जब मैं 7 या 8 साल का था तो पंडित परमानन्द ने मुझे बताया था कि वे स्वराज में पत्रकारिता प्रशिक्षण के दरम्यान जेल की चक्की पीसा करते थे और बाजार में घंटा बजाकर स्वराज बेचते थे। लोग आते। चुपचाप अखबार खरीदकर ले जाते। पंडित परमानन्द पंडित सुंदरलाल के कर्मयोगी में भी लिखते थे। इसके बाद 1919 में जलियांवाला बाग नरसंहार हुआ। बाद के वर्षों में चंद्रशेखर आज़ाद, भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी जाती है और छतरपुर जिले में चरणपादुका नरसंहार किया जाता है। अर्थात भारत के हर इलाके में बेगुनाह देशवासियों को मारकर बरतानवी सत्ता आतंक का साम्राज्य कायम कर चुकी थी।
यहां लंबी पृष्ठभूमि इसलिए भी जरूरी थी क्योंकि मैं बताना चाहता था कि उन दिनों अंग्रेजों का डर कितना था। ऐसे में गांधी जी के लिए पत्रकारिता कितनी जोखिम भरी थी, बताने की आवश्यकता नहीं। शायद इसीलिए श्रीधर जी ने इस खंड का नाम गांधी युग दिया होगा। सन 1919 में यानी करीब एक सौ छह साल पहले गांधीजी गुजराती में नवजीवन शुरू करते हैं। यंग इंडिया के संपादक बनते हैं और झकझोरने वाले विचारों की नदी बहाते हैं।
यंग इंडिया का संपादक बनते ही वे पहला पत्र अखबार में उन लोगों को लिखते हैं, जो उनसे असहमत थे या उनका विरोध करते थे। दूसरा पत्र वे उन गोरों को लिखते हैं, जिसमें वे उन्हें भारत की आज़ादी के लिए मजबूर करने वाले तर्क देते हैं। यह दोनों अखबार करीब-करीब तेरह-चौदह साल निकलते रहे।
गांधी के नैतिक साहस का एक और उदाहरण। सन 1919 में ही रॉलेट एक्ट लागू हुआ। इसमें प्रकाशित होने वाली हर सामग्री की पूर्व अनुमति जरूरी बना दी गई थी। एक्ट के तहत किसी अपील और दलील का स्थान नहीं था। गांधी जी इसके विरोध में सत्याग्रह का प्रकाशन करते हैं। इस अखबार के प्रकाशन की अनुमति वे नहीं लेते। पहले अंक में ही लिखते हैं कि सत्याग्रह का प्रकाशन तब तक होता रहेगा, जब तक कि एक्ट वापस नहीं लिया जाता। यह साहस दिखाने वाले सिर्फ गांधी ही हो सकते थे।
इसके बाद 1933 मेंं उनकी पहल पर हरिजन कल्याण के लिए नया अखबार हरिजन निकलता है। क्या आप यह जानते हैं कि हरिजन नाम संपादक के नाम पत्र लिखने वाले एक दलित पाठक ने गांधी जी को भेजा था। यह पहले अंग्रेजी में फिर हिंदी में निकला। उनका इस समाचारपत्र के लिए उद्देश्य एकदम साफ था- सेवा।
आज विचारों की खुराक हमें कहां मिलती है। न के बराबर। गांधी ने उस समय कहा था कि एक विचार पत्र होना चाहिए। सरकार के दबाव और सेंसरशिप के विरोध में वे लिखते हैं-
एक-एक पंक्ति अगर दिल्ली में बैठे प्रेस सलाहकार को भेजना पड़े तो मैं स्वतंत्रतापूर्वक काम नही कर सकता। प्रेस की आज़ादी तो विशेषाधिकार है।
गांधी के तेवर से सरकार परेशान हो चुकी थी। जब 1942 में उन्होंने
अंग्रेजो! भारत छोड़ो आन्दोलन शुरू किया तो हरिजन बंद करना पड़ा। गांधी जेल गए और इधर हरिजन पर ताला पड़ गया। एक-एक प्रति जला दी गई। दो बरस बाद गांधी जी जेल से छूटे तो फिर हरिजन शुरू कर दिया। सेवाग्राम से ही उन्होंने सर्वोदय का भी प्रकाशन प्रारंभ कर दिया। यह उनके अंत समय तक जारी रहा। गांधी ने अपने को हमेशा पूर्णकालिक पत्रकार माना। उनका कहना था कि सबसे बड़ा काम देश की आज़ादी है। इसके बाद मेरा काम पत्रकारिता का है। उन्होंने साफ-साफ कहा था,
" संपादक को कोई भी परिणाम भुगतना पड़े, लेकिन उसे अपने विचार खुलकर व्यक्त करना चाहिए।"
बनारसीदास चतुर्वेदी की पत्रकारिता
गांधीजी को समर्पित समग्र भारतीय पत्रकारिता के इस अंतिम भाग में कन्नड़, असमिया, मलयालम, मराठी, तमिल, तेलुगु तथा अन्य भारतीय भाषाओं की शब्दक्रान्ति का विवरण है। चांद के फांसी अंक को सलामी दी गई है। खास बात यह है कि इस कालखंड में जो समाचारपत्र निकले, उनमें से अधिकांश आज भी प्रकाशित हो रहे हैं। ( लेकिन उनकी वर्तमान पत्रकारिता की दिशा और दशा पर मैं चुप रहना पसंद करूंगा)
इनके अलावा डॉक्टर भीमराव आंबेडकर के मराठी साप्ताहिक मूक नायक और बहिष्कृत भारत के जन्म की कहानी भी आप इस भाग में पढ़ सकते हैं। डॉक्टर आम्बेडकर को भारतवासी संविधान निर्माण में उनकी भूमिका के लिए जानते हैं। पर, वे मूलतः विलक्षण अर्थशास्त्री थे, यह लोग नहीं जानते। अर्थशास्त्र में पहली भारतीय पीएचडी डॉक्टर आंबेडकर ने ही की थी, यह भी कम लोग ही जानते हैं।
साढ़े नौ बरस तक बनारसीदास चतुर्वेदी ने विशाल भारत का निर्भीक संपादन किया और उसके बाद मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ आ गए। वहां कुण्डेश्वर से मधुकर का प्रकाशन किया। सन्दर्भ के तौर पर बता दूं कि चतुर्वेदी जी पहले इंदौर के डेली कॉलेज में प्राध्यापक थे। इस कॉलेज में अधिकतर रियासतों के राजकुमार पढ़ने आया करते थे। टीकमगढ़ रियासत के राजकुमार भी चार साल तक बनारसीदास चतुर्वेदी के छात्र रहे थे। जब वे राजा बने तो उन्होंने चतुर्वेदी जी को न्यौता भेजा कि वे टीकमगढ़ आकर रहें और पत्रिका का प्रकाशन करें। मधुकर पत्रिका चतुर्वेदी जी ने ही निकाली थी।
दिलचस्प कहानी यह है कि राजा साहब बुंदेलखंडी व्यंजनों के बड़े शौकीन थे और बहुत अच्छे रसोइये भी थे। उन्होंने बुंदेली व्यंजनों पर एक किताब लिखी और अपने प्रधानमंत्री को दिल्ली भेजा कि वे इस किताब को किसी प्रेस से प्रकाशित कराएं। उन दिनों दिल्ली में गिने-चुने प्रकाशक ही होते थे। जब प्रधानमंत्री दिल्ली गए तो उन प्रकाशकों ने बड़ा मजाक़ उड़ाया। प्रधानमंत्री से राजा साहब ने यह किस्सा सुना तो बहुत क्रोधित हो गए और सीधे लंदन या जर्मनी से नई प्रिंटिंग प्रेस खरीदकर टीकमगढ़ में लगाईं। इस प्रेस में बुंदेली व्यंजनों की वह किताब छपी।
बाद में इस मशीन के लिए कोई पूर्णकालिक काम नहीं बचा तो उन्होंने बनारसी दास चतुर्वेदी से प्रार्थना कि वे राजा मधुकर शाह के नाम से मधुकर नमक पत्रिका निकालें। चतुर्वेदी जी ने यह आग्रह स्वीकार कर लिया। बताने की आवश्यकता नहीं कि मधुकर में अपनी रचना छपवाने के लिए चोटी के लेखक लालायित रहते थे। स्वतंत्रता से पहले मधुकर पत्रिका ने हिंदी पत्रकारिता की शोभा बढ़ाई है।