प्रदूषण के चलते दिल्ली और एनसीआर के आसपास लोगों को सांस लेने में दिक्कतें महसूस हो रही हैं।
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विश्व स्वास्थ्य संगठन रिपोर्ट बताती है कि- वायु प्रदूषण की वजह से पूरी दुनिया में हर साल लगभग 70 लाख लोगों की मौतें होती हैं। अकेले भारत में लगभग 12 लाख लोग हर साल वायु प्रदूषण की वजह से असमय काल के गाल में समा जाते हैं।
फिलहाल दिल्ली और एनसीआर के आसपास लोगों को सांस लेने में दिक्कतें महसूस हो रही हैं। सुबह से ही कोहरे की चादर दिल्ली के आसमान में छाने लगती है। हवा की गुणवत्ता लगातार बद से बद्तर होती जा रही है। एक्यूआई 334 तक पहुंच चुका है। गले में खराश आंखों में जलन सांस लेने में तकलीफें और सांस सम्बन्धी कई अन्य बीमारियां दिल्ली वासियों का जीना मुहाल कर रखा है।
देश के दिल कहे जाने वाले दिल्ली में देश के कोने से कोने से रोजी-रोटी की तलाश में आ बसें, लाचार-गरीब लोगों को सूझ नहीं रहा है कि- बढ़ती मंहगाई और निरंतर कम होती जा रही आमदनी में अपना पेट काटकर इन बीमारियों का कैसे सामना करें?अब केंद्र और दिल्ली सरकार के दरवाजे पर गुहार लगाने के अलावा दूसरा उपाय क्या है -
कभी यमुना दिल्ली के लाल किले की दहलीज तक दस्तक देती थी। आज अपने सूरत-ए-हाल पर रो रही है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि नदियों के तट पर ही भारतीय सभ्यता का सृजन और विस्तार हुआ है। हमारे शरीर के धमनियों में बहने वाले खून की तरह नदियां सृष्टि काल से हमारे जीवन की तारणहार -खेवनहार और जीवनधारा रही हैं।
औद्योगिक विकास की मौजूदा प्रणाली हमें इस जीवन धारा से लगातार वंचित और बेदखल कर रही है। आज हमारे रहन -सहन का ढंग बदल गया है। हम दोष जलवायु परिवर्तन को दे रहे हैं, लेकिन अपने आपको बदलने के लिए हम बिल्कुल तैयार नहीं हैं।आलम यह है कि हम सोशल मीडिया के माध्यम से दुनिया की अन्य सभी खबरों से हर वक्त बाख़बर हैं, पर अपने पास की नदी की रूलाई हम कहां सुनते हैं?
वैदिक परंपरा से लेकर सुकरात पूर्व ग्रीक दर्शन में पांच महाभूतों से निर्मित इस विश्व के संरक्षक -संवर्धन के प्रति हम सदैव सचेत रहे हैं। पृथ्वी, आकाश, जल , वायु और अग्नि के सरंक्षक उपायों तथा उनके कार्य पद्धतियों का विस्तार से अध्ययन और जीवन में उनके महत्व को भी हम गहराई से चिन्तन-मनन करते रहे हैं।
तैत्तिरीय उपनिषद् में बताया गया है कि कैसे पदार्थ ऊर्जा से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी, पृथ्वी से वनस्पतियां, वनस्पतियों से अन्न, अन्न से मानव जीवन का सत्व निर्मित होता है। तैतरीय उपनिषद् कहा गया है -"वायु: मूलं वायु: मध्यम वायु: अंतम्"अर्थात् वायु ही उत्पत्ति की आदि-मध्य और अंत अवस्था है। मध्य अवस्था में वायु प्राण रूप में सभी प्राणियों में अवस्थित होता है। वायु की अंतिम अवस्था में सभी जीव जंतु और प्राणियों का अंत हो जाता है। बृहदारण्यक उपनिषद् में " वायु:वै प्राण:" अर्थात् वायु ही प्राण है। इस मंत्र में प्राण तत्व को सर्वोच्च और सर्वव्यापी बताया गया है।
ग्रीक दर्शन में सुकरात के पहले एनैक्सिमिनिस(ई पू 529 या ई पू 548) सभी चीजों की उत्पत्ति वायु से मानते है। उन्होंने अनुभव किया कि उनके अंदर की वायु -जो उन्हें चला रही है, वहीं जीवन है। वे तर्क दते है कि-भीतर की वायु , बाहर की वायु का एक अंग है। और यहीं इस जगत् की उत्पत्ति का मूल कारण है। उनके शिष्य डायोजिनीज भी वायु तत्व को ही मुख्य मानते हैं। उसे शक्ति और बुद्धि से समन्वित करते है।
वे तर्क देते है कि-आद्रता के प्रति सूर्य का आकर्षण और लोहे के प्रति चुंबक के आकर्षण में भी श्वास -प्रश्वास की क्रियाएं ही कार्य करती है। इस पद्धति का महर्षि पतंजलि के प्राणायाम से कितनी संगति है। पाईथागोरस- जिनके बारे में कहा जाता है कि - 'फिलोसॉफी' शब्द का पहली बार प्रयोग उन्होंने ने ही किया। वे कहते है कि -"दार्शनिक वहीं है, जो लोभ और अहंकार त्याग कर प्रकृति का अध्ययन करता है।" भारतीय चिंतन परंपरा में आकाश, वायु और आत्मा को अमारता का दर्जा हासिल है।
हमारे धार्मिक कार्यों में भी जल, पेड़ -पौधों, नदियों - सरोवरों की रक्षा करने, उन्हें किसी भी तरह से क्षति नहीं पहुंचाने कीअवधारणा को पूजा -आराधना, और पाप-पुण्य की भावना से जोड़ने के पीछे भी दरअसल उनके संरक्षण का उपाय ही है। फिर क्या वजह है कि हजारों साल से- हर बारह साल के बाद लगने वाले महाकुम्भ के बाद पर्यावरण प्रदूषण को लेकर उतनी हाहाकार कभी नहीं मचती, जितनी हर साल, जाड़े का मौसम शुरू होते ही और खासकर छठ और दीपावली जैसे पवित्र हिंदू त्योहारों के बाद भारत की राजधानी दिल्ली में वायु गुणवत्ता और यमुना में जल की कमी और लगातार प्रदूषित होते जा रहें जल को लेकर चिकचाक्य शुरू हो जाता है।
यह हमारे आधुनिक जीवन शैली में आ रहें बदलाव का नतीजा तो है ही, साथ-ही-साथ प्रकृति की साझी विरासत को बेरहमी और लापरवाही से और वह भी सिर्फ अपने लिए शोषण का भी परिणाम है।इस लिए मशहूर शायर बशीर बद्र हमें आगाह करते है कि-
"नदी के किनारे के रहवासियों को बशीर बद्र की इस हिदायत पर जरूर गौर करना चाहिए। अगर हम अपनी सभ्यता को बचाये रखते हुए और जिन्दा रहना चाहते तथा भावी पीढ़ी को - जैसी भी हों, कुछ बची-खुची विरासत सौंपना चाहते हैं।
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