पुनौरा धाम से पहले ही सीतामढ़ी में माता सीता का भव्य जानकी मंदिर है। हर साल यहां लाखों लोग माता जानकी का आर्शीवाद लेने पहुंचते हैं।
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माता जानकी और भारत
बिहार के सीतामढ़ी जिले के उत्तर में पुनौरा गांव है। यहां से नेपाल की दूरी तकरीबन चालीस किलोमीटर है। वृहद विष्णु पुराण में भी राजा जनक से जुड़ी बातों का विस्तार से जिक्र है। इसी में माता सीता के प्राकट्य स्थल का भी वर्णन मिलता है। इसके अनुसार माता सीता का जन्म जनकपुर से तीन योजन यानी 24 मील दूर हुआ था। 24 मील को अगर किलोमीटर में देखें तो यह 39 किलो मीटर होता है।
इस तरह से पौराणिक प्रमाणिकता के अनुसार देखें तो माता सीता का जन्म पुनौरा धाम में हुआ। दूसरा प्रमाणिक तथ्य पौराणिक कथाओं में ही मिलता है। तमाम धार्मिक ग्रंथों के अनुसार एक बार जब राजा जनक के राज्य में अकाल पड़ा था तब धर्म गुरुओं ने राजा जनक को हलेष्टि यज्ञ करने की सलाह दी थी। उन्हीं गुरुओं की सलाह पर राजा जनक ने अपने राज्य के पश्चिम में लक्ष्मणा नदी के किनारे यह यज्ञ अनुष्ठान किया। लक्ष्मणा नदी को ही आज लखनदेई नदी के नाम से जाना जाता है। इसी लखनदेई नदी के किनारे वर्तमान सीतामढ़ी बसा है।
पाैराणिक कथाओं के अनुसार हलेष्ठी यज्ञ अनुष्ठान के दौरान राजा जनक ने हल चलाया था। इस दौरान ही राजा जनक का हल एक मिट्टी के घड़े से टकराया। हल में जो नुकीली वस्तु लगी होती है उसे स्थानीय भाषा में कहीं कहीं सीत भी कहा जाता है। सीत के कारण ही कन्या मिली, जिसे राजा जनक ने अपनी पुत्री माना और उनका नाम सीता रखा।
पुनौरा धाम से पहले ही सीतामढ़ी में माता सीता का भव्य जानकी मंदिर है। हर साल यहां लाखों लोग माता जानकी का आर्शीवाद लेने पहुंचते हैं। इसी मंदिर परिसर में राजा जनक की हल चलाती प्रतिमा और सीता के बालरूप के भी दर्शन होते हैं।
नेपाल के लोगों की भावना का हमेशा से भारत भी सम्मान करता आया है। हर साल भारत से भी करोड़ों लोग जनकपुर धाम पहुंचते हैं और माता सीता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
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नेपाल में माता जानकी और परंपरा
अब बात नेपाल के जनकपुर धाम स्थित मां जानकी मंदिर की। यह मंदिर 1911 में बनकर तैयार हुआ था। इस मंदिर का निर्माण टीकमगढ़ की महारानी कुमारी वृषभानु ने करवाया था। पौराणिक मान्यताओं और कथाओं के अनुसार इस स्थान पर ऋषि शुरकिशोर दास साधना करने पहुंचे थे। यहां रहने के दौरान उन्हें माता सीता की एक मूर्ति मिली थी, जो सोने की थी। उन्होंने ही इसे वहां स्थापित किया था। टीकमगढ़ की महारानी कुमारी वृषभानु एक बार वहां गई थीं। उन्हें कोई संतान नहीं थी। उन्होंने वहां पूजा अर्चना की और संतान प्राप्ति की गुहार लगाई। यहां से जाने के बाद वो मां बनीं।
वे वहां दोबारा 1895 में आईं और अपनी देख रेख में भव्य मंदिर का निर्माण शुरू करवाया। इस मंदिर को बनने में करीब 16 साल लग गए। कहा जाता है कि मंदिर के निर्माण में उस वक्त करीब नौ लाख रुपये का खर्च आया। इस कारण इस मंदिर को नौलखा मंदिर भी कहा जाता है। नेपाल के लोगों का मानना है कि राजा जनक उनके राजा थे। जनकपुर में ही माता सीता की परवरिश हुई। ऐसे में माता सीता का मायका नेपाल ही हुआ। ऐसे में माता सीता नेपाल की बेटी हुईं।
नेपाल के लोगों की भावना का हमेशा से भारत भी सम्मान करता आया है। हर साल भारत से भी करोड़ों लोग जनकपुर धाम पहुंचते हैं और माता सीता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब साल 2018 में नेपाल की यात्रा पर गए थे तो एयरपोर्ट से सीधे जनकपुर स्थित माता सीता के मंदिर ही गए और वहां पूजा अर्चना की।
हाल ही में नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड जब भारत की यात्रा पर आए थे तो एक बार फिर रामायण सर्किट की चर्चा ने जोर पकड़ा। रामायण सर्किट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट है। प्रधानमंत्री ने एक बार फिर रामायण सर्किट परियोजनाओं के काम में तेजी लाने का ऐलान किया। प्रचंड के साथ संयुक्त पत्रकार वार्ता में पीएम मोदी ने कहा कि रामायण सर्किट भारत और नेपाल के रिश्तों को हिमालय पर्वत से ज्यादा ऊंचाई देगा।
दरअसल, रामायण सर्किट में जनकपुर को अयोध्या से जोड़ा जाना है। इस प्रोजेक्ट में नेपाल के दो और भारत के 15 स्थान हैं। ये वे इलाके हैं जहां भगवान श्री राम गए थे। उत्तरप्रदेश के अयोध्या से लेकर श्रृंगवेरपुर, चित्रकूट, बक्सर, दरभंगा, सीतामढ़ी समेत कर्नाटक का किष्किंधा, तमिलनाडु का रामेश्वरम समेत कई जिले इस प्रोजेक्ट में शामिल हैं।
ऐसे में नेपाल को इस मुद्दे पर संयम बरतना चाहिए। पौराणिक तथ्यों से छेड़छाड़ कोई नहीं कर रहा है। फिल्म आदिपुरुष में भी पैराणिक कथाओं के संदर्भ को ही लिया गया है। ऐसे में एक डायलॉग को विवाद का विषय बनाना कहीं से भी उचित नहीं है। माता सीता भारत की बेटी रहें या नेपाल की, किसी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उनका आशीर्वाद सभी को मिलता रहे इसी में संतुष्टि का भाव निहितार्थ है।
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