घनघोर नैगेटिविटी भरे समय में भी पॉजिटिविटी ढूंढ लेने वाला दुस्साहसी कदम यही कहना है कि आदिपुरुष यकीनन एक "ऐतिहासिक" फिल्म है जिसे बॉलीवुड लंबे समय तक याद रखेगा। इस फिल्म से बॉलीवुड के सारे कैंप समझ जाएंगे कि मजाक करना और फिल्म बनाने में अंतर होता है।
इस दौर में गर येन-केन-प्रकारेण एक पल के अंदर दुनिया के दिलो-दिमाग पर छा जाने की चाहत संक्रामक ना होती और हाथ-पैर, नाक-कान, गला-मुंह और आंखें चेहरा तक “वायरल” हो जाने की इच्छा बीमारी होने तक जोर ना मारती तो कलात्मक रूप से ऐसा बहुत कुछ था जिसे ना केवल बचाया जा सकता था बल्कि जरा तरीके से इतिहास के मर्तबान में मुरब्बे की तरह संजोया जा सकता था। मगर अफसोस की इस जमाने में दोनों ही बातें बेमानी हैं और गर ना भी ईमान का मसला हो तो कम से कम बाबा आदम के जमाने की वकालत ही मान ली जाए।
जैसे एक बड़ा निर्माता एक निर्देशक के हाथों राम-लक्ष्मण, सीता-हनुमान, रावण, मेघनाथ, विभीषण सहित कई किरदारों के साथ वह हो जाने देना चाहता था जो एक निर्देशक चाहता था और वह निर्देशक वह सबकुछ किरदारों से कहलवा देना चाहता था जो भोले-भाले शुक्ला चाहते रहे।
सेंसर बोर्ड सोया रहेगा, निर्माता चुप्पी साधेगा, निर्देशक भड़भड़ाएगा और एक संवाद लेखक अपनी विद्वता का परचम न्यूज चैनलों में लहराता फिरेगा
जाहिर है जब देश में हर अच्छे-बुरे में वायरल हो जाने की मंशाएं काम कर रही हों और ऊटपटांग वीडियो से दुनिया पर छा जाने की कामनाएं कपड़े उतार रही हों तो फिर हमारी ही रामायण के मर्यादापुरुषोत्तम को “आदिपुरुष” में ऐसे दर्शा देना का चुटकियों का ही तो खेल है।
अब भला सोचिए देश में सिनेमा किसी मोबाइल की विंडो में दिनरात 24 घंटे ऐसे ना फड़फड़ा रहा होता क्या इस देश के हद्य में धड़कने वाले कालजयी ग्रंथ रामायण की राम कथा भला “आदिपुरुष” जैसी ऐतिहासिक रचनात्मकता के साथ फिल्मी पर्दे पर उतर पाती? सेंसर बोर्ड फिल्मों की अथाह-अपार बारिश में ऐसी क्रिएटीविटी के लिए जगह बना देना राम पर अहसान का ही तो काम है।
दरअसल, घनघोर नैगेटिविटी भरे समय में भी पॉजिटिविटी ढूंढ लेने वाला दुस्साहसी कदम यही कहना है कि आदिपुरुष यकीनन एक "ऐतिहासिक" फिल्म है जिसे बॉलीवुड लंबे समय तक याद रखेगा। इस फिल्म से बॉलीवुड के सारे कैंप समझ जाएंगे कि मजाक करना और फिल्म बनाने में अंतर होता है।
लाखों-करोड़ों जनमानस के मन में प्रवाहित होते इस कालजयी ग्रंथ पर फिल्म बनाते हुए स्टूडियों में, फोन के संवादों में सोचने लायक जो होगा वह केवल उफान मारती वही मंशाएं होंगी जिसके बूते यह फिल्म बनकर सामने आई है अन्यथा फिल्म के संवाद लिखते समय और देश के उसी गांव अंचल के मानस को समझते हुए वे ऐसे संवाद ना लिखते जहां से उनकी दादी-नानी आती है।
खैर, बॉलीवुड एक सबक इस फिल्म के बहाने याद रखेगा।
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