परीक्षा वाला दिन
आज मेरी परीक्षा का दिन था और परीक्षा केंद्र पर जाने की तैयारी करनी थी। मैं नहा-धोकर तैयार हुआ। अब समय 5:40 AM हो रहा था। मुझे किसी भी हालत में 8:00 AM बजे परीक्षा केंद्र पर रिपोर्टिंग करनी थी। मैं किसी तरह परीक्षा केंद्र पर पहुँचा। परीक्षा केंद्र के पास में ही एक चाय की दुकान दिखी। मैं दुकान के पास गया, वहाँ मेरी चाय वाले के साथ थोड़ी सी बातचीत हुई…….
मैं: भैया, एक छोटी चाय देना।
चायवाला: क्या आज कोई परीक्षा है?
मैं: हाँ।
चायवाला: कौन सी परीक्षा है?
मैं: शिक्षक बनने की परीक्षा है।
चायवाला: आप यहाँ के तो हो नहीं, कहाँ से आए हो?
मैं: मैं लखनऊ से आया हूँ।
चायवाला: हाँ, मुझे लगा ही था कि आप लखनऊ से होंगे। मैं भी कभी-कभार लखनऊ आया-जाया करता हूँ।
मैं: अच्छा, बढ़िया है।
चायवाला: आप कौन सी जाति से हो?
मैं: मैं ब्राह्मण हूँ और ब्राह्मणों में मैं तिवारी हूँ।
चायवाला: मैं भी ब्राह्मण हूँ और @@@ जाति से हूँ।
('@@@' इस शब्द के बारे में मुझे कुछ समझ नहीं आया कि यह व्यक्ति खुद को कौन सा ब्राह्मण कह रहा है। मैंने उससे पूछा भी नहीं। अगर मैं पूछ भी लेता तो क्या ही होता? मैं परीक्षा देने आया हूँ, किसी पचड़े में पड़ने नहीं।)
चायवाला चाय देता है।
मैं: कितना हुआ?
चायवाला: ₹7 की चाय है, मैं तुम्हें ₹5 की दूँगा।
मैंने ₹5 का सिक्का दिया और थोड़ी दूर जाकर चाय पीने लगा।
चाय पीने के बाद बगल में ही मिठाई की दुकान थी। मैंने देखा कि गरमा-गर्म कचौड़ियाँ निकल रही हैं। मैं दुकान पर गया और
मिठाई वाले के साथ संवाद होता है……
मैं: भैया, ये कचौड़ियां कितने की हैं?
मिठाईवाला: ₹20 की।
मेरी नज़र सफ़ेद रसगुल्ले के बर्तन पर पड़ी, वहाँ रसगुल्ले के ऊपर एक मक्खी बैठी हुई थी।
मैंने कहा: भैया, मक्खी तो हटा दीजिए।
मिठाईवाला: अरे, पड़ा रहने दीजिए!
मैं एक कचौड़ी लेकर बाहर आ गया। मेरा मन था कि मैं एक सफ़ेद रसगुल्ला खा लूँ, पर मिठाई वाले के व्यवहार और उसकी साफ़-सफ़ाई को देखकर खाने का मन ही मर गया।
मैं शांत रहा। अब मैं दोबारा चाय पीने के लिए जाता हूँ। इस बार भी चाय वाले ने ₹5 की ही चाय दी। मैं चाय वाले के भाव से बहुत खुश हुआ।
इसके उपरांत मुझे दो लड़के मिले, जो मुझे अपना एडमिट कार्ड दिखाकर पूछते हैं कि,
"ज़रा इसको देखिए कि यही सेंटर है ना?" मैंने कहा, "हाँ।"
इसके बाद एक महिला मिलीं, जो लगभग 35 साल की रही होंगी। वह भी अपना परीक्षा केंद्र ढूँढ रही थीं। उन्होंने कहा, "भैया, इसका लोकेशन फ़ोन में डाल दो।" मैंने ऐसा ही किया। उनका परीक्षा केंद्र मेरे परीक्षा केंद्र से 1.5 किलोमीटर दूर ही था। मैंने उन्हें "All the Best" बोला और वह मुस्कुराते हुए चली गईं।
मै परीक्षा केंद्र के अंदर गया। वहां सत्यापन के बाद जो कुर्सी मुझे प्राप्त हुई, वहां पर मै बैठ गया। और खुद को शारीरिक और मानसिक स्तर पर खुद को शांत करने लगा। कुछ समय पश्चात एक लड़की मेरे आगे वाली कुर्सी पर आकर बैठ जाती है।
कक्ष नियंत्रक जो एक युवा महिला ही थी, वो मुझसे पूछती है,
आप कहां से आए हो? मै कहता हूं कि मैं लखनऊ से आया हूं। इस बात से आश्चर्यचकित होकर मेरी कुर्सी के आगे वाली पर बैठी वही लड़की जो कुछ समय पहले ही आई है, मुझसे पूछती है.....
लड़की: क्या तुम भी UP से हो?
मैं: मतलब तुम भी UP से हो?
लड़की: मैं गोरखपुर से आई हूं।
मै: मैं लखनऊ से आया हूं।
ऐसे ही अनौपचारिक बाते शुरू हुई तो पता चला कि वो लड़की अपनी मम्मी के साथ आई है जो अपने शारीरिक वजन के कारण चल भी नहीं पाती। बातो से पता चला कि वो अभी किसी सीबीएसई स्कूल में 25000 रुपए के वेतन पर शिक्षण कार्य करती है। मुझे पता चला कि उसका विषय अंग्रेजी साहित्य (English Literature) हैं। मेरा भी विषय अंग्रेजी साहित्य ही है। आज GS की परीक्षा है। कल शिक्षण विषय की परीक्षा होनी है। मैंने उससे पूछा कि कल आपका परीक्षा केंद्र कहां बना है? उस लड़की ने कहा कि उसका केंद्र सांगानेर बना है। मैने कहा मेरा भी सांगानेर बना है।
अब परीक्षा का समय आ गया था, प्रश्न पत्र भी आ गए थे। इसीलिए अब हम बात नहीं कर सकते थे। परीक्षा सकुशल संपन्न हुई। हम दोनों ने भी अपनी अपनी बुद्धिमत्ता के साथ परीक्षा संपन्न की।
परीक्षा देने के तुरंत बाद मैं साधन पकड़कर बिना एक मिनट बर्बाद किए मै अपने होटल वाले कमरे में आ गया। कमरे में जाने के पहले ही दुपहर का खाना खा लिया था। अब मैं कमरे में आराम करने लगा।
शाम के करीब 7:00 बजे का समय था। मैं अपने होटल से बाहर आया। इसके बाद मै टहलते–टहलते एक होटल में गया। जिस होटल में मै गया था वहां का पक्का नियम यह था कि एक थाली में जो कुछ खाने की सामग्री आयेगी वो एक ही बार आयेगी, उसके बाद दोबारा मांगने पर अतिरिक्त शुल्क देना पड़ेगा। मैने वेटर को बुलाया और कहा कि भैय्या मुझे बहुत जोर की भूख लगी है, एक काम करो 150 रुपए वाली थाली लगा दो।
वेटर का बड़ा दिल
मैंने वेटर से पूछा कि अगर कोई आइटम कम पड़ जाए तो क्या दोबारा नहीं दोगे? उसने कहा कि एक ही बार मिलेगा। मैने बड़े ही प्रेम से उससे कहा कि भैय्या जरा थोड़ा–सा देख लेना जो भी आइटम लाना बढ़ाकर ही लाना, भूख बहुत तेज लगी है।
थोड़ी देर बाद वेटर खाने की थाली लेकर लाया और मेरे सामने मेज पर रख दी। उसने धीरे से थाली रखते हुए कहा कि भाई सिर्फ तुम्हारे लिए अपने हाथों से पनीर के टुकड़े बढ़ा दिए है, सबको 2–3 पनीर के टुकड़े दिए जाते है, तुम्हारे लिए मैने 6–7 कर दिए है। मैंने उसका शुक्रिया अदा किया। जब मैं खाना खा रहा था, बीच में उसने मुझसे पूछा कि खाना कैसा बना है? मैने मुस्कुराते हुए और गर्दन हिलाते हुए, हां कहा।
इसके बाद मैंने आस-पास की सारी गलियाँ घूमीं, जहाँ मैं रुका हुआ था। मुझे ऐसा लग रहा था मानो मैं इस स्थान को पहले से ही जानता हूँ। आपको मैं एक सच बात बताऊँ, भले ही मैं अपने घर से काफी दूर था, परंतु मुझे घर की याद बिल्कुल भी नहीं आ रही थी।
इसके पश्चात मैं अपने कमरे में आया और सो गया। सुबह के ठीक 4:00 बजे मैं अचानक उठ गया। इसके बाद मैं नहा-धोकर तैयार हो गया। मुझे याद आया कि दोपहर के 12:00 बजे मुझे कमरे का चेक-आउट करना होगा, परंतु उस समय तो मैं परीक्षा दे रहा हूँगा। अगर मैं 12:00 बजे के बाद कमरे का चेक-आउट करता हूँ, तो मुझे अतिरिक्त शुल्क देना पड़ सकता है। इससे बचने के लिए मैंने अपना सारा सामान समेट लिया और सुबह ही रिसेप्शन पर पहुँच गया। मैंने अपना सामान वहीं रख दिया और कमरे का चेक-आउट कर दिया। फिर ज़रूरी सामान अपने साथ लेकर परीक्षा केंद्र की ओर बढ़ चला।
बस से आगे का सफर
मैं जयपुर की सिटी बस से दूरी तय करने लगा। बस कंडक्टर ने एक लड़के की तरफ इशारा करते हुए बताया कि, "यह भी वहीं जा रहा है, जहाँ तुम जाना चाहते हो।" कंडक्टर ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि मैंने उससे पूछा था कि क्या यह बस सांगानेर जाएगी, तो उसने बताया था कि नहीं, यह सांगानेर नहीं जाएगी, आपको दूसरा वाहन करना पड़ेगा।
वह लड़का मुझसे बोलता है, "चलो, साथ चलते हैं।" मैंने कहा, "ठीक है।"
बस से उतरने के बाद मैं समझ गया था कि वह भी परीक्षा देने ही जा रहा है। इसीलिए रास्ते भर हमारे बीच काफी बातचीत हुई। हम दोनों ऐसे घुल-मिल गए मानो एक-दूसरे को बहुत अच्छे से जानते हों। वह लड़का बार-बार अपने व्हाट्सएप पर खुद का लगाया हुआ स्टेटस देख रहा था, जो माता-पिता के दिए गए संस्कारों से संबंधित था।
इसके बाद हम दोनों परीक्षा केंद्र के अंदर गए। सत्यापन कराने के बाद मैं अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गया। मेरे बैठने के कुछ मिनट बाद ही वही लड़की, जो कल परीक्षा देने आई थी और जिससे मेरी बातचीत हुई थी, आज भी मेरे आगे की नियत कुर्सी पर आकर बैठ गई।
मैंने उसे "हाय" कहा, उसने भी "हाय" कहा। उसने कल की परीक्षा के बारे में पूछा कि कैसी हुई थी, परीक्षा? मैंने कहा, "परीक्षा अच्छी हुई थी।" इसके जवाब में मैंने भी उससे ठीक यही प्रश्न पूछा कि आपकी परीक्षा कैसी हुई थी, तो उसने कहा, "ठीक ही थी।"
मेरे दाएँ तरफ एक और लड़की बैठी हुई थी, जो गाज़ीपुर (UP) से थी। उसने भी कल की परीक्षा पर चर्चा शुरू कर दी।
इसी बीच दो नौजवान कक्ष निरीक्षकों का हमारे परीक्षा कमरे में आगमन होता है। हमारे बीच चल रही चर्चा में वे दोनों भी शामिल हो जाते हैं। वे दोनों भी हमसे काफी घुल-मिल गए। चर्चा के बीच पता चला कि वे दोनों राजस्थानी सरकारी शिक्षक हैं। उन्होंने पिछले वर्ष ही 3rd ग्रेड की परीक्षा पास की थी। वर्तमान में वे शिक्षक हैं।
चर्चा जारी थी, सभी लोग अपना-अपना दृष्टिकोण साझा कर रहे थे। मुझे खुद वहाँ बहुत कुछ सीखने को मिला।
कुछ समय बाद परीक्षा का समय हो गया, चर्चाएँ बंद हो गईं। हम सभी अब नियमों के तहत अपने-अपने दायरे में आ गए। परीक्षा के बीच में दोनों में से एक कक्ष निरीक्षक ने मुझे चाय भेंट की। मैंने उस भेंट को स्वीकार किया बिना किसी संकोच के। परीक्षा समाप्ति के बाद उन दोनों कक्ष निरीक्षकों ने बारी-बारी से पूछा कि, "
परीक्षा कैसी हुई?" मैंने कहा, "अच्छी हुई, सर।"
इसके बाद मैंने उनका शिक्षण स्थान पूछा, तो उन्होंने बताया, "
हमारा विद्यालय इस विद्यालय के बगल में ही है। आज हमारी ड्यूटी इसी विद्यालय में लगी है, हम तो बस ड्यूटी कर रहे हैं।"
यह वाक्या इतना आनंद और गरिमापूर्ण था कि जब मैं परीक्षा केंद्र से बाहर आया, तब मैं अंदर से बहुत ज्यादा ऊर्जावान और नई संभावनाओं को महसूस कर पा रहा था। मैं परीक्षा केंद्र के बाहर आ गया था। वह लड़का, जो आज सुबह सिटी बस में मिला था, वह फिर से मिल गया। उसने कहा, "आओ, साथ चलते हैं।" मैंने कहा, "ठीक है, भैया।"
हम दोनों ने पुनः सिटी बस ली और साथ में चल दिए। बस में भीड़ बहुत अधिक थी। अगर मैं आपको समझाने के लिए बताऊँ, तो भीड़ ऐसी थी जैसे चींटियों का झुंड बिना एक भी रिक्त स्थान छोड़े चल रहा हो।
वह लड़का बस में दूसरों से बात करने लगा, और मैं अपनी ही धुन में मस्त था। वह लड़का किसी दूसरे यात्री से बात करते हुए कह रहा था कि, "मेरे पापा ICU में हैं, अगले 3-4 दिनों में डॉक्टर घर भेजने की तैयारी में हैं।" मैं यह सब चुपचाप सुन रहा था। कुछ समय बाद उसका गंतव्य (स्टॉप) आने ही वाला था, तब उसने मुझसे कहा, "मित्र, अब हम चलते हैं।"
जैसे ही उसने मुझे "मित्र" कहा, वैसे ही मेरे अंदर भावुकता की एक लहर पूरे दिल-दिमाग में दौड़ गई। इस भावना को न तो पूरी तरह व्यक्त किया जा सकता है और न ही शब्दों में पिरोया जा सकता है। हम दोनों ने हाथ मिलाया और मुस्कुराते हुए एक-दूसरे से विदा ली।
जब वह मित्र बस से उतर गया, तब मैंने उस दूसरे लड़के (यात्री) से बात की, जिससे वह बात कर रहा था, और पूछा, "क्या उसके पापा ICU में हैं? क्या कोई गंभीर बीमारी हो गई है?" उस लड़के ने कहा, "हाँ, वह तो यही बता रहा था।"
मैंने मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना की कि उसके पापा जल्द से जल्द स्वस्थ हो जाएँ।
सच कहूँ तो, उस नए मित्र के साथ बिताए गए समय में मुझे उससे कोई विशेष लगाव महसूस नहीं हुआ था, परंतु जिस क्षण उसने मुझे "मित्र" संबोधित किया, उसी क्षण से एक गहरा आत्मिक लगाव हो गया और मैं भावुक हो उठा था।
इसके पश्चात मैं सीधे अपने होटल गया, जहाँ मैं रुका हुआ था। अपना सामान उठाया और जयपुर जंक्शन की ओर चलने लगा। जैसे ही मैंने 30-40 मीटर की दूरी तय की, वैसे ही वह गोरखपुर वाली लड़की और उसकी मम्मी दिख जाती हैं। मैं आराम से धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। जैसे ही मेरी नज़र उस लड़की पर पड़ी, उसी क्षण उस लड़की की नज़र भी मुझ पर पड़ी। उसने कहा, "यही है होटल, जहाँ मैं रुकी थी।" मैंने कहा, "अच्छा है, मैंने यह होटल देखा हुआ था।"
घर वापसी की तैयारी
मैंने उस लड़की से कहा, "मैंने तो चेक-आउट कर दिया है, मैं चला अपने घर।" मैंने उसे अंतिम बार "Bye" बोला। उसने भी अपना हाथ हिलाकर "Bye" किया और हमने अंतिम विदाई ली। यह पूरा प्रसंग मेरे चलते-चलते ही पूरा हुआ। मैं देख पा रहा था कि उसकी मम्मी थोड़ी आश्चर्यचकित दिख रही थीं। इसका कारण था कि मेरी बेटी को यहाँ कोई जानता नहीं, तो यह कौन लड़का है जो मेरी बेटी से बात कर रहा है!
मेरा उस लड़की के साथ एक पल भी बेवजह रुकना मेरी मर्यादा और आत्म-सम्मान के खिलाफ था, इसीलिए मैं रुका नहीं। मेरे पास समय था कि मैं 10-5 मिनट रुक सकता था, परंतु उसका तात्पर्य क्या निकलता?
उस लड़की से अंतिम विदाई के उपरांत, जब मैं स्टेशन की ओर बढ़ रहा था, तब मेरे हृदय में हल्का-सा धक्का लगा कि मैं जयपुर छोड़कर जा रहा हूँ, जिस शहर ने मुझे वास्तविक अर्थों में अकेलापन महसूस होने ही नहीं दिया। अब तक के जीवन में पहली बार ऐसा हुआ कि मेरी पहली ही यात्रा में जितने भी सह-यात्री मिले, वे सब के सब मेरे ही चरित्र का प्रतिबिंब थे।
जिस प्रकार प्रकृति के नियम अटल और सार्वभौमिक हैं, ठीक वैसे ही यह नियम भी अटल है कि सभी का एक निश्चित समय होता है और उसके बाद अंतोगत्वा गमन ही होता है जैसे मेरी वतन वापसी हो रही है।
मैं ठीक उसी क्रम में वतन वापसी कर रहा था, जैसा मैंने जयपुर आगमन के लिए क्रम निर्धारित किया था। 17 जुलाई की रात को आगरा की जैन धर्मशाला में रुककर, अगले दिन 18 जुलाई की सुबह लखनऊ के लिए रवाना हुआ। दोपहर तक मैं चारबाग स्टेशन पर पहुँचा। इसके पश्चात मैं आलमबाग बस स्टॉप से रायबरेली डिपो की बस में बैठकर अपने गाँव के लिए निकल पड़ा।
गांव वापसी
जैसे ही गांव के बस स्टॉप पर उतरा, वहाँ बह रही ताज़ी हवा अहसास करा रही थी कि बेटा, यह तुम्हारा ही गाँव है जहाँ तुम्हारा जन्म हुआ है। घर आकर सभी का आशीर्वाद लिया। सभी ने मेरा हाल-चाल पूछा और पूरी यात्रा कैसी रही, इसके बारे में जाना। मैंने भी उत्साहपूर्वक और मनोबल बढ़ाने वाले शब्दों में कहा कि, "मुझे कहीं पर भी रत्ती भर दिक्कत नहीं हुई।"
आज का दिन बहुत ही अच्छे से व्यतीत हुआ। माता के हाथ के पकवान वाह! क्या कहने, इतने दिनों बाद खाने को मिल रहे थे। मुझे परिवार से बहुत प्रेम मिला। आज मैं इतना खुश था कि रात भर बैठकर पूरे संस्मरण का ड्राफ्ट तैयार कर लिया, ताकि कोई भी घटना, जो हर लहज़े में महत्वपूर्ण है, कहीं भूल न जाऊँ।
अगले दिन वह हुआ जिसने मेरी पूरी यात्रा का अंतिम अध्याय लिख दिया। सुबह-सुबह का समय था। मेरी माता जी चाय बना रही थीं। मैं उनके पास गया और कुछ हल्की-फुल्की हँसी-मज़ाक करने लगा। तभी माता जी ने कहा, "जब से जयपुर गए हो, सारे संस्कार भूल गए हो! जब मैं फोन करती थी, तब फोन पर एक बार भी आशीर्वाद नहीं लिया।"
हंसी-मज़ाक का माहौल मेरे लिए आंतरिक तौर पर गम के बादल में बदल गया। मैं सब सुन रहा था, मेरे पास शब्द नहीं थे। आंखें नम हो गई थीं,इसलिए नहीं कि मैंने आशीर्वाद नहीं लिया, बल्कि इसलिए कि मैं कैसे अपने संस्कारों को भूल गया।
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