फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अंबेडकर जयंती : कौन बड़ा अंबेडकरवादी बनने के बजाय बाबा साहेब के विचारों को बेहतर तरीके से लागू करें

सार

Ambedkar Jayanti Political Significance: बाबा साहेब की विरासत आज राजनीति में विचार से अधिक प्रतीक और वोट बैंक साधने का जरिया बन गई है। सच्ची श्रद्धांजलि उनके नाम पर शक्ति प्रदर्शन करने में नहीं, बल्कि उनके सिद्धांतों को नीतियों में ढालने में है।
विज्ञापन
अंबेडकर जयंती - फोटो : Adobe stock
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

Dalit Vote Bank Politics India: भारतीय राजनीति में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जो समय के साथ केवल इतिहास का हिस्सा नहीं रहते, बल्कि सत्ता की रणनीति का केंद्र बन जाते हैं। बाबा साहेब डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर ऐसा ही एक नाम हैं, जिनकी विरासत आज विचार से ज्यादा प्रतीक के रूप में इस्तेमाल होती दिखाई देती है। अंबेडकर जयंती अब केवल श्रद्धांजलि का दिन नहीं रही, बल्कि यह राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन और सामाजिक समीकरण साधने का वार्षिक मंच बन चुकी है।
विज्ञापन


दिलचस्प बात यह है कि वैचारिक रूप से एक-दूसरे के विपरीत खड़े राजनीतिक दल भी इस दिन एक ही पंक्ति में खड़े नजर आते हैं। भारतीय जनता पार्टी से लेकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी समेत सभी दल अंबेडकर की विरासत को अपने-अपने तरीके से प्रस्तुत करते हैं। कहीं संविधान के रक्षक के रूप में, कहीं सामाजिक क्रांति के नायक के रूप में, तो कहीं दलित अस्मिता के प्रतीक के रूप में, लेकिन इस बहुरूपी प्रस्तुति के पीछे एक समान सूत्र दिखाई देता है, वो वोट बैंक की राजनीति का है।

बाबा साहेब के नाम पर होने वाले कार्यक्रमों की एक तयशुदा संरचना बन चुकी है, माल्यार्पण, भाषण, सोशल मीडिया पर संदेश और सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता की घोषणाएं, लेकिन इन आयोजनों में अक्सर वह आत्मा गायब रहती है, जो बाबा साहेब के विचारों की मूल प्रेरणा थी। सवाल यह नहीं है कि कौन उन्हें ज्यादा सम्मान देता है, बल्कि यह है कि कौन उनके विचारों को अपनी नीतियों में उतारता है।
विज्ञापन


सच तो यह है कि बाबा साहेब का नाम राजनीतिक दलों के लिए एक 'सुरक्षित निवेश' बन गया है। उनके प्रति सम्मान जताना किसी भी वर्ग को नाराज नहीं करता, लेकिन इससे एक बड़े और निर्णायक वोट बैंक को आकर्षित करने की संभावना जरूर बनती है। यही कारण है कि अंबेडकर जयंती के आसपास अचानक सामाजिक न्याय, समानता और दलित उत्थान की बातें तेज हो जाती हैं, जो कई बार बाकी साल में उतनी मुखर नहीं दिखतीं।

यह प्रवृत्ति केवल एक दिन तक सीमित नहीं है। स्मारकों का निर्माण, योजनाओं के नामकरण और राजनीतिक भाषणों में बाबा साहेब का बार-बार उल्लेख, ये सब इस बात के संकेत हैं कि उनका नाम अब एक राजनीतिक 'ब्रांड' बन चुका है, लेकिन जब ब्रांड हावी हो जाता है तो विचार पीछे छूटने लगते हैं। यही सबसे बड़ी चिंता है।

विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति ने समाज को वर्ग, जाति और भेदभाव से मुक्त करने का सपना देखा, उसी के नाम पर आज समाज को अलग-अलग खांचों में बांटकर राजनीतिक लाभ लिया जा रहा है। बाबा साहेब का असली संदेश शिक्षा, आत्मनिर्भरता और संस्थागत सुधार की लंबी और कठिन प्रक्रिया है, जबकि प्रतीकात्मक राजनीति आसान और त्वरित परिणाम देने वाली है।

फिर भी, इस पूरी प्रक्रिया को एकतरफा नकारना भी उचित नहीं होगा। बाबा साहेब के नाम पर ही सही, सामाजिक न्याय और समानता जैसे मुद्दे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में बने हुए हैं। नई पीढ़ी उनके बारे में जान रही है, उनके विचारों पर चर्चा हो रही है। यह लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत है। लेकिन, यह तभी सार्थक होगा, जब यह चर्चा केवल मंचों और भाषणों तक सीमित न रह जाए।

आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल बाबा साहेब को केवल जयंती के दिन याद करने की परंपरा से आगे बढ़ें। उनके विचारों को नीति निर्माण, शिक्षा व्यवस्था, और सामाजिक ढांचे में वास्तविक रूप से लागू करने का प्रयास करें, क्योंकि अंबेडकर को अपनाने की असली कसौटी माल्यार्पण नहीं, बल्कि परिवर्तन है।

अगर यह होड़ केवल 'कौन ज्यादा अंबेडकरवादी' दिखता है, तक सीमित रही तो यह लोकतंत्र के लिए एक सतही प्रदर्शन भर बनकर रह जाएगी, लेकिन यदि यह प्रतिस्पर्धा इस दिशा में बदल जाए कि 'कौन उनके विचारों को बेहतर तरीके से लागू करता है', तब यह राजनीति ही नहीं, समाज के लिए भी एक सकारात्मक मोड़ साबित हो सकती है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें