ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के राजनीतिक स्टाइल में बड़ा फासला साफ दिखाई देता है। ममता बनर्जी का अंदाज पूरी तरह सड़क की राजनीति, आक्रामक जनसंवाद और भावनात्मक अपील वाला है। वे संघर्ष, आंदोलन और सीधे टकराव की राजनीति की पहचान मानी जाती हैं। उनकी भाषा और शैली आम कार्यकर्ता से जुड़ी हुई दिखती है।
अभिषेक बनर्जी वहीं अपेक्षाकृत आधुनिक, मैनेजमेंट आधारित और रणनीतिक राजनीति करते दिखाई देते हैं। उनका फोकस संगठन, डिजिटल पहुंच, युवा नेतृत्व और योजनाबद्ध चुनावी मैनेजमेंट पर ज्यादा रहता है। वे कम भावनात्मक और अधिक नियंत्रित राजनीतिक संदेश देने की कोशिश करते हैं। या यूं कहें, ममता बनर्जी आंदोलन की राजनीति की नेता हैं, जबकि अभिषेक बनर्जी संगठन और नई पीढ़ी की चुनावी राजनीति का चेहरा बनने की कोशिश करते दिखते हैं।
तृणमूल कांग्रेस की हार पर नेतृत्व की आलोचना
चार मई को बंगाल विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद तृणमूल कांग्रेस पूरी तरह बिखरी हुई नजर आ रही है। जीतने वाले हों या हारने वाले दोनों ही खुले और दबे स्वर में पार्टी नेतृत्व की आलोचना कर रहे हैं। पार्टी प्रवक्ता तक विरोधाभासी और पार्टी-विरोधी बयान दे रहे हैं। अधिकांश नेता या तो घरों में सिमट गए हैं या अपने क्षेत्रों से बाहर हैं। ऐसे माहौल में ममता बनर्जी लगातार कालीघाट में बैठकों का दौर चला कर कार्यकर्ताओं और नेताओं का मनोबल बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं।
दरअसल, ममता बनर्जी को विपक्ष की राजनीति हमेशा अधिक रास आई है। सड़क से सदन तक उनका संघर्ष उन्हें एक प्रभावशाली विपक्षी नेता के रूप में स्थापित करता रहा, लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें वैसी लोकप्रिय छवि नहीं मिल सकी।
सत्ता में रहने के बावजूद उनकी राजनीतिक शैली हमेशा एक लड़ाकू और जुझारू नेता की रही। अब एक बार फिर वह उसी तेवर के साथ उस पार्टी को नए सिरे से खड़ा करने की कोशिश में जुटी हैं, जो फिलहाल पूरी तरह पराजित और बिखरी हुई दिखाई दे रही है।
अभिषेक बनर्जी ममता के साथ हर बैठक में शामिल
तृणमूल कांग्रेस में सेकंड-इन-कमांड माने जाने वाले, जिन्हें पार्टी के लोग ‘सेनापति’ कहकर संबोधित करते हैं, अभिषेक बनर्जी भी ममता बनर्जी की हर बैठक में उनके साथ बगल में मौजूद रहते हैं। हालांकि, अभिषेक बनर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि नाराज और असंतुष्ट तृणमूल नेता, खासकर उनकी राजनीतिक कार्यशैली से असहज हैं। जो नेता खुलकर उनका नाम नहीं ले रहे, वे दरअसल उनके जरिए पार्टी पर थोपे गए IPAC को निशाना बना रहे हैं।
अभिषेक बनर्जी के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह भी है कि उन्होंने संघर्ष की राजनीति देखी ही नहीं। इनका राजनीति में प्रवेश 2011 में ममता बनर्जी के सत्तासीन होने के बाद हुआ। सत्ता की चमक के बीच उसी वर्ष इन्हें तृणमूल युवा कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया। चुनावी राजनीति की शुरुआत 2014 में डायमंड हार्बर लोकसभा सीट से हुई, जहां 26 वर्ष की उम्र में इन्होंने 16वीं लोकसभा में युवा सांसद के रूप में प्रवेश किया।
अभिषेक बनर्जी का सफर
2019 में वे दूसरी बार 17वीं लोकसभा के लिए इसी सीट से सांसद चुने गए। वहीं, ममता बनर्जी ने 2021 में लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी कर भाजपा के “अबकी बार 200 पार” नारे की धार कुंद कर दी। उस समय पार्टी और राज्य की राजनीति में ममता बनर्जी को चुनौती देने वाला कोई बड़ा चेहरा नहीं बचा था। इसी वर्ष उन्होंने अभिषेक बनर्जी को पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बनाकर तृणमूल कांग्रेस में दूसरे सबसे प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित कर दिया।
2024 में अभिषेक बनर्जी ने भी लगातार तीसरी जीत दर्ज करते हुए 18वीं लोकसभा में प्रवेश किया। इसके बाद पार्टी में उनका प्रभाव लगातार बढ़ता गया और उनकी सहमति के बिना बड़े फैसले लेना लगभग असंभव माना जाने लगा। उन्होंने “बुजुर्ग बनाम युवा” की बहस को आगे बढ़ाकर कई वरिष्ठ नेताओं को हाशिये पर धकेलने का प्रयास किया। इसको लेकर दबे और खुले दोनों स्वर में आलोचना हुई, लेकिन इसके बावजूद अगस्त 2025 में उन्हें लोकसभा में पार्टी का नेता भी बना दिया गया।
अभिषेक बनर्जी पर ममता का भरोसा
उम्र के 72वें वर्ष में ममता बनर्जी एक बार फिर पार्टी को खड़ा करने और उसे मजबूत करने की बात कर रही हैं। लेकिन उनकी शारीरिक स्थिति को देखते हुए यह अब अकेले उनके बूते की बात नहीं लगती। पार्टी में “सेकंड इन कमांड” या कहें सेनापति के अलावा उन्हें किसी और पर खास भरोसा भी नहीं दिखाई देता।
अभिषेक बनर्जी की भी अपनी सीमाएं हैं। जेड प्लस सुरक्षा हटने के बाद उन्होंने खुद को लगभग अपने घर और ममता बनर्जी के आवास तक ही सीमित कर लिया है। जब वे बाहर निकलते थे, तो उनका काफिला किसी राष्ट्राध्यक्ष जैसा दिखाई देता था।
बहरहाल, वे आम जनता से तो दूर थे ही, पार्टी के सांसदों, मंत्रियों और विधायकों से भी उनकी उतनी निकटता नहीं बन पाई। ममता बनर्जी की बढ़ती उम्र और अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली को देखते हुए फिलहाल यह नहीं लगता कि पार्टी पहले जैसी मजबूती से खड़ी हो पाएगी।
मौजूदा स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिस विधायक की सीट पर 2024 के लोकसभा चुनाव में अभिषेक बनर्जी को करीब 1 लाख 70 हजार वोटों की बढ़त मिली थी, वही विधायक मैदान छोड़कर चला गया। ऐसे में पार्टी में टूट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। माना जा रहा है कि कुछ नेता भाजपा तो कुछ कांग्रेस में अपना नया राजनीतिक ठिकाना तलाश सकते हैं।
----------------------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।