मनोज मुंतशिर ने बिना शर्त माफी मांगी है।
- फोटो : Pixabay
यह फिल्म आरंभ से अंत तक वाहियात अवास्तविक तथ्यों से भरी पड़ी है। बात रामायण के अनुसार पात्रों के वेशभूषा की करें तो राम लक्ष्मण सीता भगवा योगी वेश मे होने चाहिए। जबकि हनुमान जी लाल देह लाल वस्त्रों वाले दिखने चाहिए थे। किंतु यहां इन्हें रामायण की कथा और मर्यादा से कहीं इतर दिखाया गया है।
फिल्म में सीता हरण को आया रावण कमंडल नही मुस्लिम फकीरों सा झोली फैलाता है। फिल्म के पात्रों का ये सब रूप हिंदू आस्थाओं पर चोट है। रामायण में वर्णित लंका सोने की थी तो अशोक वाटिका अशोक वृक्षों से भरा था। किंतु फिल्म में लंका काली और अशोक वृक्ष है ही नहीं। आदिपुरुष का रावण सीता हरण के लिए चमगादड़ पर सवार होकर पहुंचता है। जबकि रामायण में रथ और विमान का जिक्र है।
वहीं सनातन मान्यताओं में प्रभु राम को सदैव दाढ़ी मूंछ से रहित षोडष दिखाने की परंपरा है। यहा वें एक पराक्रमी धनुर्धारी और अवतारी पुरुष हैं। इसके उलट फिल्म में उन्हें अपने शत्रु से पिटते दिखाया गया है। फिल्म का नाम आदिपुरुष भी आपत्तिजनक है क्योंकि श्रीराम किसी आदिमानव समूह के प्रथम पुरुष नही थे। वे तो राजा इक्ष्वाकु के वंशज थे जिसका ज़िक्र रामायण एवं पुराणों में वर्णित है। भला ऐसे में आदिपुरुष का क्या मतलब है? वहीं फिल्म में पात्रों के नाम भी अजीब हैं राम राघव तो सीता जानकी पुकारी जा रही हैं। लक्ष्मण शेष तो हनुमान बजरंग बुलाए जा रहे हैं। जबकि वास्तव में ये नाम इनके परिवार,उपमा और पूर्वावतार से संबंधित है।
संवाद भी तर्कहीन
बात फिल्म के संवादों की करें तो इसके अनुसार सीता, लंका में भारत की बेटी हैं। इस मुद्दे पर जब नेपाल में फिल्म पर रोक लगी तो बदल कर इसे मिथिला की बेटी कर दिया गया। यही नहीं लगे हाथ फिल्म निर्माणकर्ताओं की ओर से एक पत्र भी काठमांडू के मेयर के नाम जारी किया गया। पत्र की भाषा के अनुसार सीता जी की जन्मभूमि नेपाल है। जबकि यह स्थल बिहार के सीतामढ़ी जिला अंतर्गत पुनौरा ग्राम है। इसकी चर्चा बाल्मीकि रामायण के बालकांड में वर्णित है।
बात इस संवाद की करें तो देवी सीता लंका किसी उपलब्धि के लिए नहीं अपितु बलात हरण नाते गई थीं। यहाँ अपने शील मर्यादाओं के रक्षण पालन के नाते वो पूजनीय हैं। ऐसे में बजाय बेटी के भारत की महान नारी के रूप में उन्हें बताया जाना उचित रहता। ऐसा ही एक संवाद लंका से लौटे हनुमान और राम का है। यहां दलीलें धर्मनिरपेक्ष की दी जा रही हैं जबकि व्यक्ति को सदैव न्याय एवं धर्म के पक्ष में होना चाहिए।
फिल्म निर्माणकर्ता इतने पर भी नही रुके। इन्होंने भावनाओं को आहत करण का सिलसिला लगातार जारी रखा। मीडिया के विभिन्न माध्यम उनके ऐसे उन्मादपूर्ण वक्तव्यों से पटे हैं। फिल्म के स्वनामधन्य संवाद पटकथा लेखक मनोज मुंतशिर लगातार कुछ न कुछ कहते रहे। इन्होंने मीडिया में भारत नेपाल विभाजन की तारीख बताई और लगे हाथ हनुमान जी पर भी दम भर अटपटा उत्तेजनक बोला।
खुद को भक्तकवि तुलसीदास के समतुल्य आंकते हुए अपनी इस लेखनी को रामचरित मानस सा प्रयोग बताया। जबकि ये अपने कथा और संवादों का संदर्भ तक बता पाने में अक्षम हैं। इनके नई पीढ़ी के लिए गढ़े गए संवाद और दादी नानी वाली कहानी लोगों के गले नही उतरी। युवा पीढ़ी भी थियेटर से दूर है। यहां तक की फिल्म को रामायण प्रेरित बता कर आक्रोश शमन का प्रयास भी निरर्थक रहा। यह महज पल्ला झाड़ने का प्रयास भर लगा।
अगर यह वास्तव में ये रामायण प्रेरित होता तो अवश्य प्रशंसनीय होता। क्योंकि ऐसे साहित्य और लेखक सदैव स्वीकारे गए हैं।लाओस का महाग्रंथ राम जातक, फादर कामिन बुल्के की एक ईसाई की रामकथा और करपात्री महाराज के रामायण मीमांसा ऐसे ही साहित्य हैं। इनकी उपमाएं अब भी दी जाती हैॆ। नरेंद्र कोहली लिखित उपन्यास अभ्युदय के मानवीय चरित्र राम को भी स्वीकारा गया है। ऐसा आदिपुरुष को लेकर क्यों नहीं है, यह एक सवाल बनता है।
दरअसल फिल्म और सीरियल केवल मनोरंजन का एक व्यापक एवं सर्वसुलभ माध्यम नहीं हैं ।ये वास्तव में विचारों के सम्प्रेषण का एक सशक्त जरिया हैं। ऐसे में यह भावनाओं के चोटिल करने और धारणाओं को ध्वस्त करने का भी एक उपक्रम हो सकता है। वैसे भी आप जब ऐसे विषय पर इतना अधिक खर्च कर फिल्म बना रहे है तो फिर संवादों के बदलाव की जरूरत क्यों है?वहीं अब खेद व्यक्त करने का क्या मतलब है।
दरसल पिछले वर्ष फिल्म के आए प्रोमो पर भी आपत्ति हुई थी। तबसे बजाय बदलाव की जगह पूरा जोर फिल्म को चर्चा में बनाए रखते हुए भावनाओं को भुनाने की थी जो असफल सिद्ध हो चुकी है। ऐसे में न्यायालय से लेकर आम जन तक का फिल्म के प्रति दिख रहा रवैया निश्चित ही एक सबक है। आने वाले वक्त में ऐसी सिनेमा के लिए शुभेच्छा देने के पहले राजनेता और संत भी सोचेंगे।
इसके अलावा ये समय राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के छद्म पैरोकार कवि, कलाकार और फिल्मकारों के दिन ढलने का भी है। अब जनभावनाओं से खिलवाड़ संभव नहीं होगा। दरअसल देश मनोरंजन के नाम पर कुछ भी स्वीकारने के पक्ष में नहीं है। ऐसे में हर फिल्मकार को ऐसे किसी ऐतिहासिक घटना या दैवीय चरित्र के चित्रण पूर्व निश्चित ही सोचना होगा। फिलहाल ये परिस्थितियां और स्वीकारोक्ति बदलाव के पक्ष में है। वहीं ये बदलाव सठ सुधरहिं सतसंगति पाई से ही सार्थक होगा।
-----------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।