भार्गव राम धनुष, गदा और मल्ल तीनों युद्धकला के विशेष ज्ञाता हैं। इनके शिष्यों में महापराक्रमी भीष्म, द्रोण, बलराम और कर्ण की विशेष चर्चा है।
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परशुराम के परिश्रम और चमत्कार के अनेक उदाहरण हैं। परशु इन्होंने स्वयं ईजाद किया तो पिनाक भगवान सदाशिव से प्राप्त किया था।राम धनुर्धारी, कृष्ण बंशी और सुदर्शन चक्र धारी हैं। जबकि श्राप और वर की शक्ति से परिपूर्ण परशुराम के हाथों में परशु और वेद ज्ञान पुस्तक है। भार्गव राम धनुष, गदा और मल्ल तीनों युद्धकला के विशेष ज्ञाता हैं।
इनके शिष्यों में महापराक्रमी भीष्म, द्रोण, बलराम और कर्ण की विशेष चर्चा है। अनेकों अस्त्र-शस्त्र के संचालक परशुराम विश्व की सबसे पुरातन और प्रामाणिक युद्ध विधा कलरीपायट्टु के भी जन्मदाता हैं, जिसका अभ्यास अब भी भारतीय प्रांत केरल मे किया जाता है।
ऐसी मान्यता है की कृष्ण ने गोवर्धन उठाया, वहीं राम की महिमा से समुद्र पर सेतु बांधा गया। गोवर्धन अतिवृष्टि से बचाव तो रामसेतु देवी सीता के मान और असुरों के नाश हेतु बांधा गया था। परशुराम ने ऐसे अनेक चमत्कार किए हैं।
गुजरात में राम गंगा तो नेपाल के दोलखा जिला मे परशुराम बाण जल स्रोत हैं। शुद्व और औषधीय गुणों से परिपूर्ण इन जल स्रोतों को न केवल उन्होंने प्रगट किया अपितु पहाड़ की चोटी से नीचे घाटी और मैदान तक लेकर आए। वहीं समुद्र से भूमि निकाल लोगों को बसाया भी है। ऐसी मान्यताएं केरल और गोवा प्रान्त के लोगों के बीच अब भी है, इसलिए गोवा में आज भी परशुराम देव विशेष पूजनीय हैं जबकि केरल की आकृति परशु के सदृश हैं।
ऐसा ही कुछ पिछली सहस्त्रशताब्दियों में यूरोप ने भी किया है। यहां नीदरलैंड के हॉलैंड मे विज्ञानियों ने भूमि का एक बड़ा टुकड़ा समुद्र से प्राप्त किया है। यह हॉलैंड के कुल भूमि का करीब चालीस प्रतिशत है। भार्गव राम नारी समानता और शिक्षा ज्ञान के भी प्रबल पैरोकार थे।
इन्होंने देवी रोहिणी को युद्ध विद्या की शिक्षा दी वही देवी लोपामुद्रा, सती अनुसुइया और देवी लोमहर्षिणी को लेकर नारी जागृति का पावन अभियान भी चलाया था। इन्होंने दुराचारी सहस्त्रार्जुन के कोप से यदुवंशी और निषाद जातियों की रक्षा की थी। इन्हें अभय दिया, वहीं शिक्षा संस्कार संग कृषि वानिकी और गो पशुपालन का ज्ञान दिया। ऐसी ही विद्या और व्यवस्था उन्होंने सहस्त्रार्जुन द्वारा सताए ब्राह्मणों के लिए भी की थी। राम-कृष्ण बुद्ध के उलट परशुराम का जीवन एकांकी था। पारमार्थिक जीवन के सोच ने परशुराम को आजन्म योगी ब्रह्मचारी रखा।
ऐसा नहीं था अनेक विद्याओं के प्रवर्तक इस योद्धा संन्यासी भगवान के जीवन में प्रेम का प्रस्फुटन नहीं हुआ। किंतु परिवर्तनों के क्रांति दाता भगवान के पास इसके लिए समय शायद नहीं था। वैसे कृष्ण के हृदय में जो स्थान राधा का वैसे ही देवी लोमहर्षिणी परशुराम हृदयंगम थी। यह प्रेम आजन्मा था हा राजपुत्री का ऋषि पुत्र से कभी मिलन नहीं हो पाया।
परशुराम: पूरी व्यवस्था का ही विस्तार प्रचार
बात अगर आर्यत्व के स्वरूप और प्रचार की हो तो यह एक सुंदर सुसंस्कृत सुव्यवस्थित पुरातन भारतीय समाज रचना है। जिसके व्यवस्था और प्रचार में अगस्त, वशिष्ठ और विश्वामित्र का नाम सर्वोपरि है। ऋषि अगस्त इसे दक्षिण के द्रविड़ भूमि तक लेकर गए। जबकि सप्तर्षियों मे विश्वामित्र इसे असुर जैसी जातियों तक ले गए वही वशिष्ठ ने इसके मर्यादाओं का निर्धारण किया था।
मध्यपूर्व के पुराने तुर्क गाथाओं से लेकर इंडोनेशियाई कावी राम कथा तक परशुराम का जिक्र है।
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किंतु परशुराम ने तो पूरी व्यवस्था का ही विस्तार प्रचार बिना किसी भेदभाव के सुदूर स्थानों तक किया था। क्या आर्य, क्या अनार्य,अघोरी औघड़ से लेकर अवर्ण सवर्ण सब को आर्य श्रेष्ठ बनाया था। चमड़ी, जाति, लिंग और आर्थिक स्थिति के आधार पर बिना अंतर भेंट के उन्होंने सबों को गले लगाया अपनाया था।
ऐसी कई घटनाओं का जिक्र पुराण ग्रंथ और इनके चर्चा वाले पुस्तकों में है। जहां रामजी की यात्राएं उत्तर से दक्षिण की है वही कृष्ण की यात्रा पूरब से पश्चिम की है। इसके उलट परशुराम के पदचिह्न आपको भारत वर्ष मे सर्वत्र मिलेंगे। अरूणाचल प्रदेश में परशुराम कुंड है तो गुजरात इनके द्वारा पुनः आर्य बनाई भूमि है।
मान्यता है सहस्त्रार्जुन के शासन में यहां धर्म एवं संस्कृति का लोप हो गया था। नेपाल का सिरहा और जनकपुर, बिहार का सीतामढ़ी और झारखंड के गुमला जिला अंतर्गत आने वाला टांगीनाथ स्थान परशुराम तीर्थ है। उत्तरप्रदेश का बलिया जिला परशुराम के पूर्वज और वंशज भृगुवंशियों की पवित्र भूमि है।
वहीं गोवा और केरल तो परशुराम द्वारा प्रगट, पालित भूमि है। जबकि उड़ीसा का महेंद्रगिरी पर्वत उनकी तपोस्थली है। महाराष्ट्र का रत्नागिरी कोंकण, मध्यप्रदेश का महू तो छत्तीसगढ़ का सरगुजा और उत्तरप्रदेश का शाहजहांपुर भी इनसे जुड़े पावन स्थल है। मध्यपूर्व के पुराने तुर्क गाथाओं से लेकर इंडोनेशियाई कावी राम कथा तक परशुराम का जिक्र है।
कावी पुरानी इंडोनेशियाई भाषा है वही इसमें रचित रामायणनुसार इसके सभी पात्रों का सीधा जुड़ाव हिन्दचीन की धरती से है। बात परशुरामवतार की हो तो यह भी अन्य अवतारों के समान लोकल्याणार्थ है। राम कृष्ण अवतार की तरह इनका भी जन्म लोक मान्यताओं के स्थापन एवं आसुरी शक्तियों के पराभव के लिए हुआ था। किंतु समय की यात्रा के नाते आज ये केवल एक जाति समुदाय विशेष के आराध्य बन रह गए है।
जबकि इस पूर्णावतार को आवेश अवतार या फिर ऋषि पुत्र बताकर खारिज भी किया जाता है। जबकि समय के साथ इनको क्षत्रिय हंता और विरोधी बताए जाने का षड्यंत्र भी घनीभूत हो चला है। आखिर जिस देव की प्रेयसी और दादी क्षत्राणी हो जिस पर ऋषि विश्वामित्र का प्रभाव हो क्या वो भला ऐसा हो सकता है? कदापि नहीं।
ऋषि विश्वामित्र इनके पिता के सगे मामा और बालसखा थे। परशुराम देव ने तो केवल दुराचारी सहस्त्रार्जुन और उनका साथ देने वाले दुष्टों का संहार किया था। ये ठीक वैसा ही है जैसा श्रीराम ने रावण और उसके स्वजनों का और कृष्ण ने कंस और कौरवों के साथ किया था। बात अगर वेश के आधार पर भेद की हो तो ऐसा ही वल्कर काषय वस्त्र राम वनवास मे और बुद्ध देव ज्ञान प्राप्ति बाद पहनते थे।
अगर परशुराम को आवेश के नाते खारिज किया जाए तो ये भी अनुचित है। क्रोध से तो राम और कृष्ण भी वंचित नही थे। इनका आवेश किसी निरपराध के घात हेतु नहीं अपितु अन्याय के विरुद्ध था। यह बुद्ध की करुणा के समान ही जगत कल्याण हेतु था। वहीं केवल आवेश प्रधानता के नाते इनके अनेकानेक गुणों को विस्मृत भी नहीं किया जा सकता।
परशुराम वो माध्यम है जिसके बल पर भारत अड़ोस-पड़ोस के देशों से सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ा सकता है। भारत और भारत के बाहर अवस्थित परशुराम तीर्थो की यात्रा से पर्यटन और संबंध दोनों प्रगाढ़ हो सकते है। किंतु दुर्भाग्य है की मनुष्यता के इतिहास के पहले अवतार आज भी उपेक्षित है। समाज और सरकार दोनों ने इन्हें भूला दिया है।
साईं बाबा और गुरुओं के मंदिर हो सकते है। किंतु परशुराम देव से संबंधित साहित्य, तीर्थ और मंदिरों को लेकर प्रयास नहीं हो सकता है। साहित्यकारों में केएम मुशी और राष्ट्रकवि दिनकर को छोड़ किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की कलम इन पर नहीं चली। वही मन और मंदिरों में विराजने वाले भगवान आज राजनीति की मंडी में खरीद बिक रहे है।
जहां इनके तीर्थो को संवरना नए तीर्थो का सामने आना और इनकी शिक्षाओं को समाज तक जाना चाहिए था। वहां परशुराम स्वार्थी तत्व और जातीय संगठनों के उपक्रम बन रह गए हैं। भारत भूमि के संभवतः ये इकलौते देव हैं जो केवल अक्षय तृतीया को याद आते हैं, जिनका जन्मोत्सव मंदिर मठों मे धार्मिक अनुष्ठान दान भंडार और अक्षम लोगों की सेवा द्वारा संपन्न नहीं होता है। अपितु यह मैदान और हॉलों में नारों के साथ जलसों और राजनैतिक आयोजनों की तरह मनाया जाता है।
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