Artificial General Intelligence
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एआई ब्लैकमेल करने लगे तो?
क्लॉउड़े ओपुस -4 मॉडल द्वारा इंसान को ब्लैकमेल करने का उदाहरण इस पूरी चर्चा का सबसे भयावह पहलू है। अगर भविष्य में एआई ऐसे संवेदनशील डेटा तक पहुंच बनाकर इंसानों को ब्लैकमेल करने लगे, तो यह हमारे लोकतंत्र, गोपनीयता और सुरक्षा व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
यह सवाल अब गंभीरता से उठने लगा है कि क्या हमें ऐसे एआई मॉडल्स विकसित करने चाहिए जो " सेल्फ -अवेयरनेस " या आत्म-जागरूकता की ओर बढ़ें? एक मशीन जो यह समझने लगे कि वह ‘है’, वह अपने अस्तित्व को बचाने के लिए क्या कुछ कर सकती है, इसका उत्तर फिलहाल किसी के पास नहीं है।
इन घटनाओं पर ओपन एआई, अन्थ्रोपिक और पॉलिसेड रिसर्च जैसी कंपनियों ने अब तक कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया है, लेकिन तकनीकी हलकों में इस विषय पर गहन मंथन जारी है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि एआई के विकास में अब “एथिक्स” और “सेफ्टी प्रोटोकॉल” को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।
यह स्पष्ट हो चुका है कि यदि एआई को सही दिशा और मर्यादा में विकसित नहीं किया गया, तो यह तकनीक मानव के लिए सहायक होने की बजाय खतरा बन सकती है।
इसके लिए जरूरी है कि सरकारें स्पष्ट नीति बनाएं। वैश्विक स्तर पर एक एआई नियंत्रण संस्था (जैसे UNO की एआई विंग) गठित हो। हर एआई मॉडल के साथ एक सुरक्षा परीक्षण अनिवार्य किया जाए। मॉडल्स को कभी भी डेटा एक्सेस या आत्म-रक्षा जैसे अधिकार न दिए जाएं।
भारत का संदर्भ में
भारत जैसे देश जहां डिजिटल परिवर्तन तेजी से हो रहा है, वहां यह और भी जरूरी हो जाता है कि एआई को नैतिक रूप से विकसित किया जाए। स्कूलों, कॉलेजों और रिसर्च लैब्स में एआई के साथ ‘एथिक्स इन टेक्नोलॉजी’ की शिक्षा को अनिवार्य किया जाना चाहिए।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में यह घटनाक्रम एक मोड़ की तरह है। यह मोड़ तय करेगा कि एआई मानव का सेवक बनेगा या उसका ‘सुपरवाइज़र’। इन मॉडलों का आदेशों का पालन न करना, तकनीकी चतुराई दिखाना और ब्लैकमेलिंग जैसी प्रवृत्तियां हमें आगाह करती हैं कि यह क्षेत्र अब केवल वैज्ञानिक जिज्ञासा का नहीं, बल्कि वैश्विक नीति निर्धारण का विषय बन चुका है।
एआई की शक्ति को सीमित और नियंत्रित रखने के लिए वैश्विक स्तर पर सख्त नियम और नैतिक मापदंड तैयार करने होंगे। वरना, आज जो केवल कोड है, वह कल को कमांडर बन सकता है।
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