भोपाल गैस त्रासदी की वह तस्वीर, जो इस त्रासदी का प्रतीक बन गई।
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सियासत की भेंट चढ़े गैसकांड वाले मुद्दे
सियासत की बात करें तो उस वक्त की सूबे की और केंद्र की सरकारों ने क्या किया था, जबकि उन्हें करना क्या चाहिए था? यह सवाल अब तक अनुत्तरित हैं। दोनों ही कांग्रेस की सरकारें थीं। प्रधानमंत्री थे राजीव गांधी और मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह। सरकारों ने गिरफ्तार आरोपी वारेन एंडरसन को सुरक्षित और सम्मान सहित अमेरिका जाने का इंतजाम किया था। इस पर सियासत से लेकर बौद्धिक बहसों के अनेक कारवां गुजर चुके हैं।
भाजपा तो भोपाल में बकायदा गैस हादसे और पीड़ितों की समस्या को दाे दशक तक चुनावी मुद्दा बनाती रह चुकी है। गैस त्रासदी और उस वक्त के पूरे वार्डों यानी समूचे शहर को गैस पीड़ित मानने पर जोर देती रही यह पार्टी बीते करीब दो दशक से प्रदेश की सत्ता में हैं, लेकिन गैसकांड वाले मुद्दे पीछे छूट गए हैं।
बीते चार विधानसभा चुनाव में किसी भी सियासी जमात ने गैस कांड पीड़ितों के मुद्दे को चुनावी मुद्दा ही नहीं माना। हालांकि जब अदालती फैसले की वजह से गैस कांड और एंडरसन का मामला चर्चा में आया,तो जांच के लिए कमेटियां बना दी गई। वर्तमान सरकार ने भी अब से करीब 12 साल पहले न्यायिक जांच कमेटी बनाई थी।
न तो हादसे का मुख्य आरोपी वारेन एंडरसन इस दुनिया में है, न ही उसके भारतीय साझेदार और न ही उसके मददगार बने तत्कालीन सरकारों के मुखिया। गैस पीड़ितों की उस वक्त मदद करने वाले लोगों के संगठन भी छिन्न-भिन्न होकर नेताओं की संख्या उतनी संख्या तक जा पहुंचे ही है जितनी बरसियां बीतती जा रही हैं। न तो गैस त्रासदी के लिए जिम्मेदारों को सजा ही मिली और न ही पीड़ितों को राहत महसूस कर सकने लायक न्याय। ‘भोपाल’ को लेकर सियासत बदस्तूर जारी है।
क्या हमने सबक ली?
यक्ष प्रश्न यह है कि हमने और दुनिया ने विश्व की भीषणतम युद्ध त्रासदी हिरोशिमा नागासाकी की ही तरह विश्व की भीषणतम औद्योगिक त्रासदी भोपाल गैस कांड से क्या सीखा? ये हादसा दुनिया के रहबरों के माथे पर सिकन पैदा नहीं कर पाया था, लेकिन इससे सबक लिए बिना दुनिया का भला नहीं हो सकता।
गैस त्रासदी में एक रात में काल कवलित हुए साढ़े तीन हजार और अड़तीस साल से लगातार जारी हादसे में तिल तिलकर मृत हुए करीब 35 हजार लोगों को सही मायने में श्रृद्धांजलि यही होगी कि जो बचे हैं उन्हें बेहतर इलाज और मुआवजे से महरूम रह गए लोगों को उनका हक मिले, वर्ना हर साल बरसी में हम संख्या की एक एक गिरह बढ़ाते जाएंगे, होगा कुछ नहींं।
हालांकि यह भी हौलनाक सच है कि गैस कांड की बरसी पर अब मातम के लिए जुटने वालों की तादाद 30 लाख की आबादी वाले भोपाल में ही सैकड़ा से ज्यादा नहीं होती। जाहिर है हम न सबक ले रहे हैं, न हादसे को लेकर गम बचा है।
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