रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का दौरा भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण है। रूस यूक्रेन युद्ध के शुरू होने के बाद यह ऐसा पहली बार है जब पुतिन भारत आ रहे हैं। पुतिन का यह दौरा न केवल पारंपरिक ऊर्जा जैसे तेल, गैस व रक्षा सहयग तक सीमित है, बल्कि आर्थिक, तकनीकी, स्वास्थ्य, कृषि जैसे कई मोर्चों पर दोनों देशों की साझेदारी को आगे बढ़ाने की एक बड़ी योजना है। इस दौरान दोनों देशों ने 2030 तक व्यापार को 100 बिलियन डॉलर तक बढ़ाने का लक्ष्य भी रखा है। व्लादिमीर पुतिन का यह भारत दौरा केवल एक मुलाकात भर नहीं, बल्कि यह दोनों देशों के रिश्तों में एक नए अध्याय की शुरुआत है। यह विश्व के बदलते समीकरण को भी नए सिरे से परिभाषित करने का काम करेगा।
भारत, रूस संबंध और अमेरिका के लिए चुनौतियां
भारत, रूस और चीन का करीब आना अमेरिका के लिए कहीं न कहीं एक बड़ी चिंता है। व्लादिमीर पुतिन का भारत दौरा अमेरिका समेत यूरोप के कई देश करीब से ऑब्जर्व कर रहे हैं। पिछले साल भारत और रूस, साथ ही अन्य BRICS देश कजान में इकट्ठा हुए थे। इस दौरान डॉलर के प्रभुत्व को कम करने की दिशा में नई करेंसी लाने पर योजना बनाने को लेकर बात की गई थी। इन सब के अलावा सम्मेलन में अमेरिका और पश्चिमी देशों को चुनौती देने के लिए बहु ध्रुवीय विश्व व्यवस्था (Multi Polar New World Order) बनाए जाने पर जोर दिया गया।
रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिम की ओर से रूस के ऊपर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए। इसके अलावा अमेरिका ने उन देशों पर करीबी से निगरानी की जो रूस से तेल, गैस या अन्य संसाधन लेते हैं। इन सबके बाद भी भारत ने रूस से लगातार तेल खरीदना जारी रखा। यह सब अमेरिका और पश्चिमी देशों को बिल्कुल पसंद नहीं आ रहा था। BRICS में नई करेंसी की बात करना और अमरिका के खिलाफ जाकर भारत का लगातार रूस से बड़े पैमाने पर तेल खरीदना इन्हीं सब चीजों को देखते हुए अमेरिका ने भारत के ऊपर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने का एलान किया।
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- फोटो : PTI
इन सब चुनौतियों के बाद भी भारत और रूस का करीब आना एक नए ग्लोबल शिफ्ट के रूप में देखा जा रहा है। यह स्पष्ट करता है कि भारत पश्चिम के दबाव में आकर अपनी विदेश नीति तय नहीं करेगा। भारत की विदेश नीति के केंद्र में उसके राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास प्राथमिकता में हैं।
इन सबके बीच पुतिन की भारत यात्रा एक बड़े वैश्विक बदलाव की ओर इशारा करती है। अमेरिका को यह डर है कि भारत रूस संबंधों में मजबूती, रूस, चीन और भारत के बीच रणनतिक साझेदारी को बढ़ाने का काम करेगी। इससे भविष्य में अमेरिका और पश्चिमी देशों का जो प्रभुत्व है, वह कमजोर हो सकता है।
भारत रूस संबंध और चुनौतियां
हालांकि, हमें कुछ और बातों पर गौर करने की जरूरत है क्योंकि रूस के साथ बढ़ती दोस्ती सिर्फ हमारे लिए लाभ तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसमें कई चुनौतियां भी हैं। भारत रूस को 4.9 बिलियन डॉलर का निर्यात करता है, वहीं रूस से करीब 63.8 बिलियन डॉलर का आयात करता है, यानी कुल व्यापार घाटा करीब 59 बिलियन डॉलर है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस असंतुलन को कैसे संतुलित किया जाए यह सबसे बड़ी चुनौती है। हालांकि, दोनों देशों के बीच इसको लेकर बात की जा रही है। व्लादिमीर पुतिन का यह दौरा केवल द्विपक्षीय नहीं है बल्कि यह एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की नींव में एक अहम कड़ी साबित हो सकता है।
आर्कटिक के खजाने, रूस के उत्तरी मोर्चे में भारत के लिए नए अवसर
इन सबके अलावा रूस के उत्तर में स्थित आर्कटिक क्षेत्र तेजी से पिघल रहा है। यहां दुनिया के सबसे बड़े अछूते प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं। यहां बड़ी मात्रा में तेल भंडार, प्राकृतिक गैस, रेयर अर्थ मिनरल्स और कई दूसरे प्राकृतिक संसाधन मौजूद हो सकते हैं। भारत रूस का ऊर्जा सहयोगी है। रूस का आर्कटिक क्षेत्र के एक बड़े हिस्से पर नियंत्रण है। इस कारण रूस के साथ दोस्ती से हमें कई बड़े फायदे हो सकते हैं। भारत, रूस के आर्कटिक तेल गैस क्षेत्रों में निवेश कर सस्ता और स्थायी ऊर्जा स्रोत पा सकता है। इसके अलावा रेयर अर्थ मिनरल्स की मदद से हम अपने देश में हाई-टेक इंडस्ट्री को ग्रोथ दे सकते हैं। आर्कटिक का पिघलना भले ही पर्यावरणीय खतरा है, पर रणनीतिक रूप से भारत के लिए नए अवसर भी खोल सकता है।
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