सिनेमा के विषय और इसे बनाने में आए बदलाव में सबसे बड़ा योगदान आर्थिक उदारीकरण का है।
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राजनीति की बातें करने का माहौल इन दिनों देश में भले न हो क्योंकि आलोचना और विरोध का अंतर मिटता जा रहा है। लेकिन, फिर भी मैं ये कह सकता हूं कि इन दिनों जो कुछ भी सिनेमा के बदलते परिवेश के बारे में लिखा जा रहा है या जिस कंटेंट ड्रिवेन सिनेमा को लेकर बहसें और सेमिनार हो रहे हैं, उनकी शुरुआत आर्थिक उदारीकरण से होती है।
बदल रहा है हिंदी सिनेमा
सिनेमा के विषय और इसे बनाने में आए बदलाव में सबसे बड़ा योगदान आर्थिक उदारीकरण का है। भारत के दर्शकों को जब से टेलीविजन, सैटेलाइट मनोरंजन चैनल और इंटरनेट सुलभ हुआ उनकी सोच बदली। सही मायने में पूरी दुनिया एक गांव बन गई। मैं अपनी बात करूं तो मेरा भी मन होता है कि उड़ीसा में जो छऊ नृत्य होता है उसे अपने मोबाइल पर अपनी सुविधा और अपनी पसंद के समय के हिसाब से जहां चाहूं वहां देख सकूं। तो ये कैसे मुमकिन हुआ?
मेरी राय में हिंदी सिनेमा के लिए ये बहुत अच्छा समय है। लोग भारतीय परिवेश की बेहतरीन फिल्में बना रहे हैं। ऐसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर चल रही हैं तो नए-नए हीरो भी आ रहे हैं। कामयाब हो रहे हैं। लेकिन, इन नए कलाकारों को कभी ये नहीं भूलना चाहिए कि अगर वे सितारे बन पा रहे हैं तो उन्हें लोकप्रिय बनाने में उनके निर्माताओं, निर्देशकों और लेखकों का बहुत बड़ा हाथ है।
कहानी मौलिक होगी, उसके किरदार असली होंगे तो उन्हें हिट होने से कोई रोक नहीं सकता।
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अगर ये नए कलाकार खुद को सुपरस्टार समझने लगे तो गड़बड़ शुरू हो जाएगी क्योंकि अपने बल बूते किसी फिल्म को चला लेने वाला जमाना अलग था। राजेश खन्ना ने अकेले अपने बूते लगातार 15 फिल्में हिट दीं तो ये उनका करिश्मा था। करिश्मा उस जमाने में और भी लोगों ने किया।
जैसे बिना हीरो हीरोइन के साइन हुए अगर पता चले कि फिल्म में संगीत शंकर जयकिशन का है तो फिल्म बिक जाती थी। कभी-कभी तो ऐसा भी हुआ कि निर्माता ने फिल्म की योजना बनाई और सिर्फ महमूद या जॉनी वाकर को साइन कर लिया तो उनके नाम से भी फिल्में बिक जाया करती थीं।
मेरा कहना ये है कि अगर किसी अभिनेता के लिए किसी लेखक और निर्देशक ने कोई किरदार लिखा अच्छा है, गढ़ा अच्छा है तो वह हिट होगा ही। इसमें अभिनेता को बहुत ज्यादा क्रेडिट लेना नहीं चाहिए। और अगर कहानी मौलिक होगी, उसके किरदार असली होंगे तो उन्हें हिट होने से कोई रोक नहीं सकता।
फिल्म विकी डोनर में अभिनय के लिए मिले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के बारे में जब भी बातें होती हैं तो मैं हमेशा इसका श्रेय फिल्म के निर्देशक शूजीत सरकार और उनकी लेखक जूही चतुर्वेदी को देता हूं। इस किरदार में कोई भी कलाकार अगर ढंग का काम करे तो वह हिट होना ही है।
मैं बहुत बड़ा स्टार हूं, इस नजरिए को ही मैं गलत मानता हूं क्योंकि अगर स्टार के होने से ही फिल्म चलती तो किसी भी बड़े स्टार की कोई फिल्म फ्लॉप नहीं होनी चाहिए।
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