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विजयादशमी पर्व विशेष 2026: व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की ऐतिहासिक यात्रा

सार

इसी दूरदर्शी सोच के साथ संघ ने 'व्यक्ति निर्माण' को अपने कार्य का केंद्र बनाया, ताकि ऐसे समर्पित नागरिक तैयार किए जा सकें जो समाज और राष्ट्र के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को समझें तथा व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर सामूहिक राष्ट्रहित को प्राथमिकता दें।
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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्वयंसेवक। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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विजयदशमी, 27 सितंबर 1925 का वह ऐतिहासिक दिन केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना का सामान्य क्षण नहीं था, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना के चिरकालिक पुनर्जागरण का एक ऐसा महामुहूर्त था, जिसने आधुनिक भारत के इतिहास की दिशा को मोड़ने का काम किया।

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परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर की पावन धरती पर जिस वैचारिक और अनुशासित पौधे का रोपण किया था, आज वह अपनी 101वें वर्ष की गौरवशाली यात्रा में एक विशाल, सुदृढ़ और छायादार वटवृक्ष का रूप धारण कर चुका है।

101 वर्षों की यह यात्रा किसी भी संगठन के लिए केवल अपनी उपलब्धियों का उत्सव मनाने का समय नहीं, बल्कि उसके विचारों की शाश्वत शक्ति, संकल्पों की दृढ़ता और समाज पर उसके अमिट प्रभाव का प्रत्यक्ष प्रमाण होती है।
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संघ की स्थापना ऐसे समय में हुई थी जब भारत ब्रिटिश शासन की दासता के अधीन था। स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ समाज के सामने राष्ट्रीय एकता, सामाजिक संगठन और सांस्कृतिक चेतना की गहन चुनौतियां मौजूद थीं। डॉ. हेडगेवार का यह स्पष्ट मानना था कि राष्ट्र को सशक्त बनाने के लिए केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज में चरित्र, अनुशासन, संगठन और राष्ट्रीय भावना का विकास अत्यंत आवश्यक है।

इसी दूरदर्शी सोच के साथ संघ ने 'व्यक्ति निर्माण' को अपने कार्य का केंद्र बनाया, ताकि ऐसे समर्पित नागरिक तैयार किए जा सकें जो समाज और राष्ट्र के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को समझें तथा व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर सामूहिक राष्ट्रहित को प्राथमिकता दें। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने कहा था कि ‘संघ का आदर्श भारतीय संस्कृति की जड़ों को गहरा और सुदृढ़ करना है। अपनी स्थापना के समय से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने महान उद्देश्य, राष्ट्र निर्माण को अपनाया है। संघ का प्रतीक देशभक्ति और सेवा है।'

स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत भी जब देश की संप्रभुता और अखंडता पर संकट आया, तब संघ के स्वयंसेवकों ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वर्ष 1954 में दादरा, नगर हवेली और गोवा को पुर्तगाली औपनिवेशिक शासन से मुक्त कराने के लिए चलाए गए मुक्ति आंदोलनों में संघ के वीर स्वयंसेवकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और अपने प्राणों की आहुति देकर मातृभूमि के ऋण को चुकाया।

इसके अतिरिक्त, आधुनिक भारतीय इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक – वर्ष 1975 से 1977 के आपातकाल के दौरान जब देश के लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संविधान पर संकट गहराया था, तब संघ के नेतृत्व और उसके स्वयंसेवकों ने लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए भूमिगत रहकर जो विराट 'सत्याग्रह' और संघर्ष किया, वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।

तानाशाही ताकतों के खिलाफ उस लोकतांत्रिक संघर्ष ने यह साबित कर दिया कि राष्ट्रहित सर्वोपरि है और संघ हमेशा देश के संविधान, नागरिक अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए चट्टान की तरह खड़ा रहता है।

संघ की कार्यपद्धति का मूल केंद्र उसकी अनूठी 'शाखा' व्यवस्था रही है। दैनिक शाखाओं के माध्यम से स्वयंसेवकों में अनुशासन, शारीरिक क्षमता, सामूहिकता, नेतृत्व और सेवा की भावना विकसित करने का प्रयास किया जाता है। नियमित गतिविधियों, प्रशिक्षण वर्गों और सामाजिक संपर्क के जरिए संगठन अपने स्वयंसेवकों को सक्रिय और संस्कारित रखता है। संघ का स्पष्ट मानना है कि राष्ट्र का भविष्य केवल राजनीतिक या आर्थिक व्यवस्थाओं से तय नहीं होता, बल्कि नागरिकों के चरित्र, सामाजिक उत्तरदायित्व और सामूहिक आचरण से निर्मित होता है। यही कारण है कि संघ की गतिविधियों में व्यक्तिगत विकास के साथ-साथ सामाजिक सहभागिता पर अत्यधिक जोर दिया जाता है। महानगरों से लेकर छोटे कस्बों, सुदूर जनजातीय क्षेत्रों और ग्रामीण अंचलों तक संघ की गतिविधियों का विस्तार उसकी शाखा आधारित व्यवस्था की व्यापकता और गहराई को दर्शाता है।

संघ का प्रभाव केवल उसकी शाखाओं तक सीमित नहीं रहा है। समय के साथ संघ के विचारों से प्रेरणा लेकर अनेक स्वायत्त संगठनों का जन्म हुआ, जिन्होंने शिक्षा, विद्यार्थी आंदोलनों, श्रम कल्याण, वनवासी क्षेत्रों, धार्मिक-सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में ऐतिहासिक कार्य किया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय मजदूर संघ, वनवासी कल्याण आश्रम, विश्व हिंदू परिषद, विद्या भारती और सेवा भारती जैसे संगठनों ने अपने-अपने क्षेत्रों में राष्ट्रनिर्माण की नई इबारत लिखी है। 'सेवा भारती' और 'विद्या भारती' के माध्यम से देश के सुदूर जनजातीय, पर्वतीय और वंचित क्षेत्रों के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक शिक्षा, संस्कार और स्वास्थ्य सेवाओं का जो प्रकाश पहुँचाया जा रहा है, वह सामाजिक समरसता और राष्ट्र सेवा का एक अद्भुत उदाहरण है।

सेवा कार्य संघ की कार्यपद्धति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील पक्ष रहा है। संकट की हर घड़ी में राष्ट्र के साथ खड़े रहना संघ का स्थायी स्वभाव रहा है। इतिहास गवाह है कि चाहे वर्ष 1962 का भारत-चीन युद्ध हो, 1971 का भारत-पाक युद्ध हो, या फिर देश के किसी भी कोने में आया लातूर का भूकंप, उड़ीसा का चक्रवात, भुज की भीषण त्रासदी और हाल ही में आई वैश्विक महामारी कोविड-19 का कठिन समय, संघ के स्वयंसेवकों ने अपनी जान की परवाह किए बिना सबसे पहले अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर राहत, बचाव, भोजन व्यवस्था और चिकित्सा सहायता के कार्यों को निष्काम भाव से अंजाम दिया है। संघ समर्थकों का मानना है कि सेवा को नियमित सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बनाना ही संगठन का प्रमुख ध्येय है, जिससे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच आत्मीयता का सेतु बनता है।

संघ की विचारधारा में राष्ट्रवाद का सीधा संबंध भारत की सांस्कृतिक परंपराओं, ऐतिहासिक अनुभवों और सभ्यतागत निरन्तरता से जोड़ा जाता है। संघ भारत को केवल सीमाओं में बंधा हुआ एक भौगोलिक भू-भाग नहीं, बल्कि साझा सांस्कृतिक चेतना और जीवन-मूल्यों से बंधा एक सजीव 'सांस्कृतिक राष्ट्र' मानता है। आरएसएस के अनुसार, राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के लिए नागरिकों में अपनी विरासत के प्रति सम्मान, देश के प्रति कर्तव्यबोध और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव होना अनिवार्य है।

स्वदेशी, स्वावलंबन, आत्मनिर्भरता और सामाजिक समरसता जैसे विषय संघ के विमर्श का मुख्य केंद्र रहे हैं। संघ का शाश्वत दृष्टिकोण इस मान्यता पर आधारित है कि 'हिंदू सहोदरा सर्वे, न हिंदू पतितो भवेत्' अर्थात समाज का प्रत्येक घटक एक ही परिवार का हिस्सा है और उसमें कोई भी उच्च-नीच या अछूत नहीं है। छुआछूत और जातिगत भेदभाव के उन्मूलन के लिए संघ ने धरातल पर जो निरंतर प्रयास किए हैं, उसने सामाजिक ताने-बाने को सुदृढ़ किया है।

हालांकि, एक विशाल और प्रभावकारी संगठन होने के नाते लोकतांत्रिक व्यवस्था में संघ की विचारधारा और भूमिका पर विभिन्न दृष्टिकोणों से चर्चा और समीक्षा भी होती रही है। आलोचकों द्वारा समय-समय पर समावेशन, बहुलतावाद और सामाजिक बदलाव की गति को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं, जिनका समाधान संघ ने सदैव अपने आचरण, संवाद और सेवाकार्यों के माध्यम से दिया है।

समाज को संगठित करने और नागरिकों में राष्ट्र के प्रति कर्तव्यबोध विकसित करने के संघ के दीर्घकालिक प्रयास आज सर्वमान्य हो चुके हैं। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में किसी विचार के सामाजिक प्रभावों का मूल्यांकन उसके दीर्घकालिक कार्यों और राष्ट्र पर पड़े सकारात्मक प्रभावों से ही होता है।

संघ के 101 वर्ष इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया केवल राजनीतिक सत्ता या सरकारी नीतियों से तय नहीं होती, बल्कि यह समाज की चेतना, नागरिकों के चरित्र और सामूहिक संकल्प से आगे बढ़ती है। शताब्दी वर्ष का यह पड़ाव केवल पुरानी सफलताओं का जश्न मनाने का अवसर नहीं है, बल्कि अगले 25 वर्षों के 'अमृत काल' में भारत को पुनः 'विश्व गुरु' के पद पर आसीन करने के संकल्प को दोहराने का ऐतिहासिक समय है। संघ का ध्येय पूरी तरह स्पष्ट है – एक संगठित, सामर्थ्यवान, समरस, भेदभावमुक्त और वैभवशाली भारत का निर्माण।

जब देश का प्रत्येक नागरिक अपने व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर 'राष्ट्र सर्वोपरि' के भाव को अपनाएगा, तभी 'एक भारत-श्रेष्ठ भारत' की अवधारणा पूर्ण साकार होगी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 101 वर्षों के इस गौरवशाली अवसर पर हम सभी भारत माता के चरणों में नमन करते हैं और राष्ट्र निर्माण के इस पवित्र यज्ञ में अपना पूर्ण योगदान देने का संकल्प लेते हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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