इस साल राष्ट्रवादी सोच और हिंदुत्व का पैरोकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही अपनी स्थापना की शताब्दी नहीं मना रहा है, बल्कि उसी के समानांतर ‘जन’ वादी सोच और साम्यवादी विचार के आधार पर समाज को बदल डालने का सपना पालने वाली ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) भी अपनी संस्थापना की एक सदी पूरी कर रही है।
हालांकि संघ एक सांस्कृतिक सामाजिक एनजीओ है और सीपीआई पूरी तरह एक राजनीतिक दल है। दोनों की शुरुआत दो अलग-अलग चश्मों से सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन के सपनों के साथ हुई थी। दोनों ने इन सौ वर्षों में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं लेकिन संघ बहुसंख्यक हिंदुओं के वर्चस्व की सामाजिक-राजनीतिक पैरोकारी और पहरेदारी करके अपनी राजनीतिक शाखा भाजपा के माध्यम से आज सत्ता शीर्ष पर पहुंच गया है।
संघ और वामपंथ
आज वो देश में एक निर्णायक शक्ति है, भले ही उसकी विचारधारा और कार्यशैली से कुछ लोग असहमत हों। जबकि सीपीआई जो 61 साल पहले वैचारिक झुकावों के चलते दो फाड़ हो गई थी, आज अपने वजूद को बचाने की यथा संभव कोशिश कर रही है। ऐसा क्यों हुआ, इस पर गंभीर विचार जरूरी है क्योंकि संघ जहां सदा ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ की बात करता रहा है, वहीं सीपीआई अर्थात वामपंथी हमेशा ‘जन’ को प्राथमिकता देते रहे हैं।
उनका अपना आर्थिक दर्शन है और राष्ट्र की तुलना में ‘अंतरराष्ट्र’ उन्हें ज्यादा प्रिय है। फिर भी संघ और सीपीआई की विचारधाराएं अगर विपरीत हैं तो इसके पीछे एप्रोच और मानसिकता का भी फर्क है। संघ के आग्रह के पीछे अनुभव जन्य भावुकता, आशंका और हिंदू समाज तथा प्रकारांतर से भारत राष्ट्र के अस्तित्व की चिंता है तो वामंपथियों का मानना है कि यदि ‘जन’ ही सुखी नहीं है तो राष्ट्र का महिमागान खुद को धोखा देने जैसा है।
दो अलग-अलग विचारधाराएं
इसमें यह तय करना मुश्किल है कि पहले अंडा या मुर्गी। क्योंकि ‘राष्ट्र’ सुरक्षित समृद्ध नहीं होगा तो उसके ‘जन’ भी सुखी कैसे रहेंगे?
संघ मानता है कि वामपंथी विचार पश्चिम से आयातित है और उसकी प्राथमिकताएं भारतीय समाज के अनुकूल न होकर पश्चिमी समाज के हिसाब से हैं, जबकि वामियों का तर्क है कि संघ जो सोचता और करता है वह प्रतिगामी, पुरातनपंथी और देश के बहुसांस्कृतिक, बहुभाषी स्वभाव के विरूद्ध है।
संघ का मानना है कि बेशक यह देश बहुसांस्कृतिक बहुभाषी, बहुजातीय है, लेकिन इसका मूल स्वर और चरित्र हिंदू ही है। इसे नाम चाहे भारतीय या कुछ और दे दें। इस हिसाब से हिंदू केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान ही नहीं है, वह वह बहुसंख्यकों की राजनीतिक अस्मिता का द्योतक भी है।
संघ का स्पष्ट मानना है कि जब तक भारत में हिंदू मजबूत है, भारत और उसकी सांस्कृतिक पहचान अक्षुण्ण है। जब- जब हिंदू कमजोर हुआ है, भारत खंडित हुआ है, भले ही उसके तात्कालिक कारण कुछ भी हों। इसके विपरीत वामपंथियों की सोच है कि भारत के विखंडन की बात केवल हिंदुओं के मन में भय पैदा करने और उनकी जमीनी दुश्वारियों एवं वास्तविक अंतर्विरोधों से ध्यान हटाने की कोशिश है।
अलग-अलग होकर भी समानताएं
वैसे संघ और वामियों में कुछ समानताएं भी हैं। पहला तो ये कि दोनों का सफर लगभग आसपास ही शुरू हुआ। संघ की स्थापना 27 अक्टूबर 1925 को विजयादशमी के दिन नागपुर में हुई तो सीपीआई की स्थापना कानपुर अधिवेशन में 26 दिसंबर 1925 को की गई। यानी दो वैचारिक आंदोलन लगभग एक साथ शुरू हुए। दोनों ही देश की तत्कालीन राजनीतिक मुख्य धारा कांग्रेस की कार्यशैली से अलग सोच रखते थे।
सीपीआई की स्थापना के पीछे 1917 में रूस में हुई सोवियत क्रांति की प्रेरणा थी तो संघ के आरंभ के पीछे प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय शक्तियो के ध्रुवीकरण और कांग्रेस के ज्यादा मुस्लिमपरस्त होने से उपजी नाराजी बड़ा कारण था। चूंकि उस वक्त भारत पर ब्रिटिश शासन था, इसलिए दोनों का ही सफर आसान नहीं था।
उसमें भी कम्युनिस्टों को अंग्रेज दुश्मन नंबर वन मानते थे। तब वामपंथियों का मानना था कि इस देश में क्रांति केवल सशस्त्र विद्रोह से ही आ सकती है। क्रांति की राह में धर्म की कोई भूमिका नहीं है। जबकि संघ का मानना था कि आजादी तो देर सवेर मिलेगी ही, हमे उसकी सुरक्षा के बारे में भी अभी से सोचना चाहिए। स्वतंत्र देश में हिंदुओं का वर्चस्व होना चाहिए। जिन परिस्थितियों और जिस रूप में भारत को आजादी मिली, उससे दोनों ही खुश नहीं थे, लेकिन बाद में दोनो ने भारत में संवैधानिक बहुदलीय लोकतंत्र को स्वीकार कर लिया।।
अपनी वैचारिक सोच के मुताबिक आजादी के तत्काल बाद कम्युनिस्टों ने तेलंगाना में जमींदारों के खिलाफ पहला सशस्त्र विद्रोह किया, जिसे कुचल दिया गया। सीपीआई तो बाद में मुख्य धारा में शामिल हो गई, लेकिन उसके अनुशांगिक संगठन अभी भी किसी न किसी रूप में सशस्त्र और हिंसक गतिविधियां संचालित करते रहते हैं।
अब संघर्ष और विस्तार के सौ वर्षों बाद दोनों की तुलनात्मक स्थिति पर नजर डालें कि कौन कहां खड़ा है?
हालांकि इसका मकसद कोई अंतिम फैसला देना नहीं है, केवल जमीनी सच्चाई का आकलन है। पहले आरएसएस की बात। इसकी स्थापना डॉ केशव बलिराम हेडगेवार ने की। हेडगेवार पहले कांग्रेस में ही थे। लेकिन गांधीजी के मुस्लिम प्रेम के कारण उनका कांग्रेस से मोहभंग हो गया और उन्होंने पश्चिम में उभरते राष्ट्रवाद से प्रेरित होकर एक नए संगठन आरएसएस की नींव रखी। जिसका लक्ष्य हिंदू संस्कृति, धर्म और परंपराओं की रक्षा और इसे ही भारत का मूल चरित्र आधार मानना था।
संघ का स्पष्ट मत है कि भले ही भारत बहुसांस्कृतिक, बहुभाषी देश हो, लेकिन उसकी आत्मा हिंदुत्व में बसती है। हिंदू होना और हिंदुत्व में विश्वास करना ही इस भारत देश की एकता और अखंडता की गारंटी है।