अधिकांश लोग अपनी वृद्धावस्था को स्वयं ही जटिल और कठिन बना लेते हैं। वे वर्तमान में जीने के बजाय बीते हुए समय, छूटे हुए अवसरों और घटती हुई शारीरिक शक्ति के बारे में अधिक सोचने लगते हैं। इसलिए, अपने विचारों को बदलना आवश्यक है। जीवन से किसी परीकथा जैसे सुखद अंत की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। जीवन में सुख और दुख, सफलता व असफलता स्वाभाविक हैं। यदि हम यह मान लें कि हर कठिनाई के बाद हमें अवश्य ही कोई बड़ा पुरस्कार मिलेगा, तो निराशा हमारे जीवन का हिस्सा बन सकती है। इसलिए, सच्ची खुशी परिस्थितियों के बदलने में नहीं, बल्कि उन्हें सहजता से स्वीकारते हुए अपने कर्तव्यों और अपनी रुचियों को पूरी निष्ठा से निभाने में है। यही दृष्टिकोण मनुष्य को भीतर से मजबूत व संतुलित बनाता है।
दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मनुष्य को समय-समय पर अपनी मृत्यु का स्मरण भी करते रहना चाहिए। क्योंकि, जब व्यक्ति अपनी नश्वरता को स्वीकार कर लेता है, तब वह समय को व्यर्थ नहीं गंवाता, बल्कि समाज के लिए सार्थक योगदान देने का प्रयास करता है।
मैं चाहता हूं कि मेरा अंत उस समय हो, जब मैं अपने कार्य में पूरी निष्ठा से लगा रहूं और यह संतोष मेरे साथ हो कि जो कुछ मेरे लिए संभव था, वह मैंने पूरी ईमानदारी से किया। इसके लिए हमें अपने काम या अपनी कला से इस प्रकार जुड़ जाना चाहिए कि उम्र का एहसास ही न हो। मन में यह विचार ही न आए कि मैं अभी जवान हूं या वृद्ध हो चुका हूं। यदि हम जीवन भर सीखते रहें, अपनी रुचियों को जीवित रखें, दूसरों के लिए उपयोगी बनें और हर दिन को उद्देश्यपूर्ण ढंग से जिएं, तो वृद्धावस्था भय का नहीं, बल्कि आत्मिक शांति का समय बन सकती है।