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एआई समय: सोचने का काम तो मशीन पर न छोड़ें, कला में मौलिकता और मेहनत का महत्व

Sat, 25 Apr 2026 06:58 AM IST
Nirmal Kant कोलसन व्हाइटहेड, द न्यूयॉर्क टाइम्स

सार

आप किसी भी क्षेत्र में हों, एक कलाकार की तरह मेहनत और संघर्ष कीजिए, क्योंकि रचनात्मकता कोई आसान रास्ता नहीं है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
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शब्दों के क्षेत्र से जुड़े होने के कारण मुझसे अक्सर साहित्य और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर राय मांगी जाती है। कई लोग तब चौंक जाते हैं, जब मैं खुलकर कहता हूं कि मुझे एआई बेहद पसंद है। मैं अपने लगभग हर काम में एआई का इस्तेमाल करता हूं। मेरे परिवार के लोग भी। जैसे, मेरे अंकल अब सब्जी खरीदने जैसे साधारण काम के लिए भी एआई का सहारा लेते हैं। एआई पहले से बता देता है कि दुकान पर कब भीड़ कम होगी। इससे वह आराम से जाकर बिना इंतजार किए सामान ले आते हैं। कल्पना कीजिए, एक ऐसी दुनिया की, जहां आपको छोटी-छोटी चीजों के लिए भी इंतजार न करना पड़े। अब यह कल्पना हकीकत बन चुकी है।
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मेरे पास भी एक डिजिटल एजेंट है, जो मेरे कामकाज को व्यवस्थित करने से लेकर रोजमर्रा की हर गतिविधि में मेरी मदद करता है। मैंने इसका नाम ‘गूच’ रखा है। पहले मैं अव्यवस्थित जीवन जी रहा था, पर इसके आने से सब कुछ अधिक स्पष्ट और व्यवस्थित लगता है। हालांकि, कुछ शोध बताते हैं कि इन डिजिटल साधनों पर अत्यधिक निर्भरता सोचने-समझने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है। फिर भी, आज लोग अपनी सुविधानुसार बिना झिझक के एआई का उपयोग कर रहे हैं। पर एक क्षेत्र ऐसा है, जहां सावधानी जरूरी है और वह है कला। यदि कोई व्यक्ति अपनी रचनात्मकता के स्थान पर पूरी तरह एआई पर निर्भर हो जाता है, तो उसकी मौलिकता पर सवाल उठ सकते हैं।

कुछ लोग दलील देते हैं कि वे एआई का इस्तेमाल सिर्फ नए विचारों के लिए करते हैं। पर अगर किसी को यह भी नहीं पता कि उसे क्या रचना है, क्या लिखना है, क्या चित्रित करना है, तो यह सवाल खड़ा होता है कि क्या वह सही पेशे में है। कला का मूल उद्देश्य ही सृजन है, कल्पना है, नए विचार गढ़ना है। ऐसे में, मशीन पर निर्भरता रचनात्मकता के मूल तत्व को ही कमजोर करती है। एक और तर्क यह दिया जाता है कि एआई का उपयोग केवल शोध के लिए किया जाता है, भले ही वह 30 प्रतिशत मामलों में गलत या भ्रामक जानकारी दे। पर ऐसा ‘सहायक’ किस काम का, जो बार-बार गलती करे? ऐसी त्रुटियां तो इन्सान भी कर सकता है। और यहीं से यह आशंका जन्म लेती है कि क्या यह तकनीक धीरे-धीरे मनुष्यों की जगह लेने की कोशिश कर रही है।
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हालांकि, यह भी जरूरी है कि इसे व्यक्तिगत आलोचना के रूप में न देखा जाए। रचनात्मक प्रक्रिया कठिन होती है और कई बार कलाकार उसमें अटक जाते हैं। ऐसे ही एक अनुभव में, जब एक लेखक अपनी किताब के अंतिम चरण में अटक गया, तो उसने एआई की मदद ली। उसने अपराध, पुलिस व्यवस्था और भ्रष्टाचार जैसे विषयों पर एक प्रॉम्प्ट तैयार करके एआई से सहायता मांगी। यह संकेत है कि संघर्ष के क्षणों में तकनीक का सहारा लेना स्वाभाविक है, पर पूरी तरह उसी पर निर्भर हो जाना एक अलग बहस को जन्म देता है। जब मैंने ‘गूच’ से उस लेखक की समस्या पर जवाब मांगा, तो उसने बताया कि आपराधिक न्याय व्यवस्था में दो महत्वपूर्ण पक्ष होते हैं-पुलिस और जज। फिर अचानक उसने कहा, ‘चंग-चंग’। मैंने फिर पूछा कि क्या यह किसी टीवी शो की शुरुआती लाइन नहीं है? उसने फिर अजीब-सा जवाब दिया-‘समझ नहीं आ रहा, समझ नहीं आ रहा, मारो-मारो’।

पहले मुझे लगता था कि एआई को नकल करने वाली मशीन कहना शायद बढ़ा-चढ़ाकर कहना है। आखिर यह कोई इन्सान नहीं है, बल्कि सिर्फ तेजी से काम करने वाली तकनीक है, जिसमें भावनाएं नहीं होतीं। पर बार-बार गूच की ‘चंग-चंग’ की आवाज मेरे दिमाग में गूंजती रही। फिर, मुझे सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि क्या यह सिर्फ एक आवाज थी, या किसी छिपे अपराध-बोध की दस्तक? क्या गूच अपना कोई गुनाह कुबूल कर रहा था? तब मेरे मन में एक और सवाल आया कि अगर कोई मशीन अपराध-बोध जैसा कुछ महसूस करने लगे, तो क्या वह सिर्फ मशीन रहती है, या कुछ और बन जाती है?

असल बात यह है कि इन्सान में भी कई कमजोरियां होती हैं। और यह एक पुराने व सच्चे सिद्धांत की याद दिलाता है कि हमें खुद मेहनत करके ही काम करना चाहिए। इसलिए, किताब को पूरा पढ़िए, सिर्फ उसका सार मत देखिए। खुद लिखने की कोशिश कीजिए, केवल प्रॉम्प्ट या आसान तरीकों पर निर्भर मत रहिए। एक कलाकार की तरह मेहनत कीजिए, संघर्ष कीजिए और उसे महसूस कीजिए, क्योंकि रचनात्मकता कोई आसान रास्ता नहीं है, और शायद उसी कठिनाई में उसकी असली कीमत छिपी होती है।
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