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100 Years of RSS: संघ का शताब्दी संदेश, संवाद से हिंदू-मुस्लिम एकता का नया क्षितिज

सार

1925 में डॉ. हेडगेवार ने संघ की नींव रखी थी। शुरुआती दशकों में इसका फोकस हिंदू समाज को संगठित करने पर रहा। लेकिन समय के साथ यह साफ हो गया कि भारत की ताकत केवल हिंदुओं में नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझी एकता में है।
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मोहन भागवत, आरएसएस प्रमुख - फोटो : ANI
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विस्तार
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल पूरे होने जा रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने शताब्दी वर्ष में ज्यादा से ज्यादा संवाद करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने नई दिल्ली के विज्ञान भवन में व्याख्यानमाला दी। भव्य हॉल में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत मंच पर पहुंचे, तो माहौल में अलग-सी गंभीरता थी।

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उनके शब्द सीधे दिल को छू रहे थे। उन्होंने कहा, 'भारत मुसलमानों के बिना अधूरा है। इस देश की आत्मा हमारी साझा संस्कृति है, किसी एक मज़हब की नहीं।' तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूंज उठा। यह दृश्य सिर्फ एक भाषण नहीं था, बल्कि उस बदलाव का प्रतीक था जिसकी ओर संघ अपनी शताब्दी यात्रा में कदम बढ़ा चुका है।

संघ के कार्यों ने डाली विश्वास की नींव 

1925 में डॉ. हेडगेवार ने संघ की नींव रखी थी। शुरुआती दशकों में इसका फोकस हिंदू समाज को संगठित करने पर रहा। लेकिन समय के साथ यह साफ हो गया कि भारत की ताकत केवल हिंदुओं में नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझी एकता में है।
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संघ के इतिहास में ऐसे कई मौके आए जब मुस्लिम समाज और संघ के बीच दूरी दिखाई दी। मगर जैसे-जैसे दशकों का सफर तय हुआ, संघ के कार्यों ने धीरे-धीरे विश्वास की नींव भी डाली।

मोहन भागवत ने 'संवाद' को केंद्र में रखा

भागवत ने संवाद पर फोकस किया। उनका मानना है कि संवाद से ही हर मुश्किल का हल होगा उन्होंने हाल के वर्षों में संवाद को केंद्र में रखा है। 2022 में उनकी मुलाकात ऑल इंडिया इमाम ऑर्गनाइजेशन के प्रमुख इमाम उमर अहमद इलियासी से हुई। इस मुलाकात में इलियासी ने भागवत को 'राष्ट्रपिता' कहकर संबोधित किया।

अजमेर दरगाह के सज्जादानशीन सैयद सलमान चिश्ती से संवाद ने धार्मिक नेताओं को भी जोड़ने का रास्ता खोला। भागवत का बयान, 'हिंदू और मुसलमान का पूर्वज एक है', कई बार चर्चा का केंद्र बना।

पूर्व चुनाव आयुक्त से मुलाकात

दिल्ली में हुई एक और अहम बैठक में भागवत ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी, वरिष्ठ पत्रकार सैफुद्दीन शेख और मुस्लिम बुद्धिजीवियों से बातचीत की। इस बैठक के बाद कुरैशी ने कहा था, 'हमने संघ प्रमुख से खुलकर बातचीत की। कई मुद्दों पर हमारी असहमति रही, लेकिन बातचीत से यह साफ हुआ कि हमें एक-दूसरे की सोच को समझने का मौका मिलना चाहिए।

संवाद ही रास्ता है।' यह मुलाकात इसलिए भी अहम थी क्योंकि पहली बार इतने उच्च स्तर पर मुस्लिम बुद्धिजीवियों और संघ प्रमुख के बीच टेबल पर गहन बातचीत हुई थी।

पूर्व संघ प्रमुखों की पहलें

संवाद की यह परंपरा केवल भागवत तक सीमित नहीं है। बाला साहब देवरस (तीसरे सरसंघचालक) ने 1975-77 के आपातकाल के बाद मुसलमानों से संवाद की पहल की थी और कहा था कि भारत की आजादी और एकता सभी धर्मों के सहयोग से ही संभव है।

के.एस. सुदर्शन (पांचवें सरसंघचालक) ने अपने कार्यकाल में मुस्लिम बुद्धिजीवियों को संगोष्ठियों में बुलाने की परंपरा शुरू की। यहां तक कि गुरुजी गोलवलकर भी विभाजन के बाद मुस्लिम समाज की सुरक्षा को लेकर कई मौकों पर चिंता जताते थे।

संघ की ओर से मदद के उदाहरण

संघ की छवि अक्सर केवल वैचारिक संगठन की बनी रही, लेकिन जमीनी स्तर पर इसके स्वयंसेवकों ने कई बार मुस्लिम समाज की सहायता की है। इन घटनाओं ने यह संदेश दिया कि सेवा का धर्म सबसे ऊपर है।

1. गुजरात भूकंप (2001): भुज और कच्छ के मुस्लिम बहुल इलाकों में राहत कार्यों के दौरान संघ स्वयंसेवकों ने मस्जिदों में भी राहत कैंप लगाए।
2. कोविड महामारी (2020-21): उत्तर प्रदेश और दिल्ली के कई मुस्लिम मोहल्लों में संघ के कार्यकर्ताओं ने दवा और राशन पहुँचाया। दिल्ली की जामा मस्जिद क्षेत्र में लगाए गए शिविर में मुस्लिम परिवारों ने खुले दिल से स्वयंसेवकों का स्वागत किया।
3. बाढ़ राहत (बिहार और असम): मुस्लिम बस्तियों में राहत सामग्री पहुंचाने के उदाहरण बार-बार सामने आए हैं।

समाज को जोड़ना है लक्ष्य, संवाद से बनेगा काम

विज्ञान भवन में आयोजित व्याख्यान माला में भागवत ने हिंदू-मुस्लिम को साथ रहकर चलने का संदेश दिया। उनका कहना है कि आपसी मतभेद को मिटाना होगा। इस दौरान उन्होंने एक और महत्वपूर्ण बात कही, 'हमारी ताकत विविधता है। अगर हिंदू और मुसलमान मिलकर आगे बढ़ें, तो भारत को कोई ताकत रोक नहीं सकती।'

यह बयान केवल भाषण का हिस्सा नहीं था, बल्कि संघ के भविष्य का रोडमैप था। आज जब संघ अपनी शताब्दी यात्रा में है, तो उसके सामने सबसे बड़ा लक्ष्य केवल शाखाएं बढ़ाना या संगठन का विस्तार करना नहीं, बल्कि समाज को जोड़ना है। मुस्लिम समाज से संवाद इसी दिशा में सबसे अहम पहल साबित हो रहा है। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मुस्लिम समाज का रिश्ता कभी दूरी, कभी अविश्वास और अब संवाद की यात्रा से गुजरा है। मोहन भागवत की पहलें, पूर्व चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी जैसे बुद्धिजीवियों से मुलाकातें, और सेवा कार्यों के उदाहरण इस बात की गवाही हैं कि दीवारें टूट रही हैं। अगर संवाद जारी रहे, तो भारत का भविष्य केवल मजबूत ही नहीं, बल्कि समरस और विश्व के लिए मिसाल बन सकता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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