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गांधी जयंती विशेष: गांधीजी की याद के बहाने गंगा स्वच्छता अभियान और बापू की नैतिक स्वच्छता

सार

मोहनदास करमचंद गांधी जब 1915 दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद अपने मित्र चार्ली एंड्रयूज के साथ शांति निकेतन में रवीन्द्रनाथ टैगोर से मिलने के बाद 5 अप्रैल को कुंभ के अवसर पर महात्मा मुन्शीराम से मिलने हरिद्वार पहुंचे तो इस तीर्थनगरी और खासकर गंगा की गंदगी को देख कर उन्हें बड़ा कष्ट हुआ।
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गांधी जी बाह्य नहीं अपितु आंतरिक स्वच्छता पर भी ध्यान देते थे। - फोटो : Social Media
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विस्तार
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस स्वच्छ भारत की कल्पना आज कर रहे हैं वही कल्पना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने आजादी के आन्दोलन के शुरुआती दौर में ही कर ली थी, इसलिए वर्ष 2014 में जब नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने 2 अक्टूबर 2014 को गांधी जयन्ती के अवसर पर स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत की थी।

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आज इस मिशन को एक जन आन्दोलन की शक्ल देने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन यह प्रयास तब तक अधूरा रहेगा जब तक गांधी जी की सोच के अनुसार मानसिक स्वच्छता पर ध्यान नहीं दिया जाता। गांधी जी ने दोनों तरह की मलिनता से मुक्ति की परिकल्पना की थी।


हरिद्वार की मलिनता देख व्यथित हुए थे गांधी जी  

मोहनदास करमचंद गांधी जब 1915 दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद अपने मित्र चार्ली एंड्रयूज के साथ शांति निकेतन में रवीन्द्रनाथ टैगोर से मिलने के बाद 5 अप्रैल को कुंभ के अवसर पर महात्मा मुन्शीराम से मिलने हरिद्वार पहुंचे तो इस तीर्थनगरी और खासकर गंगा की गंदगी को देख कर उन्हें बड़ा कष्ट हुआ।

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गंगा की इस भौतिक गंदगी से भी कहीं अधिक कष्ट उन्हें नैतिक गंदगी देखकर हुआ। उन्होंने वहां भौतिक गंदगी के अलावा जो नैतिक गंदगी, पाखण्ड और अन्धविश्वास देखा उसका उल्लेख वह अपनी हस्तलिखित डायरी में अपने यात्रा वृतान्त में करना नहीं भूले।


गांधीजी ने डायरी में लिखा है-

‘‘ऋषिकेश और लक्ष्मण झूले के प्राकृतिक दृष्य मुझे बहुत पसन्द आए। परन्तु दूसरी ओर मनुष्य की कृति को वहां देख चित्त को शांति न हुई। हरिद्वार की तरह ऋषिकेश में भी लोग रास्तों को और गंगा के सुन्दर किनारों को गन्दा कर डालते थे। गंगा के पवित्र पानी को बिगाड़ते हुए उन्हें कुछ संकोच न होता था। दिशा-जंगल जाने वाले आम जगह और रास्तों पर ही बैठ जाते थे, यह देखकर मेरे चित्त को बड़ी चोट पहुंची........।

 


हजारों करोड़ खर्च हो गए फिर भी गंगा मैली !

नमामि गंगे कार्यक्रम को जून 2014 में 31 मार्च, 2021 तक की अवधि के लिए गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों को फिर से जीवंत करने के लिए 20,000 करोड़ रुपये के बजटीय परिव्यय के साथ शुरू किया गया था। लक्ष्य पूरा करने के लिए इस परियोजना का विस्तार किया गया।

जलशक्ति राज्यमंत्री विश्वेस्वर टुडू द्वारा 14 मार्च 2022 को राज्यसभा में दी गई जानकारी के अनुसार-

 

नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत, अब तक 30,853 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत पर कुल 364 परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं और 183 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं और चालू हो चुकी हैं।


इन 364 परियोजनाओं में से, 160 परियोजनाएं सीवरेज बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से संबंधित हैं, जिन्हें 5024 मिलियन लीटर प्रति दिन (एमएलडी) सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) क्षमता के निर्माण और पुनर्वास और 5227 किलोमीटर सीवरेज नेटवर्क बिछाने के लिए लिया गया है, जिनमें से 76 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं जिसके परिणामस्वरूप 1,079 एमएलडी एसटीपी क्षमता का निर्माण और पुनर्वास हुआ और 3860 किलोमीटर सीवरेज नेटवर्क बिछाया गया।

इस वक्तव्य के अनुसार वर्ष 2020-21 से 2021-22 तक केवल एक वर्ष की अवधि में 2355.96 रुपये खर्च हुए थे। फिर भी स्थिति यहां तक है कि गंगा का पानी पीने लायक तो रहा नहीं मगर कई स्थानों पर उसके जलचरों के लिए जीने लायक भी नहीं रह गया है। इसका कारण यह कि योजनाकारों को केवल गंगा की भौतिक गंदगी ही नजर आई और गांधी जी की उन चिन्ताओं को दरकिनार कर दिया गया जिनके निराकरण के बिना गंगा की चिरस्थाई पवित्रता बहाल करना संभव नहीं है।

गंगा में ऑर्सेनिक जैसे विषैले तत्व की मात्रा लगातार बढ़ रही है। गंगा की सहायक नदियों यमुना, रामगंगा, चंबल, गोमती-घाघरा, टोंस-कर्मनासा, गंडक-बूढ़ी गंडक, सोन, कोशी और महानंदा आदि नदियों का भी यही हाल है। 

 

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गांधी जी ने केवल हरिद्वार और ऋषिकेश की गंदगी से ही दुखी नहीं थे बल्कि उनकी चिन्ता का विस्तार काशी तक था। - फोटो : Pixabay

काशी की मलिनता के बारे में भी गांधी जी ने लिखा-

गांधी जी ने केवल हरिद्वार और ऋषिकेश की गंदगी से ही दुखी नहीं थे बल्कि उनकी चिन्ता का विस्तार काशी तक था। गांधीजी जब 1901 के दिसम्बर में दूसरी बार भारत लौटे तो उन्हें यहां कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में भी भाग लेने का अवसर मिला।

इसी दौरान वह थोड़े समय के लिए रंगून भी गए लेकिन फरबरी 1902 में वह कलकत्ता लौट आए। वहां उन्हें गोपाल कृष्ण गोखले ने देश को जानने के लिए भारत भ्रमण की सलाह दी तो वह तैयार हो गए।

इसी सलाह का पालन करते हुए वह 21-22 फरवरी को कलकत्ता से राजकोट को रवाना हुए तो रास्ते में काशी, आगरा, जयपुर और पालनपुर में भी एक-एक दिन रुके। उन पर काशी की गंदगी और भिक्षुकों का अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा। यहां के बारे में भी उन्होंने अपने यात्रा विवरण में इस तरह उल्लेख किया था।-
 
सुबह मैं काशी उतरा। मैं किसी पण्डे के यहां उतरना चाहता था। कई ब्राह्मणों ने मुझे घेर लिया। उनमें से जो साफ-सुथरा दिखाई दिया मैंने उसके घर जाना पसन्द किया। मैं यथा विधि गंगा स्नान करना चाहता था और तब तक निराहार रहना था। पण्डे ने सारी तैयारी कर रखी थी। मैंने पहले ही कह रखा था कि सवा रुपये से अधिक दक्षिणा नहीं दे सकूंगा। इसलिए उसी योग्य तैयारी करना। पण्डे ने बिना किसी झगड़े के बात मान ली।

बारह बजे तक पूजा स्नान से निवृत्त हो कर मैं काशी विश्वनाथ के दर्शन करने गया, पर वहां पर जो कुछ देखा मन को बड़ा दुख हुआ। मंदिर पर पहुंचते ही मैंने देखा कि दरवाजे के सामने सड़े हुए फूल पड़े हुए थे और उनमें से दुर्गन्ध निकल रही थी। अन्दर बढ़िया संगमरमरी फर्श था। उस पर किसी अन्धश्रद्धालु ने रुपये जड़ रखे थे; रुपयों में मैल कचरा घुसा रहता है।’


गांधीजी अपनी डायरी में एक जगह आगे लिखते हैं कि-

मैं इसके बाद भी एक दो बार काशी विश्वनाथ गया। किन्तु गन्दगी और हो-हल्ला जैसे के तैसे ही वहां देखे।....’’
 

हरिद्वार जैसे धर्मस्थलों पर भौतिक और नैतिक गंदगी के बारे में गांधी जी ने डायरी में लिखा था-

 
“निसंदेह यह सच है कि हरिद्वार और दूसरे प्रसिद्ध तीर्थस्थान एक समय वस्तुतः पवित्र थे। लेकिन मुझे कबूल करना पड़ता है कि हिन्दू धर्म के प्रति मेरे हृदय में गंभीर श्रद्धा और प्राचीन सभ्यता के लिए स्वाभाविक आदर होते हुए भी हरद्वार में इच्छा रहने पर भी मनुष्यकृत ऐसी एक भी वस्तु नहीं देख सका, जो मुझे मुग्ध कर सकती। लेकिन जहां एक ओर गंगा की निर्मल धारा ने और हिमाचल के पवित्र पर्वत-शिखरों ने मुझे मोह लिया, वहां दूसरी ओर मनुष्य की करतूतों को देख मेरे हृदय को सख्त चोट पहुंची और हरिद्वार की नैतिक तथा भौतिक मलिनता को देख कर मुझे अत्यंत दुख हुआ।

इस बार की यात्रा में भी मैंने हरद्वार की इस दशा में कोई ज्यादा सुधार नहीं पाया। पहले की भांति आज भी धर्म के नाम पर गंगा की भव्य और निर्मल धार गंदली की जाती है। गंगा तट पर, जहां पर ईश्वर-दर्शन के लिए ध्यान लगाकर बैठना शोभा देता है, पाखाना-पेशाब करते हुए असंख्य स्त्री-पुरुष अपनी मूढ़ता और आरोग्य के तथा धर्म के नियमों को भंग करते हैं।

तमाम धर्म-शास्त्रों में नदियों की धारा, नदी-तट, आम सड़क और यातायात के दूसरे सब मार्गों को गंदा करने की मनाही है। यह तो हुई प्रमाद और अज्ञान के कारण फैलने वाली गंदगी की बात। धर्म के नाम पर जो गंगा-जल बिगाड़ा जाता है, सो तो जुदा ही है।

विधिवत् पूजा करने के लिए मैं हरिद्वार में एक नियत स्थान पर ले जाया गया, जिस पानी को लाखों लोग पवित्र समझ कर पीते हैं उसमें फूल, सूत, गुलाल, चावल, पंचामृत वगैरा चीजें डाली गईं। जब मैंने इसका विरोध किया तो उत्तर मिला कि यह तो सनातन् से चली आई एक प्रथा है। इसके सिवा मैंने यह भी सुना कि शहर के गटरों का गंदला पानी भी नदी में ही बहा दिया जाता है, जो कि एक बड़े से बड़ा अपराध है.....। 
 

करोड़ों लोगों की गंदगी ढोता है हरिद्वार- 

गांधीजी ने अपनी डायरी में लिखा है कि जब हरिद्वार कुम्भ में वह पहुंचे थे तो उन्हें बताया गया कि वहां 17 लाख श्रद्धालु उस बार पहुंचे थे। लेकिन अब तो करोड़ों लोग 24 घटों में हरिद्वार तथा इलाहाबाद के घाटों पर पहुंच रहे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद कुंभ में 7 करोड़ तथा उत्तराखण्ड सरकार ने 9 करोड़ लोगों के जमा होने का दावा किया था।

इसके अलावा सालभर स्नान पर्व आते रहते हैं जिनमें करोड़ों स्नानार्थी गंगा तटों पर पहुंचते हैं। डेढ़ से लेकर दो करोड़ तक कांवड़िए हर साल गंगाजल भरने आते हैं जो कि खुले में गंगा किनारे शौचादि करते हैं। जब तक इतने लोगों को और खास कर आश्रम संचालकों को गंगा के प्रति नैतिक जिम्मेदारी से आगाह नहीं किया जाता तब तक गंगा की निर्मलता की कल्पना नहीं की जा सकती।
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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