असम में इस बार विधानसभा चुनाव मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के लिए अग्निपरीक्षा साबित होंगे। यह कहना ज्यादा सही होगा कि यह मुख्यमंत्री के तौर पर उनकी सरकार के पांच साल के कार्यकाल पर जनमत संग्रह होगा। राज्य की 126 सीटों के लिए नौ अप्रैल को मतदान होगा।
वैसे, तो उनको पूर्वोत्तर का चाणक्य कहा जाता है, लेकिन उनके नेतृत्व में पिछले दो चुनाव से बेहतर प्रदर्शन से ही यह उपाधि सार्थक साबित होगी। विकास के तमाम दावों के बावजूद हिमंत की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा को अपने बूते बहुमत दिलाना है।
राज्य में बहुमत का आंकड़ा 64 है, लेकिन वर्ष 2016 और 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी 60 सीटों तक ही पहुंच सकी थी। लेकिन उस समय हिमंत न तो मुख्यमंत्री का चेहरा थे और न ही मुख्यमंत्री। वर्ष 2016 में अपने सहयोगियों के साथ सरकार बनाने वाली भाजपा ने सर्बानंद सोनोवाल को मुख्यमंत्री बनाया था। लेकिन 2021 के बाद हिमंत इस कुर्सी पर बैठे थे।
इसलिए इस बार सबसे बड़ा सवाल है कि क्या पांच साल इस कुर्सी पर रहने के बाद वो अपने बूते भाजपा को बहुमत दिलाने में कामयाब रहेंगे?
वर्ष 2016 में 89 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा ने 29.5 फीसदी वोटों के साथ 60 सीटें जीतकर अपने सहयोगियों के साथ कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया था। वर्ष 2021 में उसको मिले वोट तो बढ़ कर 33.21 फीसदी तक पहुंच गए। लेकिन तब 93 सीटों पर लड़ने के बावजूद वह 60 सीटें ही जीत सकी थी। इसी तरह वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में उसकी सीटों की तादाद सात थी। लेकिन उसके बाद क्रमशः 2019 और 2024 में यह नौ तक ही पहुंच सकी।
अपने बूते बहुमत का जादुई आंकड़ा छूने की उम्मीद
अब इस बार परिसीमन की वजह से मुस्लिम-बहुल सीटों की तादाद में कमी और सरकार की कल्याणमूलक योजनाओं के भरोसे पार्टी अपने बूते बहुमत का जादुई आंकड़ा छूने की उम्मीद कर रही है। परिसीमन के कारण राज्य में मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या 29 से घट कर 22 रह गई है। यानी वैसी सात सीटें घट गई हैं जहां तत्कालीन पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) से आने वाले मुसलमान निर्णायक स्थिति में हो सकते थे।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर पार्टी अपने बूते बहुमत हासिल करने में कामयाब रहती है तो उसे अपने सहयोगियों पर निर्भर नहीं रहना होगा। पहले ऐसा करना उसकी मजबूरी थी। अपने बूते बहुमत हासिल करने के बाद नई सरकार अपने एजेंडे को मजबूती से लागू कर सकती है। इसके साथ ही वह अपने सहयोगी दलों से सौदेबाजी भी कर सकती है।
चुनावी नतीजों से यह भी साबित होगा कि सरमा की ओर से बड़े पैमाने पर चलाए गए कथित अल्पसंख्यक विरोधी अभियानों और स्वेदशी बनाम बंगाली मिया मुसलमान का नैरेटिव सियासी तौर पर कितना कामयाब रहा है। अकेले अपने बूते पार्टी को बहुमत दिलाने से वो लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने वाले पहले भाजपा मुख्यमंत्री तो बनेंगे ही, यह भी साबित कर सकेंगे कि असम की सत्ता हासिल करने के लिए भाजपा को किसी गठजोड़ की जरूरत नहीं है।
मुख्यमंत्री हिमंता लंबे समय से मियां मुसलमानों के खिलाफ मुखर रहे हैं। इसकी वजह से राज्य में धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण तेज हुआ है। दूसरी ओर, कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों के खिलाफ सत्तारूढ़ पार्टी के आक्रामक बयानों के अलावा मुख्यमंत्री के कथित भ्रष्टाचार को ही अपना सबसे बड़ा चुनावी हथियार बनाया है।
कांग्रेस बनेगी राह का रोड़ा?
कांग्रेस ने मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी रिनिकी भुइयां पर करोड़ों की बेनामी संपत्ति रखने का भी आरोप लगाया है। इसके अलावा रिनिकी पर तीन देशों के पासपोर्ट रखने के आरोप लगाने से चुनाव से ठीक पहले राजनीति गरमा गई है।
शुरुआती दौर में माना जा रहा था कि इस चुनाव में भाजपा को विपक्ष की ओर से किसी कड़ी चुनौती का सामना नहीं करना पड़ेगा। लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी गठबंधन के बाद अब उसकी राह आसान नहीं लग रही है।
लंबे समय तक जारी कयासों के बाद कांग्रेस ने अखिल गोगोई की राइजोर दल के साथ हाथ मिलाया है। विपक्षी गठबंधन में अब इन दोनों पार्टियों के अलावा लिरिनज्योति गोगोई की असम जातीय परिषद और आल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस जैसे राजनीतिक दल शामिल हैं। अहोम समुदाय के इन तीनो नेताओं के एक गठजोड़ में शामिल होने से खासकर ऊपरी असम में भाजपा के लिए चुनौती बढ़ गई है। इलाके में 50 सीटें हैं। यहां जीत ही सत्ता का रास्ता खोलती है। उस इलाके में अहोम समुदाय के वोटर कई सीटों पर निर्णायक स्थिति में हैं।
राज्य के जेन जी यानी युवा वोटर इस बार राजनीतिक दलों की बजाय उम्मीदवारों को उनकी छवि और कामकाज के आधार पर वोट देने का मन बना रहे हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के लगभग ढाई करोड़ वोटरों में से 29 फीसदी यानी 73 लाख से ज्यादा वोटर 19 से 29 साल के आयु वर्ग में हैं। इसके अलावा करीब 62 लाख वोटरों की उम्र 30 से 39 साल के बीच है।
जहां तक चुनाव अभियान का सवाल है भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर अमित शाह और कई केंद्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों ने राज्य में चुनावी रैलियों को संबोधित किया है। दूसरी ओर, कांग्रेस की ओर से राहुल और प्रियंका गांधी ही स्टार प्रचारक रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस बार मतदान से पहले तेजी से बदले समीकरणों ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। इससे हिमंत सरमा की चुनौती भी बढ़ी है। अब देखना होगा कि वो इस अग्निपरीक्षा में कितने कामयाब रहते हैं।
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