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ट्रंप को चुपके से ये प्रस्ताव देकर भारत को घेरना चाहते हैं इमरान खान, ऐसी है पाकिस्तान की नई रणनीति

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ट्रंप अफ़ग़ानिस्तान में 18 साल से डटी अमेरिकी फौजों की वापसी चाहते हैं। - फोटो : अमर उजाला
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अभी डोनल्ड ट्रंप के पास वक़्त है। मतदाताओं से दूसरा कार्यकाल मांगने से पहले उपलब्धियों के नाम पर अपनी झोली में कुछ तो होना चाहिए। इसीलिए अमेरिकी राष्ट्रपति बेचैन हैं। अब किसी भी तरह वे अफ़ग़ानिस्तान में 18 साल से डटी अमेरिकी फौजों की वापसी चाहते हैं। यह उनका चुनावी वादा है। वादे को पूरा करने के लिए ट्रंप इस मुल्क़ को ही नहीं ,समूचे इलाक़े को एक बार फिर अशांति की आग में झोंक देना चाहते हैं। पाकिस्तान  उनके लिए भस्मासुर की भूमिका निभाने के लिए तैयार बैठा है। 

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क़तर में तालिबान के साथ अमेरिका की कूटनीतिक चर्चाओं के आठ दौर हो चुके हैं। नवां चल रहा है। साल भर से चल रहीं इन वार्ताओं का सारांश यही है कि दोनों पक्ष इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अफ़ग़ान समस्या का हल हिंसा,आतंकवाद और सेना का इस्तेमाल नहीं है, तो अब सिर्फ़ यह रह जाता है कि अमेरिका किस तरह वहां से अपने सैनिकों की वापसी करेगा और अफगानिस्तान-तालिबान के आने वाले दिनों में रिश्ते क्या और कैसे होंगे।

 

दूसरे चरण की वार्ताओं में फौज वापसी की तारीख़वार योजना का ऐलान होगा - फोटो : फाइल फोटो
आठ वार्ताओं का पहला चरण संपन्न हो चुका है। दूसरे चरण की वार्ताओं में फौज वापसी की तारीख़वार योजना का ऐलान होगा और तालिबान को वादा करना होगा कि वह अफगानिस्तान की धरती पर आतंकवाद को संरक्षण नहीं देगा। इस चरण की बातचीत में अफ़ग़ानिस्तान सरकार भी शामिल होगी। इसके अलावा वहां के अन्य राजनीतिक दलों के नुमाइंदे तथा सिविल सोसायटी के प्रतिनिधि भी होंगे।

अब पेंच कहां है ? 
एक तो यह कि ट्रंप ने शुक्रवार को ही अपनी घुड़की भी पिला दी है। उन्होंने कहा है कि  8600 अमेरिकी सैनिक तो वहां फिर भी रहेंगे और तालिबान पर निगरानी रखेंगे। यदि तालिबान ने फिर हिंसा का रास्ता अख्तियार किया तो अमेरिका इतनी बड़ी फ़ौज लेकर आएगा, जिसकी कल्पना भी नहीं होगी। अर्थ यह है कि इन वार्ताओं के पीछे मुल्क़ में शान्ति की अंदरूनी चाहत इन पक्षों में नहीं है। कोई भी स्वाभाविक अहसास के साथ वार्ता की मेज पर नहीं बैठा है। अफगानिस्तान सरकार कितनी ही नरम हो जाए, तालिबान के साथ उनके शांति समीकरण अनुकूल नहीं हैं और न रहेंगे। 

दूसरी बात यह कि तालिबान के एक बड़े वर्ग को पाकिस्तान का समर्थन है। क़तर में इन वार्ताओं के पीछे पाकिस्तान की बड़ी भूमिका है। पाकिस्तान अफगानिस्तान में हिन्दुस्तान की उपस्थिति नहीं चाहता। उसे अपनी पूर्वी और पश्चिमी सीमा पर हिन्दुस्तान की मौजूदगी अखरती है। ठीक वैसे ही जैसे 1971 से पहले भारत को अपनी पूर्वी और पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान के होने से असुरक्षा का अहसास होता था, इसलिए भले ही अफ़ग़ानिस्तान के विकास कार्यों की बात हो, इस्लामाबाद की त्यौरियां चढ़ीं रहती हैं।
 
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परदे के पीछे की एक ख़बर इमरान ख़ान का डोनल्ड ट्रंप के सामने फंड को लेकर रखा गया प्रस्ताव भी है। - फोटो : फाइल फोटो
पाकिस्तान का प्रस्ताव? 
परदे के पीछे की एक ख़बर इमरान ख़ान का डोनल्ड ट्रंप के सामने फंड को लेकर रखा गया प्रस्ताव भी है। सूत्रों की माने तो पाकिस्तान सरकार चाहती है कि अमेरिका अपनी फौज पर अफगानिस्तान में जितना खर्च करता है,उसका आधा भी पाकिस्तान को दे दे तो पाकिस्तान अफगानिस्तान में शान्ति की गारंटी ले सकता है।

तालिबान के साथ उसके अच्छे रिश्ते हैं और इस पैसे से पाकिस्तान कश्मीर में आतंकवाद को पालने पोसने में मदद देता रहेगा। इस प्रस्ताव से अमेरिका इसलिए खुश होगा कि उसकी सेना लौट आएगी। उसका खर्च आधा रह जाएगा। तालिबान इसलिए खुश होगा कि पाकिस्तान की बदौलत उसे अफगानिस्तान की सरकार में भागीदारी मिल जाएगी। पाकिस्तान इसलिए खुश होगा कि वह तालिबान के ज़रिए अफगानिस्तान के विकास में लगी एजेंसियों पर हमले करा सकेगा और अमेरिका से मिले पैसे और सैन्य मदद का भारत के ख़िलाफ़ कश्मीर में उपयोग करेगा।

इसके अलावा अमेरिकी पैसे से पाकिस्तानी सेना का ख़र्च निकलता रहेगा। पाई-पाई के लिए जूझ रहे मुल्क़ को इससे बड़ी राहत और क्या हो सकती है। इसका मतलब है कि इस शान्ति समझौते से सिर्फ़ हिन्दुस्तान की चिंताएं बढ़ने वाली हैं। अमेरिका और पाकिस्तान का परदे के पीछे निकट आना विशुद्ध अपने अपने स्वार्थों के कारण है। भारत को इससे बेहद सतर्क होकर कूटनीतिक तरीक़े से ऐसा कोई समाधान ढूंढना होगा ,जिससे सांप मर जाए और लाठी भी न टूटे।  

 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।  
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