वर्ष 2000 के बाद भारत में 1303 दोषियों को मौत की सजा सुनाई जा चुकी है। पर इनमें से केवल चार को ही फांसी दी गई है।
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दोषियों के वकील एके सिंह तो रात भर किसी न किसी तरह फांसी टलवाने की जुगत में हर संभव दरवाजा खटखटा रहे थे। सुबह 3:30 पर आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी हर कोशिश को खारिज कर दिया। फांसी की सजा सुनाने वाले न्यायाधीश भी फैसला सुनाने से पहले कई बार खुद को टटोलते हैं।
जेल का वह स्टाफ जो इस पूरी प्रक्रिया से जुड़ा होता है, उसके लिए भी इस अनुभव से गुजरना बहुत आसान नहीं होता। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2000 के बाद भारत में 1303 दोषियों को मौत की सजा सुनाई जा चुकी है। पर इनमें से केवल चार को ही फांसी दी गई है। इनमें धनंजय चटर्जी, अजमल आमिर कसाब, अफजल गुरू और याकूब मेमन शामिल हैं। यह पहला मामला है जब एक साथ चार अपराधियों को फांसी पर लटकाया गया है।
संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार किसी भी व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता के हनन का अधिकार किसी को भी नहीं है। सिवाए एक निश्चित कानूनी प्रक्रिया के द्वारा जब यह बहुत जरूरी हो जाए। फांसी बहुत आसान नहीं होती। यह एक बड़ी सजा है, इसके बारे में उतनी ही गंभीरता से सोचा जाता है। इसके बाद भी कानून में ऐसे विकल्प मौजूद हैं जिनका इस्तेमाल कर दोषी अपनी सजा के विरुद्ध् याचिका दायर कर सकता है। इनमें राष्ट्रपति को भेजी जाने वाली दया याचिका भी एक विकल्प है।
भारत में अभी तक हत्या, देशद्रोह जैसे मामलों में फांसी की सजा का प्रावधान है। पर धनंजय चटर्जी को 14 वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार और उसके बाद हत्या के जुर्म में यह कहते हुए फांसी की सजा दी गई थी कि सिक्योरिटी गार्ड की जिम्मेदारी सुरक्षा देने की है न कि किसी की सुरक्षा पर खतरा उत्पन्न कर देने की। इसे तब दुर्लभ में दुर्लभतम् अपराध कहा गया था। जबकि निर्भया के अपराधियों ने जो किया वह इससे भी ज्यादा खौफनाक था था। यहां फांसी केवल फांसी नहीं रह गई थी। वह एक ऐसे संकल्प में बदल चुकी थी, जो सारे देश ने एक साथ लिया। जिसके लिए युवाओं की भीड़ ने (जिनमें लड़के और लड़कियां दोनों शामिल थे), वॉटर केनन और पुलिस की लाठियां खाईं। जबकि विमर्शकारों ने इसे बलात्कार पर दी जाने वाली सजा की कठोरता से हटाकर अपराधियों के मानवाधिकार और फांसी के औचित्य पर ला दिया। इसे विषयांतर करना कहते हैं। इस एक टूल के सहारे कई लोग कई तरह के लाभ ले जाते हैं।
निर्भया के वकील ने बार-बार इसी टूल का इस्तेमाल करने की कोशिश की। कई बार तो यह दलील भी दी गई कि मीडिया हाइप के कारण इन्हीं चार को फांसी के तख्ते पर ले जाने की जल्दबाजी की जा रही है। पर यह भी तय है कि अगर मीडिया हाइप न होती तो शायद इस मामले में ऐसा फैसला कभी नहीं आ पाता।
यह बच्चियों की सुरक्षा का मसला है, स्त्रियों में फिर से विश्वास बहाली का मसला है। क्यों हर बार एक बलात्कारी यह सोचकर निश्चिंत रहे कि वह किसी न किसी दया अथवा करुणा के सहारे बच जाएगा? क्यों हर बार औरतें घर से निकलते हुए इस बात से डरें कि उनका कभी भी बलात्कार हो सकता है? हैदराबाद और उन्नाव का मामला दिल दहला देने वाला मामला रहा है।
खुशी जतातीं निर्भया की मां आशा देवी
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सवाल इस पर भी खड़े किए गए कि क्या इनकी फांसी से बलात्कार होने रुक जाएंगे ? निश्चित ही हर सजा एक उदाहरण बनती है और वह अन्यों के लिए मानसिक चेतावनी का काम करती है। मैंने अपने अब तक के पत्रकारिता के अनुभव में उन लोगों को भी देखा है जो निर्दोष फंसाए जाते हैं और जेल में रहकर शातिर अपराधी बनकर लौटते हैं।
दरअसल, इनके लिए जेल अपराध का प्रशिक्षण गृह बन जाती है। जबकि ऐसे लोग भी हैं जो गंभीरतम आरोपों में जेल की सजा काटते हैं, परंतु उस अपराध के बाद उनमें ऐसा पश्चाताप होता है कि उनका व्यवहार पूरी तरह बदल जाता है। ऐसे अपराधियों के लिए जेल सुधार गृह साबित होते हैं। अपने व्यवहार के ही कारण कई अपराधियों की सजा कम होने के उदाहरण भी हमारे यहां कम नहीं है।
मनुष्य के बदलने, अपराध करने और पश्चाताप करने की संभावना से कभी भी इनकार नहीं किया जा सकता। पर निर्भया के दोषियों के बारे में जितनी भी सूचनाएं मिलीं उनमें उनके बदलने या पश्चाताप की भावना जागृत होने का कोई संकेत नहीं मिला। इसके उलट फांसी से बचाने के उनके वकील की कानूनी बाजीगरी के संकेत खूब मिले।
फांसी से दो घंटे पहले तक भी वे यही करते रहे। पर यह बाजीगरी चली नहीं और आखिरकार चारों अपराधियों को फांसी पर लटका दिया गया। मृत्यु शोक है। यह कभी भी (किसी अपराधी की भी) जश्न या खुशी की बात नहीं हो सकती। पर इन चारों अपराधियों की फांसी उस संकल्प के पूरे होने का समय है जो सारे देश ने किया था निर्भया के बलात्कार और मृत्यु के बाद कि निर्भया के दोषियों के लिए फांसी से कम कुछ भी गवारा नहीं। यह मामला एक नजीर है जो कानून के इतिहास में सदैव याद किया जाता रहेगा।
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