल बांटने के वादे करने लगीं। अब कुछ बरस से फिर चोरी से नक़द रुपये बांटे जाने लगे हैं। चुनाव आयोग हर बार कुछ धन ज़ब्त करके अपने कर्तव्य की खानापूर्ति कर देता है। अन्यथा निर्वाचन भवन का एक एक कर्मचारी जानता है कि दक्षिण में दौलत कैसे बंटती है।
ताज़ा चुनाव में इन राज्यों से क़रीब डेढ़ सौ करोड़ की नक़दी बरामद की जा चुकी है। प्रसंग के तौर पर बता दूं कि तमिलनाडु में ही नोट के बदले वोट खरीदने का पहला मामला लोकसभा चुनाव में पकड़ा गया था। वह निर्वाचन तो निरस्त कर दिया गया, लेकिन विडंबना है कि जब उपचुनाव हुआ तो वही उम्मीदवार फिर जीत गया। जयललिता के भतीजे तो सार्वजनिक बयान देते हैं कि मतदाता पॉलिटिकल पार्टियों से पैसा लें। यह अजीब सा लगता है कि चुनाव आयोग इन मामलों में ठंडा सा है, अलबत्ता बंगाल में वह छोटी छोटी बातों पर गुर्राता है।
राज्य में किस दल का क्या हाल?
वोटर की भावना पर भाव हावी होने की एक वजह यह भी है कि इस बार कोई करिश्माई लीडर दोनों ही बड़े दलों के पास नहीं है। साठ -सत्तर साल पहले एमजीआर ने चेहरे की सियासत शुरू की थी और पार्टी बनाई थी। उस समय करूणानिधि भी उनके साथ थे। दोनों तमिल फ़िल्म इंडस्ट्री से आए थे। बाद में करूणानिधि अलग हो गए। एमजीआर की जगह जयललिता ने ले ली और आधी सदी से सिर्फ वहां मतदाता सिर्फ़ चेहरे को देखते हैं। इस बार चेहरा नहीं तो पैसे का सहारा लिया जा रहा है। धनतंत्र समूचे लोकतंत्र पर हावी है।
प्रादेशिक शिखर पर बैठे इन दोनों दलों के साथ गठबंधन में शामिल राष्ट्रीय पार्टियों - कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के लिए इन राज्यों में खोने के लिए कुछ नहीं है। बीजेपी पुड्डुचेरी में सरकार बनाने का सपना देख सकती है। उसके पास कांग्रेस से आयातित सिन्दूर है और एन रंगा स्वामी का साथ है। रंगास्वामी पुड्डुचेरी की सियासत में तुरुप के पत्ते हैं। तमिलनाडु में बीजेपी का ध्यान अपने दो फ़ीसदी वोट बैंक को बढ़ाने पर ही होगा। एआईएडीएमके के ई के पलानिस्वामी अभी चेहरा नहीं बन पाए हैं।
दस बरस सरकार चलाने के बाद चेहरा विहीन इस गठबंधन के खाते में केंद्र और राज्य के नकारात्मक मतों का भी उल्टा असर पड़ सकता है।इस नुक़सान की भरपाई कहां से होगी-यह फ़िलहाल साफ़ नहीं है। वहां कांग्रेस-डीएमके का गठजोड़ करिश्मा कर सकता है। स्टालिन ही करूणानिधि के वारिस बनकर उभरे हैं।
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