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मानसूनी आपदाओं के बाद अब चरम सर्दी की दस्तक

सार

भीषण लू के थपेड़ों के बाद हम अभी मानसून की आपदाओं से पूरी तरह निपटे भी नहीं कि एक और संकट दरवाजे पर दस्तक देने को तैयार है। भरतीय मौसम विभाग द्वारा जारी पूर्वनुमान के अनुसार इस बार प्रशान्त महासागर में उत्पन्न हो कर वैश्विक मौसम को प्रभावित करने वाली वायुमंडलीय घटनाएं अल नीनो और ला नीना में से ला नीना के अधिक तीब्र होने से भारत में भीषण सर्दी की संभावना उत्पन्न हो गई है।
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ला नीना बनने से हवा के दबाव में तेजी आती है और ट्रेड विंड को रफ्तार मिलती है। - फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
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मौसम विभाग द्वारा इस साल के शुरू में पहले सामान्य से अधिक गर्मी और फिर सामान्य से अधिक वर्षा के बाद अब  विभाग का सामान्य से अधिक ठण्डी शीत ऋतु का पूर्वानुमान आ गया है। इस साल हम अब तक की इन दोनों ही चेतावनियों का अप्रिय अनुभव झेल चुके हैं। और अब सामान्य से अधिक ठण्डी शीत ऋतु की चेतावनी भी आ गयी है। यह चेतावनी खास कर हिमालयी राज्यों और उनमें से भी जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड के लिये ज्यादा चिन्ता पैदा करती है।

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ये चिन्ताएं भी साल के साथ ही खत्म नहीं होने जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के चलते मौसम की चरम स्थितियों के साथ ही उनकी पुनरावृतियों की संभावनाएं निरन्तर बढ़ती ही जानी हैं और सरकार या विज्ञानियों के पास अभी ऐसा कोई तंत्र या विद्या नहीं है जो इन चरम स्थितियों पर रोक लगा सके। इन जोखिम पूर्ण परिस्थितियों से बचने के लिये सावधानी और प्रकृति के साथ जीने की कला ही फिलहाल एकमात्र उपाय है।

ला नीना की तीब्रता से भयंकर सर्दी की संभावना

भीषण लू के थपेड़ों के बाद हम अभी मानसून की आपदाओं से पूरी तरह निपटे भी नहीं कि एक और संकट दरवाजे पर दस्तक देने को तैयार है। भरतीय मौसम विभाग द्वारा जारी पूर्वनुमान के अनुसार इस बार प्रशान्त महासागर में उत्पन्न हो कर वैश्विक मौसम को प्रभावित करने वाली वायुमंडलीय घटनाएं अल नीनो और ला नीना में से ला नीना के अधिक तीब्र होने से भारत में भीषण सर्दी की संभावना उत्पन्न हो गई है। ला नीना के प्रभाव से तापमान में गिरावट और शीतकाल में अधिक वर्षा की संभावना बलवती हो रही है।
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विपरीत व्यवहार करती हैं अल नीनो और ला नीना

प्रशांत महासागर और इसके ऊपर का वातावरण कई मौसमों के लिए अपनी सामान्य स्थिति से उतार-चढ़ाव करता है, जिसके परिणामस्वरूप एल नीनो और ला नीना घटनाएं होती हैं, जो वैश्विक जलवायु प्रणाली का एक घटक हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार प्रशांत महासागर में दक्षिण अमेरिका के निकट खासकर पेरु वाले क्षेत्र में यदि विषुवत रेखा के इर्द-गिर्द समुद्र की सतह अचानक गरम होनी शुरू हो जाए तो अल नीनो बनता है।

इससे मध्य एवं पूर्वी प्रशांत महासागर में हवा के दबाव में कमी आने लगती है। इसका असर यह होता कि विषुवत रेखा के इर्द-गिर्द चलने वाली ट्रेड विंड कमजोर पड़ने लगती हैं। यही हवाएं मानसूनी हवाएं हैं जो भारत में बारिश करती हैं। जबकि प्रशांत महासागर में उपरोक्त स्थान पर कभी-कभी समुद्र की सतह ठंडी होने लगती है। ऐसी स्थिति में "अल नीनो" के ठीक विपरीत घटना होती है जिसे "ला नीना" कहा जाता है।

ला नीना बनने से हवा के दबाव में तेजी आती है और ट्रेड विंड को रफ्तार मिलती है, जो भारतीय मानसून पर अच्छा प्रभाव डालती है। इस तरह देखा जाय तो ला नीना तापमान में गिरावट लाता है और वर्षा को बढ़ाता है। आमतौर पर मानसून के मौसम के अंत में होने वाला ला नीना तापमान में तेज गिरावट लाने के लिए जाना जाता है, जो अक्सर बढ़ी हुई वर्षा के साथ होता है। जिससे आगे भीषण सर्दी पड़ने की संभावना के बारे में चिंता बढ़ जाती है। ये दोनों ही वायुमंडलीय घटनाएं विपरीत व्यवहार करती हैं।

वैश्विक मौसम प्रभावित होता है समुद्री घटनाओं से

मौसम विज्ञानियों के अनुसार ला नीना और एल नीनो दोनों ही महत्वपूर्ण समुद्री और वायुमंडलीय घटनाएँ हैं जो आम तौर पर अप्रैल और जून के बीच शुरू होती हैं, और अक्टूबर और फरवरी के बीच मजबूत होती हैं। सामान्यतः ये घटनाएँ आम तौर पर 9 से 12 महीनों के बीच चलती हैं, लेकिन कभी-कभी ये दो साल तक भी बनी रह सकती हैं। सामान्य परिस्थितियों में, टेªड विन्ड भूमध्य रेखा के साथ पश्चिम की ओर बहती हैं, जो दक्षिण अमेरिका से गर्म पानी को एशिया की ओर धकेलती हैं, एक ऐसी प्रक्रिया जो समुद्र की गहराई से ठंडे पानी को ऊपर उठने और जलवायु संतुलन बनाए रखती है।

हालांकि, ला नीना की शुरुआत इस संतुलन को बिगाड़ देती है, जिससे वैश्विक जलवायु प्रभावों का एक सिलसिला शुरू हो जाता है। जबकि एल नीनो प्रशांत क्षेत्र में गर्म हवा और महासागर के तापमान से जुड़ा हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप समग्र वैश्विक तापमान गर्म होता है। ला नीना समुद्र की सतह और उसके ऊपर के वायुमंडल दोनों को ठंडा करके विपरीत प्रभाव उत्पन्न करता है। 

चरम स्थिति का स्वास्थ्य और आर्थिकी पर दुष्प्रभाव

अत्यधिक सर्दियों की स्थिति कई क्षेत्रों में गंभीर समस्याओं का कारण बन सकती है, जिसका स्वास्थ्य, कृषि, बुनियादी ढाँचा और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ सकता है। अत्यधिक ठंड के लंबे समय तक संपर्क में रहने से गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। ठंड का मौसम श्वसन संबंधी बीमारियों को बढ़ा सकता है। अत्यधिक ढण्ड का असर हमारी आर्थिकी पर भी पड़ता है। असामान्य रूप से ठंडा तापमान संवेदनशील फसलों को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे पैदावार कम हो सकती है।

किसानों को फसलों की बुवाई या कटाई में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है, जिससे कृषि चक्र प्रभावित होता है। कृषि में उच्च हीटिंग लागत और संभावित नुकसान घरेलू बजट और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। पशुधन जोखिम से पीड़ित हो सकते हैं, जिससे मृत्यु दर बढ़ सकती है और किसानों को आर्थिक नुकसान हो सकता है। भारी हिमपात सड़क परिवहन में बाधा डाल सकते हैं, जिससे देरी और दुर्घटनाएं हो सकती हैं। हीटिंग की बढ़ती मांग बिजली ग्रिड पर दबाव डाल सकती है, जिससे बिजली कटौती हो सकती है। अत्यधिक कम तापमान के कारण पानी के पाइप जम सकते हैं और फट सकते हैं, जिससे आपूर्ति बाधित हो सकती है।

हिमालयी राज्यों के लिये चरम स्थिति दुखदायी

असामान्य रूप से सर्दी जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित करती है। खास कर हिमालयी और पहाड़ी राज्यों में भीषण सर्दियों लोगों को घरों में कैद कर देती हैं, जिस कारण लोगों की विभिन्न गतिविधियां बंद हो जाती हैं। हिमालयी राज्यों में से जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में हिमपात और भीषण ठण्ड का सबसे बुरा असर पड़ता है, जिससे कृषि और परिवहन प्रभावित होता है।

पूर्वी भारत में पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे राज्यों में तापमान में अचानक गिरावट चावल और अन्य फसलों को प्रभावित कर सकती है, जिससे खाद्य असुरक्षा हो सकती है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पाला गेहूं जैसी फसलों को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है।  लद्दाख और सिक्किम के कुछ हिस्से अत्यधिक ठंड समुदायों को अलग-थलग करती है और आपूर्ति श्रृंखलाओं को प्रभावित कर सकती है।

सावधानी में ही बचाव है चरम सर्दी का

चरम सर्दी भी अन्य आपदाओं की तरह एक प्राकृतिक घटना है जिसे रोकना तो संभव नहीं इसलिये इस संकट का समाधान भी सावधानी और प्रकृति के साथ जीने की कला सीखना ही है। सवाधानी और बचाव के तौर पर किसान सर्दीरोधी फसल किस्मों का चयन कर सकते हैं।  पौधों की जड़ों को बचाने और मिट्टी की गर्मी बनाए रखने के लिए पौधों के चारों ओर मल्च लगाये जा सकते हैं। संवेदनशील फसलों के लिए पाले से बचाने वाले कवर उपयोग किये जा सकते हैं।

हिमपात अवरोधों को रोकने के लिए समय पर बर्फ हटाना और सड़क उपचार सुनिश्चित किया जा सकता है। दक्षता सुनिश्चित करने के लिए घरों और सार्वजनिक भवनों में हीटिंग सिस्टम का निरीक्षण और उन्नयन किया जाना चाहिये। पाइपों को जमने से रोकने के लिए इंसुलेट और आउटेज के दौरान पानी की पहुंच सुनिश्चित की जा सकती है। लोगों को अत्यधिक ठंड के जोखिमों और सुरक्षा के लिये गर्म कपड़े पहनना, जोखिम से बचने के बारे में  जागरूक किया जाना चाहिये।

कमजोर आबादी, विशेष रूप से बुजुर्गों और पहले से ही बीमार लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच बढ़ाई जानी चाहिये। चरम सर्दियों में आपातकालीन सेवाओं को तैयार रखने के कसाथ ही अन्न, दवाएं और आवश्य वस्तुओं का पर्याप्त भण्डारण तथा जरूरतमदों के लिये भोजन, कंबल और हीटिंग आपूर्ति की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिये। इसके साथ ही सरकार को दीर्घकालीन नीतियां तैयार करनी चाहिए।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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