देश में कभी साइकल और बैलगाड़ी पर रखकर रॉकेट इधर से उधर ले जाए जाते थे।
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जिस देश में कभी साइकल और बैलगाड़ी पर रखकर रॉकेट इधर से उधर ले जाए जाते थे, उसी देश ने आज चांद और आसमान पर कब्ज़ा करना सीख लिया है। आज से ठीक 50 साल पहले साल 15 अगस्त 1969 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के निर्देशन में राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का गठन हुआ था। इसके बाद 19 अप्रैल, 1975 को इसरो द्वारा स्वदेश निर्मित उपग्रह आर्यभट्ट का सफल प्रक्षेपण किया गया।
आज से लगभग 44 साल पहले उपग्रहों का साइकिल और बैलगाड़ी से शुरू हुआ इसरो का सफर आज उस मक़ाम पर पहुंच गया है जहां भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में दुनिया के सबसे शक्तिशाली पांच देशों में से एक है। एक समय ऐसा भी था जब अमेरिका ने भारत के उपग्रहों को लॉन्च करने से मन कर दिया था। आज स्थिति ये है कि अमेरिका सहित तमाम देश खुद भारत के साथ व्यावसायिक समझौता करने को इच्छुक है।
चंद्रयान-2 ने भेजी धरती की पहली तस्वीर
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हिंदुस्तान के आगोश में चांद
पिछले दिनों अंतरिक्ष की दुनिया में भारत ने इतिहास रचते हुए अपने दूसरे चंद्र मिशन, चंद्रयान-2 को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर दिया। चांद पर कदम रखने वाला ये हिंदुस्तान का दूसरा सबसे बड़ा मिशन है। इसे देश के सबसे ताकतवर बाहुबली रॉकेट जीएसएलवी –एमके 3 से लॉन्च किया गया।
प्रक्षेपण के करीब 16.23 मिनट बाद ही चंद्रयान-2 पृथ्वी से करीब 182 किमी की ऊंचाई पर जीएसएलवी-एमके3 रॉकेट से अलग होकर पृथ्वी की कक्षा में चक्कर लगाने लगा था। वास्तव में ये भारत के लिए एक ऐतिहासिक समय है।
चंद्रयान-2 वास्तव में चंद्रयान-1 मिशन का ही नया संस्करण है।
चंद्रयान-2 में ऑर्बिटर, लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) शामिल हैं। चंद्रयान-1 में सिर्फ ऑर्बिटर था, जो चंद्रमा की कक्षा में घूमता था। चंद्रयान-2 के जरिए भारत पहली बार चांद की सतह पर लैंडर उतारेगा। यह लैंडिंग चांद के दक्षिणी ध्रुव पर होगी। इसके साथ ही भारत चांद के दक्षिणी ध्रुव पर यान उतारने वाला पहला देश बन जाएगा।
चंद्रयान-2 को पृथ्वी की कक्षा में पहुंचाने की जिम्मेदारी इसरो ने अपने सबसे शक्तिशाली रॉकेट जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल- मार्क 3 (जीएसएलवी-एमके 3) को दी थी। इस रॉकेट को स्थानीय मीडिया से 'बाहुबली' नाम मिला। 640 टन वजनी इस रॉकेट की लागत 375 करोड़ रुपए है। इस बार चंद्रयान-2 का वजन 3,877 किलो है, यह चंद्रयान-1 मिशन (1380 किलो) से करीब तीन गुना ज्यादा है। इसमें लैंडर के अंदर मौजूद रोवर की रफ्तार 1 सेमी प्रति सेकंड है।
चंद्रयान-2 अभियान की कुल लागत 978 करोड़ रुपये आई है। अलग-अलग चरणों में सफर पूरा करते हुए यान सात सितंबर को चांद के दक्षिणी ध्रुव की निर्धारित जगह पर उतरेगा। अब तक विश्व के केवल तीन देशों अमेरिका, रूस व चीन ने चांद पर अपना यान उतारा है।
2008 में भारत ने चंद्रयान-1 लॉन्च किया था। यह एक ऑर्बिटर अभियान था। ऑर्बिटर ने 10 महीने तक चांद का चक्कर लगाया था। एक बार फिर चंद्रयान-2 के सफलतापूर्वक लांच होने के बाद भारत अंतरिक्ष में एक बड़ी शक्ति के तौर पर स्थापित हो गया है। इस मिशन के दो महत्वपूर्ण मकसद चांद पर पानी की खोज और वहां इंसानों के रहने की कितनी उम्मीदें हैं, का पता लगाना है।
इसरो के प्रक्षेपण यान
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स्वदेशी लैंडर-रोवर
नवंबर 2007 में रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रॉसकॉसमॉस ने कहा था कि वह चंद्रयान-2 प्रोजेक्ट में भारत के साथ काम करेगा इसके लिए वह इसरो को लैंडर देगा। 2008 में इस मिशन को केंद्र सरकार से अनुमति मिली थी। 2009 में चंद्रयान-2 का डिजाइन तैयार कर लिया गया।
जनवरी 2013 में लॉन्चिंग तय थी, लेकिन रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रॉसकॉसमॉस लैंडर नहीं दे पाई या जानबूझकर नहीं दिया जिसे इसरो ने एक चुनौती की तरह लिया और बाद में भारत ने खुद स्वदेशी तकनीक से निर्मित अपना लैंडर-रोवर बनाया। चंद्रयान-2 में कुल 13 पेलोड हैं। 8 ऑर्बिटर में तीन पेलोड लैंडर विक्रम और दो पेलोड रोवर प्रज्ञान में हैं।
लैंडर विक्रम का नाम भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम के जनक डॉक्टर विक्रम ए साराभाई के नाम पर रखा गया है। दूसरी ओर रोवर प्रज्ञान का मतलब संस्कृत में बुद्धिमता है। कुलमिलाकर इस मिशन की सफलता से यह साफ हो गया है कि हमारे वैज्ञानिक किसी के मोहताज नहीं हैं। वे कोई भी मिशन पूरा कर सकते हैं ।
इसरो की स्थापना के 50 वर्ष और भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम
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स्पेस रिसर्च पर ज्यादा ध्यान देना होगा
अब समय आ गया है जब इसरो व्यावसायिक सफ़लता के साथ-साथ अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की तरह अंतरिक्ष शोध और अन्वेषण पर भी ज्यादा ध्यान दे। इसरो को अंतरिक्ष अन्वेषण और शोध के लिए दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी, क्योंकि जैसे-जैसे अंतरिक्ष के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी अंतरिक्ष अन्वेषण बेहद महत्वपूर्ण होता जाएगा। इस काम इसके लिए सरकार को इसरो का सालाना बजट भी बढ़ाना पड़ेगा जो फिलहाल नासा के मुकाबले काफ़ी कम है।
भारी विदेशी उपग्रहों को अधिक संख्या में प्रक्षेपित करने के लिए अब हमें पीएसएलवी के साथ-साथ जीएसएलवी रॉकेट का भी उपयोग करना होगा। चंद्रयान-2 के लिए जीएसएलवी रॉकेट का ही प्रयोग किया गया है। पीएसएलवी अपनी सटीकता के लिए दुनियां भर में प्रसिद्ध है लेकिन ज्यादा भारी उपग्रहों के लिए जीएसएलवी का प्रयोग अब बहुतायत में करना होगा ।
वैसे तो भारत के पहले सफल चंद्र मिशन और मंगल मिशन के बाद से ही इसरो व्यावसायिक तौर पर काफी सफ़ल रहा है और इसरों के प्रक्षेपण की बेहद कम लागत की वजह से दुनिया भर के कई देश अब इसरो से अपने उपग्रहों की लांचिंग करा रहें है।
अंतरिक्ष बाजार में भारत के लिए संभावनाएं बढ़ रही हैं। इसने अमेरिका सहित कई बड़े देशों का एकाधिकार तोड़ा है। असल में, इन देशों को हमेशा यह लगता रहा है कि भारत यदि अंतरिक्ष के क्षेत्र में इसी तरह से सफ़लता हासिल करता रहा तो उनका न सिर्फ उपग्रह प्रक्षेपण के क़ारोबार से एकाधिकार छिन जाएगा बल्कि मिसाइलों की दुनिया में भी भारत इतनी मजबूत स्थिति में पहुंच सकता है कि बड़ी ताकतों को चुनौती देने लगे।
अमेरिका और कई दिग्गज देश भारत के साथ व्यावसायिक समझौता करने को इच्छुक हैं।
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अंतरिक्ष के क्षेत्र में आज स्थिति ये है कि अमेरिका सहित तमाम देश खुद भारत के साथ व्यावसायिक समझौता करने को इच्छुक हैं। अब पूरी दुनिया में सैटलाइट के माध्यम से टेलीविजन प्रसारण, मौसम की भविष्यवाणी और का दूरसंचार का क्षेत्र बहुत तेज गति से बढ़ रहा है और चूंकि ये सभी सुविधाएं उपग्रहों के माध्यम से संचालित होती हैं इसलिए संचार उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित करने की मांग में तेज बढ़ोतरी हो रही है।
हालांकि इस क्षेत्र में चीन, रूस, जापान आदि देश प्रतिस्पर्धा में हैं, लेकिन यह बाजार इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि यह मांग उनके सहारे पूरी नहीं की जा सकती। ऐसे में व्यावसायिक तौर पर यहां भारत के लिए बहुत संभावनाएं हैं।
कम लागत और सफलता की गारंटी इसरो की सबसे बड़ी ताकत है जिसकी वजह से स्पेस इंडस्ट्री में आने वाला समय भारत के एकाधिकार का होगा। अमेरिका की फ्यूट्रान कॉरपोरेशन की एक शोध रिपोर्ट भी बताती है कि अंतरिक्ष जगत के बड़े देशों के बीच का अंतरराष्ट्रीय सहयोग रणनीतिक तौर पर भी सराहनीय है।
वास्तव में इस क्षेत्र में किसी के साथ सहयोग या भागीदारी सभी पक्षों के लिए लाभदायक स्थिति है। इससे बड़े पैमाने पर लगने वाले संसाधनों का बंटवारा हो जाता है। खासतौर पर इसमें होने वाले भारी खर्च का। यह भारतीय अंतरिक्ष उद्योग की वाणिज्यिक प्रतिस्पर्धा की श्रेष्ठता का गवाह भी है ।
15 फरवरी, 2017 को इसरो ने एक साथ 104 सैटेलाईट लॉन्च करके अंतरिक्ष की दुनिया में इतिहास रच दिया था। इस अभियान में लॉन्च व्हीकल पीएसएलवी की 39वीं उड़ान में इसरो ने एक मिशन में सबसे ज़्यादा 104 सैटेलाइट भेजने का विश्व रिकॉर्ड बनाया था।
व्यावसायिक उपग्रह प्रक्षेपण का सारा काम इसरो की कमर्शियल विंग ' एंट्रिक्स कॉरपोरेशन' संचालित करती है। भारत में सैटेलाइट्स की कमर्शियल लॉन्चिंग दुनिया में सबसे सस्ती पड़ती है। भारत के जरिए सैटेलाइट लॉन्च करना अमेरिका, चीन, जापान और यूरोप से कई गुना तक सस्ता पड़ता है।
भविष्य में अंतरिक्ष में प्रतिस्पर्धा बढे़गी क्योंकि यह अरबों डॉलर का मार्केट है। भारत के पास कुछ बढ़त पहले से है, इसमें और प्रगति करके इसका बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक उपयोग संभव है। भारत अंतरिक्ष विज्ञान में नई सफलताएं हासिल कर विकास को अधिक गति दे सकता है। देश में गरीबी दूर करने और विकसित भारत के सपने को पूरा करने में इसरो काफ़ी मददगार साबित हो सकता है।
इसरो के अनुसार चंद्रयान 2 चांद के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में उतरेगा जहां अभी तक कोई देश नहीं पहुंचा है।
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चांद पर क्या करेगा चंद्रयान 2
इसरो के अनुसार चंद्रयान 2 चांद के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में उतरेगा जहां अभी तक कोई देश नहीं पहुंचा है। इसका मकसद, चंद्रमा की जानकारी जुटाना है। ऐसी खोज करना जिनसे भारत के साथ ही पूरी मानवता को फायदा होगा।
इन परीक्षणों और अनुभवों के आधार पर ही भावी चंद्र अभियानों की तैयारी में जरूरी बड़े बदलाव होंगे। ताकि भविष्य के चंद्र अभियानों की नई टेक्नोलॉजी को बनाने और उन्हें तय करने में मदद मिले। मिशन के मुख्य उद्देश्यों में चंद्रमा पर पानी की मात्रा का अनुमान लगाना, उसके जमीन, उसमें मौजूद खनिजों एवं रसायनों तथा उनके वितरण का अध्ययन करना, उसकी भूकंपीय गतिविधियों का अध्ययन, और चंद्रमा के बाहरी वातावरण की ताप-भौतिकी गुणों का विश्लेषण है। मिशन में तरह-तरह के कैमरा, स्पेक्ट्रोमीटर, रडार, प्रोब और सिस्मोमीटर भेजे जा रहे हैं। चंद्रमा पर भारत के पहले मिशन चंद्रयान-1 ने वहां पानी की मौजूदगी की पुष्टि की थी। मिशन मून के तहत चंद्रयान-2 चांद के साउथ पोल पर कदम रखेगा।
दरअसल, चांद फतह कर चुके अमेरिका, रूस और चीन ने अभी तक इस जगह पर कदम नहीं रखा है। चांद के इस भाग के बारे में अभी बहुत जानकारी भी सामने नहीं आ पाई है। भारत के चंद्रयान-1 मिशन के दौरान साउथ पोल में बर्फ के बारे में पता चला था।
तभी से चांद के इस हिस्से के प्रति दुनिया के देशों की रुचि जगी है। भारत इस बार के मिशन में साउथ पोल के नजदीक ही लैंड करेगा। ऐसे में माना जा रहा है कि भारत मिशन मून के जरिए दूसरे देशों पर बढ़त हासिल कर लेगा। कहा जा रहा है कि चंद्रयान-2 के जरिए भारत एक ऐसे अनमोल खजाने की खोज कर सकता है जिससे न केवल अगले करीब 500 साल तक इंसानी ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया जा सकता है बल्कि खरबों डॉलर की कमाई भी हो सकती है। चांद से मिलने वाली यह ऊर्जा ने केवल सुरक्षित होगी बल्कि तेल, कोयले और परमाणु कचरे से होने वाले प्रदूषण से मुक्त होगी। मिशन चंद्रयान-2 में
भारत के लिए चुनौतियां भी कम नहीं हैं। भारत पहली बार चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करेगा। चांद पर लैंडिंग करते ही भारत ऐसा करने वाले अमेरिका, रूस और चीन के साथ चौथा देश हो जाएगा। भारत पहले 15 जुलाई को चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग करने वाला था लेकिन कुछ तकनीकी खराबी के कारण इसे रोक दिया गया था। बाद में इसरो ने चंद्रयान को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर दिया।
चांद पर फतह से देश की ऊर्जा जरूरतों पूरी होंगी
एक विशेषज्ञ का अनुमान है कि एक टन हीलियम-3 की कीमत करीब 5 अरब डॉलर हो सकती है। चंद्रमा से 2,50,000 टन हीलियम-3 लाया जा सकता है जिसकी कीमत कई ट्रिल्योन डॉलर हो सकती है। चीन ने भी इसी साल हीलियम-3 की खोज के लिए अपना चांग ई 4 यान भेजा था। इसी को देखते हुए ही अमेरिका, रूस, जापान और यूरोपीय देश भी अब चंद्रमा पर कदम रखने जा रहे हैं। यही नहीं ऐमजॉन कंपनी के मालिक जेफ बेजोस चंद्रमा पर कॉलोनी बसाने की चाहत रखते हैं।
अंतरिक्ष की सेना बनाने में जुटा भारत
बीते 27 मार्च 2019 को भारत ने मिशन शक्ति के अंतर्गत जमीन से मिसाइल दागकर पृथ्वी की निचली कक्षा में 300 किलोमीटर की रेंज पर मौजूद एक सैटेलाइट को मार गिराने की अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया था। जिसके बाद भारत ऐसी क्षमता वाला चौथा देश बन गया। परीक्षण में इस्तेमाल किया गया उपग्रह भारत का था और परीक्षण के बाद इसके हजारों टुकड़े हो गए थे।
डीआरडीओ और इसरो किसी भी संभावित खतरे से निपटने की तैयारियों में जुट गए हैं। इसमें डाइरेक्ट एनर्जी वेपन और को-ऑर्बिटल किलर्स को विकसित करने अलावा अपने सैटेलाइट्स को इलेक्ट्रानिक और फिजिकल हमले से बचाने के तरीके शामिल हैं। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन डॉयरेक्ट एनर्जी वेपन, लेजर, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक पल्स के साथ को ऑर्बिटल किलर्स की तकनीकी को और उन्नत बनाने की दिशा में काम कर रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अगर देश के मुख्य उपग्रहों को निशाना बनाया जाता है तो सशस्त्र बलों की मांग पर मिनी उपग्रहों को लॉन्च करने की योजना है। डीआरडीओ लंबे समय से विभिन्न प्रकार के डीईडब्ल्यू जैसे उच्च ऊर्जा वाले लेजर और उच्च शक्ति वाले माइक्रोवेव कार्यक्रम चला रहा है, जिससे हवाई और जमीन पर स्थित लक्ष्यों को नष्ट किया जा सके।
कुलमिलाकर चंद्रयान 2 मिशन की सफलता भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है साथ ही यह मिशन भविष्य में अंतरिक्ष शोध की नई संभावनाओं को भी जन्म देगा।
2022 तक मानव को अंतरिक्ष में भेजने की योजना
भारत ने लगभग 50 साल पहले अपना अंतरिक्ष कार्यक्रम लॉन्च किया था। 1974 के परमाणु परीक्षण के बाद पश्चिमी देशों ने भारत पर प्रतिबंध लगा दिए थे। इसके बाद देश ने अपनी तकनीक और रॉकेट विकसित करने पर फोकस करना शुरू कर दिया था। इसरो ने तभी से आयात पर निर्भरता कम कर दी। चंद्रयान-2 के बाद इसरो की मंशा है कि वह जल्द 2022 तक ‘गगनयान’ से एक भारतीय को भारत की जमीन से और भारत के रॉकेट से अंतरिक्ष में भेजे। रूस की ओर से 14 सितंबर 1959 में भेजे गए लूना 2 मिशन को चांद तक पहुंचने में पहली बार सफलता मिली।
यह पहला एयरक्राफ्ट था जो चांद की सतह तक पहुंच पाया। फिर सोवियत रूस ने 1 नवंबर 1959 को लूना-3 का प्रक्षेपण किया। 1959 से 1963 तक चांद पर कई मिशन भेजे गए पर इनमें से किसी को भी कामयाबी नहीं मिली। पर 1964 में 30 जुलाई को अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा भेजे गए रेंजर -7 को चांद पर उतरने में सफलता मिली। बाद में अमेरिका ने चाँद पर अपना मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन अपोलो-11 को 16 जुलाई 1969 को कैनेडी स्पेस सेंटर से सुबह 8:32 पर लॉन्च किया गया था। नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने 20 जुलाई को चांद पर कदम रखा था।
फिलहाल भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) इतिहास रचने के लिए एक और कदम बढ़ाने जा रहा है। 05 जून, 2017 को इसरो ने अपने सबसे भारी रॉकेट जीएसएलवी मार्क-3 को सफ़ल प्रक्षेपण कर बड़ी कामयाबी हासिल की थी । इसरो द्वारा निर्मित यह अब तक का सबसे वजनी सेटेलाईट है, जिसका वजन 3,136 किलो है। इस सेटेलाईट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे और रॉकेट के मुख्य और सबसे बड़े क्रायोजेनिक इंजन को इसरो के वैज्ञानिकों ने भारत में ही विकसित किया है। खास बात यह है कि इसके सफल प्रक्षेपण से भारत मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियान करनें में सक्षम हो गया है।
जीएसएलवी मार्क-3 की सफलता के बाद इसरो का इंसान को अंतरिक्ष में भेजने का सपना कर पायेगा । अभी अमेरिका और रूस ही अपने दम पर स्पेस में इंसान को भेज पाए हैं। मार्क-3 के साथ भेजे गए क्रू मॉड्यूल के सफल टेस्ट से भारत को उम्मीदें बंधी हैं। चंद्रयान-2 और मंगल यान की कामयाबी के बाद भारत की निगाहें अब आउटर स्पेस पर हैं। इसरो ग्रहों की तलाश और उनके व्यापक अध्ययन के लिए मानव युक्त अंतरिक्ष मिशन भेजने की योजना बना रहा है।
मानव स्पेसफ्लाइट कार्यक्रम का उद्देश्य पृथ्वी की निचली कक्षा के लिए दो में से एक चालक दल को ले जाने और पृथ्वी पर एक पूर्व निर्धारित गंतव्य के लिए सुरक्षित रूप से उन्हें वापस जाने के लिए एक मानव अंतरिक्ष मिशन शुरू करने की है। कार्यक्रम इसरो द्वारा तय चरणों में लागू करने का प्रस्ताव है। वर्तमान में, पूर्व परियोजना गतिविधियों क्रू मॉड्यूल ,पर्यावरण नियंत्रण और लाइफ सपोर्ट सिस्टम, क्रू एस्केप सिस्टम, आदि महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के विकास पर इसरो काम कर रहा है। योजना के अनुसार अंतरिक्ष में जाने वाली इसरो की पहली मानव फ्लाईट में दो यात्री होंगे। फ़िलहाल यह फ्लाईट अंतरिक्ष में सौ से नौ सौ किलोमीटर ऊपर तक ले जाने की योजना है ।
मंगल अभियान और चंद्रयान 2 की सफ़लता के बाद इसरो के वैज्ञानिको अब सन मिशन की तैयारी कर रहें है।
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इसरो का आदित्यः मून मिशन के बाद सन मिशन
मंगल अभियान और चंद्रयान 2 की सफ़लता के बाद इसरो के वैज्ञानिको अब सन मिशन की तैयारी कर रहें है। सूर्य कॅरोना का अध्ययन एवं धरती पर इलेक्ट्रॉनिक संचार में व्यवधान पैदा करने वाली सौर-लपटों की जानकारी हासिल करने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) जल्दी ही आदित्य-1 उपग्रह प्रक्षेपित करेगा ।
आदित्य-1 उपग्रह- सोलर ' कॅरोनोग्राफ’ यन्त्र की मदद से सूर्य के सबसे भारी भाग का अध्ययन करेगा। इससे कॉस्मिक किरणों, सौर आंधी, और विकिरण के अध्यन में मदद मिलेगी। अभी तक वैज्ञानिक सूर्य के कॅरोना का अध्यन केवल सूर्यग्रहण के समय में ही कर पाते थे। इस मिशन की मदद से सौर वालाओं और सौर हवाओं के अध्ययन में जानकारी मिलेगी कि ये किस तरह से धरती पर इलेक्ट्रिक प्रणालियों और संचार नेटवर्क पर असर डालती है।
इससे सूर्य के कॅरोना से धरती के भू चुम्बकीय क्षेत्र में होने वाले बदलावों के बारे में घटनाओं को समझा जा सकेगा। इस सोलर मिशन की मदद से तीव्र और मानव निर्मित उपग्रहों और अन्तरिक्षयानों को बचाने के उपायों के बारे में पता लगाया जा सकेगा। इस उपग्रह का वजन 200 किग्रा होगा। ये उपग्रह सूर्य कैरोना का अध्ययन कृत्रिम ग्रहण द्वारा करेगा। इसका अध्ययनकाल 10 वर्ष रहेगा। ये नासा द्वारा सन् 1995 में प्रक्षेपित 'सोहो' के बाद सूर्य के अध्ययन में सबसे उन्नत उपग्रह होगा।
शुक्र ग्रह पर भी है नजर
मंगल के अलावा इसरो के वैज्ञानिकों की नजर शुक्र ग्रह पर भी टिकी है। विशेषज्ञ शुक्र ग्रह पर स्पेस मिशन को खासा अहम मानते हैं क्योंकि धरती के बेहद करीब होने के बावजूद इस ग्रह के बारे में बेहद कम जानकारी उपलब्ध है। हालांकि शुक्र ग्रह का मिशन महज ऑर्बिटर भेजने तक सीमित हो सकता है. अब तक सिर्फ अमेरिका, रूस, यूरोपीय स्पेस एजेंसी और जापान ही शुक्र ग्रह तक कामयाब मिशन लॉन्च कर पाए हैं।
चंद्रयान- 2
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सैटेलाइट लॉन्च सिस्टम की क्रांति
फिलहाल इसरो छोटे सैटेलाईट लॉन्च वीइकल को तैयार करने में जुटा है, जिसे सिर्फ तीन दिनों में असेंबल किया गया जा सकेगा। पीएसएलवी जैसे रॉकेट्स को तैयार करने में आमतौर पर 30 से 40 दिन लग जाते हैं, ऐसे में इसरो का यह प्रयास सैटलाइट लॉन्चिंग की दिशा में बड़ी क्रांति जैसा होगा। यही नहीं इस रॉकेट को तैयार करने में पीएसएलवी की तुलना में 10 फीसदी राशि ही खर्च होगी।
दुनिया भर में लॉन्च व्हीकल की मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट फिलहाल 150 से 500 करोड़ रुपये तक होती है। इस व्हीकल की कीमत पीएसएलवी के मुकाबले 10 फीसदी ही होगा। हालांकि यह रॉकेट 500 से 700 किलो तक के सैटलाइट्स को ही लॉन्च कर सकेगा। अभी भी हमारे पास संचार प्रणाली के मद्देनजर कम सैटेलाइट हैं, इसलिए इसरो सैटेलाइट लॉन्च करने की प्रकिया को दोगुना करने के प्रयास में है।
रेल दुर्घटनाओं से सुरक्षित करेगा इसरो
मानवरहित रेल फाटकों पर हर साल कई हादसे होते हैं। इन हादसों में कई जानें भी जाती हैं, लेकिन अभी तक इसके लिए रेलवे कोई ठोस कदम नहीं उठा पाया है। रेलवे अब इन फाटकों को सुरक्षित करने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के साथ काम कर रहा है।
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