हमें विश्व हॉकी महासंघ को मजबूर करना होगा कि भारतीय हॉकी नहीं तो कुछ भी नहीं।
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पक्षपाती अंपायरिंग और खेल
भले ये बात पुरजोर तरीके से उन बेईमान अंपायरों तक न पहुंची हो किन्तु एक अप्रत्यक्ष वेव उन तक जरूर पहुंच रही थी भारत में इस तरह के रोष को लेकर तो कांस्य पदक के मैच में जर्मनी के खिलाफ उनकी अंपायरिंग उतनी पक्षपाती नहीं रही जितनी अब तक देखने को मिल रही थी। ये अपनी गलती या अपनी बेईमानी पर पर्दा डालने जैसा भी था। फिर भी कुछ एक मामलों में भारत के खिलाफ निर्णय तो हुए भी किन्तु वे निर्णय भारतीय हॉकी की तेजी को डगमगा नहीं सके और अंततः हमने मैच जीत कर सूखे को खत्म किया।
इस वक्त भारतीय हॉकी और उसके प्रशंसकों में ऊर्जा की नई किरण दमकने लगी है। यही अवसर है जब हम अपनी हॉकी को कंधों पर बैठाकर जश्न भी मनाएं और इसे दुनिया के आसमान पर पुनः छा जाने के लिए उसका सपोर्ट भी करें। जनमानस ही नहीं बल्कि हॉकी इंडिया भी इस अवसर को समझे। उसके पास ये सुनहरा मौका है कि वो हॉकी के दिन फेर सकता है। क्रिकेट की तरह दुनिया पर अपना दबाव बनाकर अपने खेल को न केवल मजबूत बनाया जाए बल्कि विश्व हॉकी महासंघ को मजबूर भी कर दें कि भारतीय हॉकी नहीं तो कुछ भी नहीं।
यदि हॉकी इंडिया ऐसी पहल करती है तो हॉकी को धनाड्य करने की शुरुआत भी होगी। ये शुरुआत हुई तो हमारा संगठन मजबूत बनेगा। संगठन मजबूत हुआ तो खिलाड़ियों के जीवन में सुरक्षा की भावना पैदा होगी, वो अच्छे से अच्छा प्रदर्शन करेंगे। उनका बेहतर प्रदर्शन रहा तो बड़े-बड़े स्पॉन्सर्स आएंगे। स्पॉन्सर्स आए तो हॉकी अपनी पैठ जमाएगी, और यही पैठ तो चाहिए जब हम यूरोपियन लॉबी की, उसकी मानसिकता वाली पैठ को टक्कर देंगे और मजबूर कर देंगे कि बिना भारत के हॉकी दुनिया में बात नहीं बनने वाली। ये तमाम अवसर दिए हैं हमारे खिलाड़ियों ने ओलम्पिक का कांसा जीत कर। इसे भुनाना होगा। आग जलानी होगी।
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