गांधी जी ने केवल हरिद्वार और ऋषिकेश की गंदगी से ही दुखी नहीं थे बल्कि उनकी चिन्ता का विस्तार काशी तक था।
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काशी की मलिनता के बारे में भी गांधी जी ने लिखा-
गांधी जी ने केवल हरिद्वार और ऋषिकेश की गंदगी से ही दुखी नहीं थे बल्कि उनकी चिन्ता का विस्तार काशी तक था। गांधीजी जब 1901 के दिसम्बर में दूसरी बार भारत लौटे तो उन्हें यहां कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में भी भाग लेने का अवसर मिला।
इसी दौरान वह थोड़े समय के लिए रंगून भी गए लेकिन फरबरी 1902 में वह कलकत्ता लौट आए। वहां उन्हें गोपाल कृष्ण गोखले ने देश को जानने के लिए भारत भ्रमण की सलाह दी तो वह तैयार हो गए।
इसी सलाह का पालन करते हुए वह 21-22 फरवरी को कलकत्ता से राजकोट को रवाना हुए तो रास्ते में काशी, आगरा, जयपुर और पालनपुर में भी एक-एक दिन रुके। उन पर काशी की गंदगी और भिक्षुकों का अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा। यहां के बारे में भी उन्होंने अपने यात्रा विवरण में इस तरह उल्लेख किया था।-
सुबह मैं काशी उतरा। मैं किसी पण्डे के यहां उतरना चाहता था। कई ब्राह्मणों ने मुझे घेर लिया। उनमें से जो साफ-सुथरा दिखाई दिया मैंने उसके घर जाना पसन्द किया। मैं यथा विधि गंगा स्नान करना चाहता था और तब तक निराहार रहना था। पण्डे ने सारी तैयारी कर रखी थी। मैंने पहले ही कह रखा था कि सवा रुपये से अधिक दक्षिणा नहीं दे सकूंगा। इसलिए उसी योग्य तैयारी करना। पण्डे ने बिना किसी झगड़े के बात मान ली।
बारह बजे तक पूजा स्नान से निवृत्त हो कर मैं काशी विश्वनाथ के दर्शन करने गया, पर वहां पर जो कुछ देखा मन को बड़ा दुख हुआ। मंदिर पर पहुंचते ही मैंने देखा कि दरवाजे के सामने सड़े हुए फूल पड़े हुए थे और उनमें से दुर्गन्ध निकल रही थी। अन्दर बढ़िया संगमरमरी फर्श था। उस पर किसी अन्धश्रद्धालु ने रुपये जड़ रखे थे; रुपयों में मैल कचरा घुसा रहता है।’
गांधीजी अपनी डायरी में एक जगह आगे लिखते हैं कि-
मैं इसके बाद भी एक दो बार काशी विश्वनाथ गया। किन्तु गन्दगी और हो-हल्ला जैसे के तैसे ही वहां देखे।....’’
हरिद्वार जैसे धर्मस्थलों पर भौतिक और नैतिक गंदगी के बारे में गांधी जी ने डायरी में लिखा था-
“निसंदेह यह सच है कि हरिद्वार और दूसरे प्रसिद्ध तीर्थस्थान एक समय वस्तुतः पवित्र थे। लेकिन मुझे कबूल करना पड़ता है कि हिन्दू धर्म के प्रति मेरे हृदय में गंभीर श्रद्धा और प्राचीन सभ्यता के लिए स्वाभाविक आदर होते हुए भी हरद्वार में इच्छा रहने पर भी मनुष्यकृत ऐसी एक भी वस्तु नहीं देख सका, जो मुझे मुग्ध कर सकती। लेकिन जहां एक ओर गंगा की निर्मल धारा ने और हिमाचल के पवित्र पर्वत-शिखरों ने मुझे मोह लिया, वहां दूसरी ओर मनुष्य की करतूतों को देख मेरे हृदय को सख्त चोट पहुंची और हरिद्वार की नैतिक तथा भौतिक मलिनता को देख कर मुझे अत्यंत दुख हुआ।
इस बार की यात्रा में भी मैंने हरद्वार की इस दशा में कोई ज्यादा सुधार नहीं पाया। पहले की भांति आज भी धर्म के नाम पर गंगा की भव्य और निर्मल धार गंदली की जाती है। गंगा तट पर, जहां पर ईश्वर-दर्शन के लिए ध्यान लगाकर बैठना शोभा देता है, पाखाना-पेशाब करते हुए असंख्य स्त्री-पुरुष अपनी मूढ़ता और आरोग्य के तथा धर्म के नियमों को भंग करते हैं।
तमाम धर्म-शास्त्रों में नदियों की धारा, नदी-तट, आम सड़क और यातायात के दूसरे सब मार्गों को गंदा करने की मनाही है। यह तो हुई प्रमाद और अज्ञान के कारण फैलने वाली गंदगी की बात। धर्म के नाम पर जो गंगा-जल बिगाड़ा जाता है, सो तो जुदा ही है।
विधिवत् पूजा करने के लिए मैं हरिद्वार में एक नियत स्थान पर ले जाया गया, जिस पानी को लाखों लोग पवित्र समझ कर पीते हैं उसमें फूल, सूत, गुलाल, चावल, पंचामृत वगैरा चीजें डाली गईं। जब मैंने इसका विरोध किया तो उत्तर मिला कि यह तो सनातन् से चली आई एक प्रथा है। इसके सिवा मैंने यह भी सुना कि शहर के गटरों का गंदला पानी भी नदी में ही बहा दिया जाता है, जो कि एक बड़े से बड़ा अपराध है.....।
करोड़ों लोगों की गंदगी ढोता है हरिद्वार-
गांधीजी ने अपनी डायरी में लिखा है कि जब हरिद्वार कुम्भ में वह पहुंचे थे तो उन्हें बताया गया कि वहां 17 लाख श्रद्धालु उस बार पहुंचे थे। लेकिन अब तो करोड़ों लोग 24 घटों में हरिद्वार तथा इलाहाबाद के घाटों पर पहुंच रहे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद कुंभ में 7 करोड़ तथा उत्तराखण्ड सरकार ने 9 करोड़ लोगों के जमा होने का दावा किया था।
इसके अलावा सालभर स्नान पर्व आते रहते हैं जिनमें करोड़ों स्नानार्थी गंगा तटों पर पहुंचते हैं। डेढ़ से लेकर दो करोड़ तक कांवड़िए हर साल गंगाजल भरने आते हैं जो कि खुले में गंगा किनारे शौचादि करते हैं। जब तक इतने लोगों को और खास कर आश्रम संचालकों को गंगा के प्रति नैतिक जिम्मेदारी से आगाह नहीं किया जाता तब तक गंगा की निर्मलता की कल्पना नहीं की जा सकती।
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