कभी-कभी सच तक पहुंचने का रास्ता इतना धुंधला होता है कि पता ही नहीं चलता कि मंजिल कहां है। कई इतिहासकारों ने आगरा के सिकंदरा में मौजूद अकबर के मकबरे के बारे में लिखा है कि इसमें इस्लामी, बौद्ध, हिंदू व ईसाई धर्म के प्रतीकों का इस्तेमाल किया गया, या इसमें सुलहकुल का सिद्धांत दिखता है। मकबरे की खासियत यह है कि अकबर ने इसे बनाने का विचार अपने जीवनकाल में ही कर लिया था।
इसे बहिश्ताबाद का नाम दिया गया, यानी स्वर्ग सरीखा स्थान। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन यह इमारत आज भी दुनिया भर के पर्यटकों को अपनी तरफ खींचती है। आगरा के जिस इलाके (सिकंदरा) में यह बना है, उसे नाम ही सल्तनत काल के शासक सिकंदर लोदी से मिला है। अकबर के शासनकाल में 1602 ईस्वी में निर्माण शुरू हुआ और करीब 15 लाख रुपये लागत आई। 1605 में अकबर का निधन हो गया। फिर उसके उत्तराधिकारी जहांगीर ने इसे 1613 में पूरा करा दिया। पर एक बात है, जो इतिहासकारों को उलझन में डाल देती है।
दरअसल, मुगल वास्तुकला में तहखाने में असली कब्र, उसके ऊपर कब्र की प्रतिकृति और फिर गुंबद होता है। मगर इस मकबरे के तहखाने में कब्र तो है, पर उसके ऊपर कब्र की प्रतिकृति और गुंबद नहीं है। तहखाने में संगमरमर से बनी अकबर की मुख्य कब्र बहुत सादी है और इस पर कुछ नहीं लिखा है। हैरानी की बात यह है कि पांचवीं मंजिल पर असली कब्र की प्रतिकृति है, जो अलंकृत है और बेहतरीन कारीगरी की मिसाल है। इस पर अरबी व फारसी में अल्लाह के 99 नाम लिखे गए हैं। इसे ही अकबर की कब्र की प्रतिकृति माना जाता है।
पर असली राज चौथी मंजिल का है। वरिष्ठ पत्रकार थॉमस स्मिथ ने अपने लेख में लिखा था कि वर्षों तक किसी की भी नजर चौथी मंजिल पर मौजूद कब्र पर नहीं पड़ी। लेकिन एक शोधार्थी ने इसे खोज निकाला। यहां पहुंचना आसान नहीं था। यहां तक पहुंचने के लिए कोई सीढ़ी नहीं बनाई गई। फर्श से छह फीट की ऊंचाई पर एक खिड़की है, जिससे एक बड़े गुप्त कक्ष में पहुंचा जा सकता है। पर इसके लिए पहले सीढ़ी लगानी होगी। कक्ष के मध्य में प्लास्टर और ईंटों से बनी साधारण कब्र है। यह किसकी है, कहीं भी इसका कोई ब्योरा उपलब्ध नहीं है।
इतालवी यात्री मनुची ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि 1688 में औरंगजेब के शासनकाल में भरतपुर के राजाराम के नेतृत्व में जाटों ने मकबरे पर हमला किया और अकबर की कब्र को नुकसान पहुंचाया। इतिहासकार मानते हैं कि इस तरह की संभावनाओं से आशंकित होकर ही तो कहीं अकबर ने वह गोपनीय कक्ष नहीं बनवाया था, जहां उसे दफन किया जाए। यह ऐसा सवाल है, जिसका जवाब शायद इसे जानने वाले के साथ ही दफन हो गया।
वर्षों तक किसी की भी नजर चौथी मंजिल पर मौजूद कब्र पर नहीं पड़ी। लेकिन एक शोधार्थी ने इसे खोज निकाला। इतिहासकार ऐसा मानते हैं कि शायद हमले की संभावनाओं से आशंकित होकर अकबर ने वह गोपनीय कक्ष बनवाया था, जहां उसे दफन किया जाए। लेकिन इसका राज उसकी मौत के साथ ही दफन हो गया।