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दिल्ली को खतरनाक वायु प्रदूषण को हराने के लिए सख्त कानूनों की जरूरत

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वास्तव में हवा से होने वाली बीमारियों की सूची धीरे-धीरे बढ़ रही हैं - फोटो : amar ujala
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आज, यह तय करना कठिन है कि मानवता के लिए बड़ा खतरा कौन है- आतंकवाद या प्रदूषण। जाहिर तौर पर आतंकवाद थोड़ा अधिक भयानक लगता है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि प्रदूषण भारत जैसे देशों में अधिक तबाही मचा रहा है। यह दानव इतना खतरनाक हो रहा है कि लोग अपने चेहरे को ढके बिना बाहर नहीं जा सकते, और अब, यह घरों के अंदर भी लोगों का दम घोंट रहा है। यह क्रूड और बेवजह का प्रदूषण मानव जाति पर अंधाधुंध हमला कर रहा है।

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हालांकि आजकल बहुत से पर्यावरण बचाओ अभियान चल रहे हैं, प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ता जा रहा है, न केवल महानगरों में, बल्कि छोटे शहरों और कस्बों में भी, हवा में ज़हर घुल रहा है। लगातार वायु की गुणवत्ता में गिरावट अस्थमा, कैंसर और फेफड़ों के संक्रमण जैसी कई गंभीर बीमारियों का प्रमुख कारण है।

वास्तव में हवा से होने वाली बीमारियों की सूची धीरे-धीरे बढ़ रही हैं, लेकिन समाधानों की वर्तमान सूची केवल कुछ विकल्पों तक ही सीमित है, जो यह दिखाती है कि प्रदूषण की समस्या के बारे में सरकार कितनी चिंतित है, जिसे कुछ गंभीर योजनाओं और उनके प्रभावी कार्यान्वयन से बहुत प्रभावी ढंग से निपटा जा सकता है।
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दिल्ली वायु प्रदूषण के चलते पूरी दुनिया में चर्चा में है। - फोटो : अमर उजाला
आपदा की कगार पर
लैंसेट प्लेनेटरी हेल्थ में हालिया रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2017 में वायु प्रदूषण ने भारत में लगभग 12 लाख मौते होती हैं जो प्रदूषण के कारण दुनिया के किसी भी देश में होने वाली सबसे ज्यादा मौतें हैं।

रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि भारत की कुल आबादी का 75 प्रतिशत से अधिक गंभीर रूप से वायु प्रदूषण स्तर के संपर्क में है, जो सरकार द्वारा निर्धारित स्तर से अधिक है। हालत दिन-ब-दिन गंभीर होती जा रहे हैं।

भारत के सभी महानगरों में टॉक्सिन की मात्रा पहले ही सीमा से अधिक हो गई है, और दिल्ली उस सूची में सबसे ऊपर है जहां वायु प्रदूषण 1000+ µg/m3 कण तक पहुंच गया है। प्रदूषण से न केवल दरवाजों के बाहर बल्कि रहने और काम करने के स्थानों में भी घबराहट हो रही है।
 
हाल ही में, प्रदूषण के स्तर में अचानक बढ़ने के कारण, दिल्ली सरकार ने राज्य में स्वास्थ्य आपातकाल की घोषणा की और सभी सार्वजनिक और निजी स्कूल पांच दिनों के लिए बंद कर दिए गए। लेकिन, घर पर भी बच्चों के लिए कोई बड़ी राहत नहीं है क्योंकि कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य जहरीली गैसों का वहां पहले ही अतिक्रमण हो चुका है। 

ब्रिथ इजी कंसल्टेंट्स के एक हालिया सर्वेक्षण के अनुसार, दिल्ली के कई घरों में CO2 का स्तर 750 पीपीएम की सुरक्षित सीमा को पार कर गया है और 3,900 पीपीएम तक पहुंच गया है।

आगे फॉर्मलडिहाइड, टोल्यूनि, बेंजीन, अमोनिया और ट्राइक्लोरोइथीलीन जैसी घातक गैसों की बढ़ती मात्रा घरों को गैस चैंबर में बदल रही है। याद रखें, बाजार में उपलब्ध कोई भी आवासीय वायु शोधक दूषित वायु को पूरी तरह से शुद्ध नहीं कर सकता है।
 
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दिल्ली वायु प्रदूषण की स्थिति गंभीर हो चुकी है। - फोटो : अमर उजाला
प्रदूषण को हटाने के लिए नीतियों की कमी
यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में प्रदूषण की खतरनाक स्थिति के बावजूद,न तो राज्य सरकारों और न ही केंद्र ने कभी मामले को गंभीरता से लिया है। लगभग पांच साल पहले, ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज रिपोर्ट 2014 ने, अधिकारियों को चेतावनी दी थी कि इनडोर वायु प्रदूषण भारत में दूसरा सबसे बड़ा हत्यारा है; आउटडोर वायु प्रदूषण की तुलना में बहुत अधिक खतरनाक।

खाना पकाने के स्टोव, एयर कंडीशनर, सफाई उत्पादों में रसायन, धूप की कमी और खराब वेंटिलेशन घरों के लिए एक जहरीला कॉकटेल हैं। हैरानी की बात है, सभी चेतावनियों के प्रती बहरी और धुंध के प्रती अंधी सरकारें अभी भी कोई ठोस उपाय विकसित करने में असमर्थ हैं।
 
प्रदूषण को रोकने के लिए क्या करना होगा?  
आमतौर पर प्रदूषण का स्तर नवंबर के महीने में अधिकतम पहुंच जाता है, जब हरियाणा और पंजाब में किसान अगले बुवाई के मौसम के लिए अपनी जमीन तैयार करने के लिए ठूंठ (फसल अवशेष) जलाते हैं। हर साल, सरकार उन्हें वैकल्पिक या समाधान की पेशकश किए बिना ऐसा न करने की चेतावनी देती है।

यहां, राज्य सरकारों का यह कर्तव्य है कि उन्हें आधुनिक कंबाइन हार्वेस्टर प्रदान करें ताकि उन्हें ठूंठ न जलाना पड़े। हालांकि कई किसान इन कंबाइन हार्वेस्टर को अनुदानित दरों पर भी नहीं खरीद सकते, ऐसे किसानों को इन्हें दैनिक या साप्ताहिक आधार पर किराए पर देने की सुविधा दी जानी चाहिए।
 
अतीत में कई देश इसी तरह की समस्याओं से गुजरे हैं, और इसका सफलतापूर्वक समाधान भी किया है, निश्चित रूप से, चीन इसका ताजा उदाहरण है। 2012-13 में, जब चीन में पीएम 2.5 755 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर (g/m³) को छू गया, उनकी सरकार ने 2017 के अंत तक प्रदूषण को रोकने के लिए तुरंत 277 बिलियन डॉलर की योजना की घोषणा की। और, इसके बाद आए परिणाम प्रदूषण से जूझ रहे अन्य देशों के लिए बेंचमार्क बन गए।

आज, दुनिया की 99 प्रतिशत इलेक्ट्रिक बसें चीन में चलती हैं, और वर्ष के दौरान कारों की बिक्री पर सख्त कैपिंग है। वायु प्रदूषण में सबसे अधिक योगदान करने वाले क्षेत्रों में वास्तविक उत्सर्जन की जांच करने के लिए ड्रोन का उपयोग किया जाता है, और देश में अधिक उन्नत धूल नियंत्रण प्रौद्योगिकियों को पेश किया जाता है और बढ़ावा दिया जाता है।

आखिरकार, बीजिंग निर्धारित 5 वर्षों में पार्टिकुलेट मैटर के स्तर को कम करने में सफल रहा है। यह पूरा प्रकरण बताता है कि दृढ़ निश्चय और ईमानदारी से किए गए प्रयासों से प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकता है, और देश को बचाया जा सकता है।  

भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता डॉ. विवेक सिंह द्वारा
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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