डीपफेक तकनीक केवल व्यक्ति की स्वतंत्रता, निजता, गरिमा को ही ठेस नहीं पहुंचाती बल्कि इसके इस्तेमाल से लोकतांत्रिक मूल्यों को भी खतरा पहुंच सकता है।
- फोटो : Istock
तकनीक का गलत इस्तेमाल, नीयत और नागरिकों के संवैधानिक संस्कार
डीपफेक तकनीक का गलत इस्तेमाल भारत में नागरिकों की संवैधानिक नैतिकता बोध पर सवाल खड़े करता है। किसी भी व्यक्ति की छवि धूमिल कर, उसकी प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाने की मंशा इस बात की ओर इशारा है कि भारत में रह रहे लोग अपने संवैधानिक संस्कारों और मूल्यों के प्रति जागरूक नहीं हैं।
नागरिक समाज देश में हर व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता और उसकी निजता के प्रति सम्मान करने की नैतिक जिम्मेदारी के प्रति जागरूक नहीं है। नागरिकों के मन में आज भी उन संवैधानिक मूल्यों, संस्कारों और बोध का अभाव है जिसमें वह एक दूसरे के प्रति बुंधता, समानता, न्याय और उसकी स्वतंत्रता का सम्मान कर सकें।
आज भारत में सोशल मीडिया, एआई और उससे जुड़ी तकनीकों से लगातार संवैधानिक मूल्यों का हनन हो रहा है। बिना अनुमति के किसी की तस्वीर लेना, सोशल मीडिया पर तस्वीरें डालना बंधुता, स्वतंत्रता, गरिमा जैसे मूल्यों का हनन है। इधर एआई के माध्यम से किसी की तस्वीरे में हेरफेर कर उसे मनोरंजन के लिए सोशल मीडिया पर शेयर कर देना, ऑडियो के जरिए वित्तीय धोखाधड़ी करना यह सब उसी आपराधिक मानसिकता का हिस्सा जिसमें संवैधानिक मूल्य नहीं है और संवैधानिक बुद्धिमता का अभाव है।
दरअसल, भारतीय संविधान में नागरिकों को कई तरह के मौलिक अधिकार दिए गए हैं उनमें से किसी भी व्यक्ति को स्वतंत्रता, न्याय, बंधुता, गरिमा और अपनी निजता के साथ जीने का अधिकार भी प्रदान किया गया है।
आज डीपफेक AI द्वारा महिलाओं और बच्चों को लेकर अश्लील व फूहड़ वीडियो तक बनाए जा रहे हैं, जिससे उनकी प्रतिष्ठा, गरिमा व निजता को नुकसान पहुंच रहा है। बीते डेढ़ दशक में अश्लील वीडियो, निजी क्षणों की रिकॉर्डिंग और ब्लैक मेलिंग यह सारे अपराध तेजी से बढ़े हैं। वर्ष 2019 के आसपास ही एम्सटर्डम स्थित साइबर सिक्योरिटी कंपनी डीप ट्रेस में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में कुल 14678 वीडियो ऑनलाइन थे जिसमें से 95 फीसद सामग्री अश्लील थी। यह वीडियो ब्लैकमेल करने और फिरौती मांगने के लिए बनाए गए थे।
डीपफेक तकनीक केवल व्यक्ति की स्वतंत्रता, निजता, गरिमा को ही ठेस नहीं पहुंचाती बल्कि इसके इस्तेमाल से लोकतांत्रिक मूल्यों को भी खतरा पहुंच सकता है।
एक मीडिया रिपोर्ट में साइबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल कहते हैं-
डीपफेक का इस्तेमाल फिरौती मांगने, छवि को खराब करने चुनावों में हेरफेर, धांधली करने, राजनीतिक उम्मीदवारों को बदनाम करने, उनकी छवि को नुकसान पहुंचाने, उनकी निजता, गरिमा को चोट पहुंचाने में किया जा सकता है।
डीपफेक तकनीक सामाजिक अशांति भड़काने में भी भूमिका निभा सकता है। एक तरह से डीपफेक लोगों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने, भावनात्मक रूप से परेशान करने सामाजिक तनाव बढ़ाने और लोकतंत्र को कमजोर करने के हथियार के रूप में हमारे सामने है।
कब जागेगी संवैधानिक नैतिकता और कब जागृत होगा संवैधानिक बोध?
हमारे संविधान निर्माता बाबा साहेब आंबेडकर की इच्छा थी कि संस्कृति, समाज, धर्म और जातिगत विविधता के विषम और विसंगतिपूर्ण भारतीय समाज में संवैधानिक साक्षरता फैले। देश का नागरिकता बोध संवैधानिक बुद्धिमता से संपन्न हो। जनता संविधान को लेकर जागरूक हो। राष्ट्र में संविधान लागू केवल कागजों में ही लागू ना हो बल्कि संवैधानिक मूल्य व्यवहारिक रूप से भारतीय समाज की चेतना और संस्कार का हिस्सा बनें।
एआई से ना केवल व्यक्ति की निजता को भंग किए जाने के खतरे हैं बल्कि उसकी गरिमा को भी ठेस पहुंचाने वाला है।
- फोटो : Istock
इस लिहाज से देखा जाए तो एआई और खासतौर पर जनरेटिव एआई के सारे टूल्स संवैधानिक मूल्यों के लिए भविष्य का आसन्न खतरा है। रोजगार का संकट अलग खड़ा होने जा रहा है, नैतिकता और मूल्य वैसे ही डिजिटल मीडिया ने धूमिल कर रखे हैं इस लिहाज से समाज और राष्ट्र एक गहरे सामाजिक नैतिक संकट की ओर बढ़ रहा है।
एआई के जरिए डीप फेक क्राइम भी बढ़ा है। डीप फेक के माध्यम से छवियों, वीडियो और पॉर्नोग्राफी के जरिए इस तरह से किया जाता है कि दुनिया के प्रभावशाली और प्रभुत्व संपन्न व्यक्ति, नेता वह सब बातें बोलते दिखें जिसे उन्होंने कभी नहीं कहा। यह एक तरह से मशीन लर्निंग और एआई का सबसे प्रभावशाली तरीका है जिसने लोकतांत्रिक समाजों के भीतर ना केवल दुष्प्रचार और गलतफहमियों को पैदा किया जाता है बल्कि नागरिक समाज की निजता, आस्था और विश्वासों को भी चोट पहुंचाने का प्रयास किया जाता है।
एक तरह से कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दुष्प्रभावों के बीच डीप फेक जिस रूप में हमारे सामने है वह आने वाले समय में वैश्विक प्रजातांत्रिक समाजों के लिए एक चुनौती बनकर सामने खड़ा है।
2022 में बराक ओबामा के नाम से एक वीडियो वायरल हुआ जिसने अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में सनसनी मचा दी। नकली वीडियो जो एकदम वास्तविक लगता था उसमें पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति यह कहते हुए नजर आए कि 2020 के चुनाव में उन्होंने धोखाधड़ी की थी। ऐसे ही हाल ही में 2023 में अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के गिरफ्तारी की ऐसी फोटों दुनियाभर में वायरल हुईं जिसे देखते ही पूरी दुनिया में तहलका मच गया। इसे मिड जर्नी नाम के एआई टूल्स से बनाया गया था।
ऐसे ही इंस्टा पर एआई द्वारा बनाई गई रील्स के उदाहरण हैं। इन रील्स में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को लेकर चल रही रील थी जिसमें उन्हें अपशब्द बोलते हुए दिखाया गया था। ऐसे ही अभी हाल ही में भारतीय क्रिकेटर विराट कोहली का एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें वे यह कहते नजर आए कि वे राष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने जा रहे हैं। यह वीडियो भी इतना वास्तविक था कि इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था कि एआई का एडवांस और अपडेटेड स्वरूप सामने होगा।
एआई से ना केवल व्यक्ति की निजता को भंग किए जाने के खतरे हैं बल्कि उसकी गरिमा को भी ठेस पहुंचाने वाला है। यदि हमारे समाज में संवैधानिक मूल्यों, संस्कारों और संवैधानिक चेतना को लेकर जागरूकता रहती तो इस तरह के आपराधिक कार्यों पर रोक लग सकती थी।
कहने का तात्पर्य यह है कि एक ओर संवैधानिक मूल्यों और बुद्धिमता का अभाव है तो वहीं कृत्रिम बुद्धिमता के माध्यम से एआई के दुरुपयोग के भी खतरे हैं जो हमें दिखाई देने लगे हैं। भारत जैसे देश में जहां पहले से ही साइबर क्राइम ज्यादा है वहां एआई संवैधानिक मूल्यों, चेतना के अभाव में किस रूप में काम आएगा?
इधर, एआई के खतरे का यह पहलू वैश्विक है और यही चुनौती भारत के सामने भी है। घोटालों से लेकर ठगी और झांसे तक, सेलिब्रिटी पोर्नोग्राफी, वीडियो के जरिए निजता और गरिमा को ठोस पहुंचाना, चुनाव में हेर-फेर करना, उम्मीदवारों की ओर से आपसी रंजिश के तरह जनता को गुमराह करना, सांप्रदायिक सद्भाव और वैमनस्य, सामाजिक विद्रुपताएं, विभाजन, आर्थिक शोषण, अन्याय, दुष्प्रचार और प्रोपेगैंडा के माध्यम से सांस्कृतिक, सामाजिक हमले करना जैसी घटनाएं एआई के बड़े खतरे हैं।
ऐसे ही डीप फेक के माध्यम से पहचान की चोरी, गरिमा और छवि को ठेस पहुंचाना, पहचान-पत्रों के माध्यम से कई तरह के अपराधों को अंजाम देना, इसमें वित्तीय धोखाधड़ी, फ्रॉड, जैसे कई अपराध हैं वह भी एआई आसान ही कर देगा।
वर्तमान में तो डिजिटल टेक्नॉलॉजी और डिजिटल मीडिया में इसने ना केवल आकार ग्रहण करना शुरू कर दिया है बल्कि यह यह एआई के कई तरह के टूल्स के जरिए और संकट पैदा करेंगे।
सवाल यह है कि भारत में जहां संवैधानिकता नैतिकता बोध, संस्कार और संवैधानिक मूल्यों के अभाव में एआई किस स्वरूप में सामने आएगा?
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।