वहीं इसका दूसरा पहलू भी है। काम जब तेज होता है तो उम्मीदें भी बढ़ती हैं। कई फ्रीलांसर बताते हैं कि अब उनसे कम समय में स्टोरी मांगी जाती है, यही नहीं कई मामलों में बजट भी घटा दिया गया है। यह मान लिया जाता है कि जब एआई है, तो काम में इतना वक्त क्यों लगे? एआई के साथ सबसे बड़ा जोखिम सत्यापन का है। जनरेटिव एआई कभी-कभी ऐसे तथ्य, आंकड़े या उद्धरण गढ़ देता है, जो सुनने में विश्वसनीय लगते हैं लेकिन होते नहीं। इस कारण जो पत्रकार एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें हर जानकारी की दोबारा जांच करनी पड़ती है। कई बार यह जांच-पड़ताल इतना समय ले लेती है कि एआई से मदद लेने के बाद एक अच्छी स्टोरी तैयार करने में पहले जितना ही समय लग जाता है। पत्रकार मानते हैं कि बिना वेरिफिकेशन के एआई पर भरोसा करना पेशे के लिए खतरनाक हो सकता है, क्योंकि एक भी बड़ी गलती पाठकों का भरोसा तोड़ सकती है।
संपादकों के सामने चुनौतियां और भी जटिल हैं। उन्हें अब सिर्फ अच्छी स्टोरी नहीं बल्कि भरोसेमंद लेखक भी ढूंढना होता है। कुछ संस्थानों ने नए तरीके अपनाने शुरू कर दिए हैं, जैसे लेखकों से ड्राफ्ट का वर्जन का हिस्ट्री मांगना या यह दिखाने को कहना कि उन्होंने रिपोर्टिंग कैसे की। यह कदम फर्जी एआई जनरेटेड कंटेंट को पकड़ने में मदद कर सकता है, लेकिन इसका एक साइड इफेक्ट भी है। नए और युवा पत्रकारों के लिए इंडस्ट्री में प्रवेश और कठिन हो सकता है, क्योंकि उनके पास पहले से बने नेटवर्क या पुराने बाइलाइन नहीं होती हैं।
एआई का असर सिर्फ लेखकों तक सीमित नहीं है। इलस्ट्रेटर और फोटोग्राफर जैसे क्रिएटिव प्रोफेशनल्स पर इसका असर और भी गहरा है। कई क्लाइंट अब सीधे एआई जनरेटेड इमेज का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे इंसानी कलाकारों के प्रोजेक्ट कम हो रहे हैं। कुछ मामलों में कलाकारों से कहा जा रहा है कि वे एआई जैसी शैली में काम करें, जिसके चलते उनकी रचनात्मक स्वतंत्रता सीमित हो रही है।
अब सवाल है कि क्या एआई पत्रकारों की जगह ले लेगा? ज्यादातर फ्रीलांसर्स का मानना है कि ऐसा पूरी तरह संभव नहीं है। एआई लिख सकता है, लेकिन वह रिपोर्टिंग नहीं कर सकता। वह सवाल नहीं पूछता, जमीन पर जाकर हालात नहीं देखता और नैतिक फैसले नहीं लेता। असल चुनौती यह तय करने की है कि एआई को कहां तक इस्तेमाल किया जाए और कहां इंसानी दखल अनिवार्य रहे।
इस कारण यह कहना स्पष्ट होगा कि फ्रीलांस पत्रकारिता खत्म नहीं हो रही, बल्कि बदल रही है। एआई ने काम करने के तरीके को तेज और आसान बनाया है, लेकिन साथ ही भरोसे, पहचान और पेशेवर नैतिकता के नए सवाल भी खड़े किए हैं। भविष्य की पत्रकारिता शायद इंसान और मशीन के सहयोग से बनेगी, जहां एआई एक टूल होगा, लेकिन जिम्मेदारी, सत्य और संवेदनशीलता की कमान इंसान के हाथ में ही रहेगी।
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