फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

वृद्धावस्था: जीवन के अनुभवों से मिलती सच्ची बुद्धिमत्ता, किताबें सिर्फ मार्गदर्शक भर हैं

Fri, 27 Mar 2026 08:22 AM IST
Shivam Garg एरिक एरिक्सन

सार

वृद्धावस्था में प्राप्त ज्ञान किताबों से नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों से आता है। यदि उन अनुभवों को सही ढंग से समझा जाए, तो जीवन का यह पड़ाव निराशा नहीं, बल्कि संतोष, प्रेम और गहरी समझ का समय बन जाता है।
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिन्ट/एजेंसी
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

वृद्धावस्था ही वह समय है, जब व्यक्ति अपने पूरे जीवन को पीछे मुड़कर देखता है और अपने सपनों, संघर्षों और वास्तविकताओं की तुलना करता है। इसी अवस्था में असली विनम्रता जन्म लेती है, क्योंकि इन्सान अपनी सीमाओं और क्षमताओं को यथार्थ रूप में समझने लगता है। वृद्धावस्था  में व्यक्ति प्रेम की जटिलताओं को एक नए दृष्टिकोण से देखने लगता है। यह दृष्टि केवल तर्क तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इंद्रियों, अनुभवों और सौंदर्यबोध को भी साथ लेकर चलती है।

विज्ञापन


यदि हम केवल तर्क पर ही निर्भर रहें और अपने अनुभवों व इंद्रियों की आवाज को अनसुना कर दें, तो हमारी समझ अधूरी रह जाती है। सच्ची समझ तब विकसित होती है, जब हम महसूस करना, देखना और जीना, तीनों को एक साथ जोड़ते हैं। युवा अवस्था में जहां प्रेम अक्सर जुनून से जुड़ा होता है, वहीं उम्र बढ़ने के साथ व्यक्ति को कोमलता का महत्व समझ आता है। यह सीख मिलती है कि सच्चा प्रेम वह है, जिसमें अपेक्षाएं कम हों और देने की भावना अधिक हो। जीवन के इस चरण में अगली पीढ़ी के लिए कुछ छोड़ जाने की भावना बहुत महत्वपूर्ण होती है। आज की दुनिया की एक बड़ी कमी यही है कि लोग भविष्य की पीढ़ियों के बारे में कम सोचते हैं।

सच्ची बुद्धिमत्ता यही है कि हम अपने कार्यों के प्रभाव को आगे तक देखें और एक बेहतर दुनिया बनाने में योगदान दें। वृद्धावस्था में प्राप्त ज्ञान किताबों से नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों से आता है। असली बुद्धि वही है, जो अनुभवों को गहराई से समझकर और आत्मसात करके विकसित होती है। केवल पढ़ने से नहीं, बल्कि जीने से सीख मिलती है। जीवन का अंतिम चरण एक ऐसी अवस्था बन सकता है, जहां व्यक्ति अपने जीवन को पूर्णता के साथ स्वीकार करता है। यदि जीवन के अनुभवों को सही ढंग से समझा जाए, तो वृद्धावस्था निराशा नहीं, बल्कि संतोष, प्रेम और गहरी समझ का समय बन जाता है, जहां इन्सान खुद से और दुनिया से सच्चे अर्थों में जुड़ पाता है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें