कल यानी मंगलवार को उत्तराखंड के अपदस्थ मुख्यमंत्री हरीश रावत को इसका पता चल जाएगा कि उन्हें कुर्सी वापस मिलती है या नहीं। विधानसभा में शक्ति परीक्षण का नतीजा चाहे जिसके भी पक्ष में जाए, लेकिन एक बार फिर बोम्मई फैसले को मान्यता मिली है कि विधानसभा का सदन ही वह जगह है, जहां यह साबित किया जा सकता है कि सरकार ने अपना बहुमत खो दिया है या उसे सत्ता में बने रहने का हक है। यदि थोड़ी देर के लिए हम यह मान भी लें कि भारतीय जनता पार्टी कांग्रेसी खेमे के कुछ विधायकों को तोड़ने और हरीश रावत को हराने में कामयाब हो जाती है, तो भी इसमें कोई संदेह नहीं कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत राज्य विधानसभा को बहाल करना ही राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की अस्वीकृति का संकेत है।
यह तो बस वक्त की बात है कि कब अदालत यह टिप्पणी करे कि जिस तरह से भाजपा सरकार ने उत्तराखंड सरकार को अस्थिर कर वहां राष्ट्रपति शासन लगाया, वह असांविधानिक था। यह केंद्र सरकार के लिए एक बहुत ही कठोर वैधानिक अभियोग होगा और बताएगा कि भाजपा भी लगातार संविधान के अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग कर रही है।
आगे बढ़ने से पहले यहां मैं अतीत की एक कहानी बताना चाहूंगा। वर्ष 1998-99 में जब केंद्र में वाजपेयी सरकार थी और अक्सर आंतरिक कलह से जूझ रही थी, तब एक वरिष्ठ नेता ने उखाड़-पछाड़ में निपुण अपनी ही पार्टी के एक नेता को फटकारते हुए कहा था कि ‘भाजपा एक अलग तरह की पार्टी है, इस दावे को आप इतना तूल क्यों दे रहे हैं? भगवा रंग के साथ हम एक दूसरी कांग्रेस भी बन सकते हैं।’ उससे कुछ वर्ष पहले 1991 का लोकसभा चुनाव संपन्न होने के तुरंत बाद भाजपा के के एन गोविंदाचार्य पत्रकारों को अपने आकलन का ब्योरा दे रहे थे। जब उन्होंने भाजपा की प्रगति के बारे में दावा किया, तो हममें से किसी पत्रकार ने उनसे एक सीधा सवाल किया, ‘तो क्या आप कांग्रेस की जगह लेंगे?’ इसका जवाब देते हुए गोविंदाचार्य ने कहा था, अरे बाबा, हम कांग्रेस की जगह नहीं लेंगे, हम दूसरी कांग्रेस बन जाएंगे! उनका वह मजाक सुनकर वहां उपस्थित लोग हंस पड़े थे। पर जिस तरह की घटनाएं हो रही हैं, उनसे लगता है कि वह कोई मजाक नहीं था। कम से कम अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग के मामले में भाजपा जरूर दूसरी कांग्रेस बन गई है। जनवरी में अरुणाचल प्रदेश में ऐसा ही नाटक हुआ था, जो पूरे एक महीने तक चला। उत्तराखंड में घटनाक्रम की शुरुआत मार्च में हुई थी, जो अब तक जारी है। अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड, दोनों जगह केंद्र के हस्तक्षेप और राज्य सरकार की बर्खास्तगी को उचित ठहराने का तर्क संदिग्ध था। अरुणाचल प्रदेश में बाद के घटनाक्रम में बिल्कुल वही हुआ, जिसकी आशंका थी-बागी कांग्रेसी नेता कलिखो पुल 18 बागी कांग्रेसी विधायकों के साथ मुख्यमंत्री बने और उन्हें दो निर्दलीय एवं 11 भाजपा विधायकों को बाहरी समर्थन मिला।
पूर्वोत्तर के राज्य में वही पटकथा दोहराई गई, जो पहले भी होता था। कांग्रेस जब केंद्र में सत्ता में थी, तो उसने कभी राज्य इकाइयों को पार्टी की मुख्यधारा से नहीं जोड़ा, बल्कि आसामी के रूप में इस्तेमाल ही किया। यह रिश्ता मुख्यतः लेन-देन पर ही आधारित था। राज्य इकाइयां केंद्र से धन चाहती थीं और कांग्रेस कुछ सांसदों को संसद में भेजने के लिए उनका समर्थन चाहती थी। भाजपा ने भी अरुणाचल प्रदेश में संरक्षक-आसामी वाली वही शैली अपनाई। मणिपुर में भी ऐसी ही स्थिति बनाने के लिए काम शुरू हो चुका था, पर राज्य सरकार को गिराने से पहले भाजपा में थोड़ी चेतना जागी और उसने अपने कदम वापस खींच लिए।
उत्तराखंड में भाजपा ने कांग्रेसी सरकार को गिराने के लिए दलबदल को बढ़ावा दिया, लेकिन फिर संकेत दिया कि वह सरकार बनाने की इच्छुक नहीं है। जाहिर है, बागी कांग्रेसी नेता कहीं के नहीं रहे। वे जानते हैं कि अब पीछे नहीं लौट सकते। वे इस बात से भी वाकिफ हैं कि असम की तरह भाजपा में जगह पाना उनके लिए आसान नहीं होगा, जहां भाजपा छोटी पार्टी थी और नए नेताओं के लिए जगह थी। यहां ध्यान रखना चाहिए कि असम में भाजपा के दोनों महत्वपूर्ण नेता-सर्बानंद सोनोवाल और हेमंत बिस्वा शर्मा क्रमशः असम गण परिषद और कांग्रेस से निकलकर उसमें शामिल हुए। इसके विपरीत उत्तराखंड में भाजपा सत्ता में रही है, जहां हर स्तर पर उसके पास स्थापित नेता हैं और वे इस बात की इजाजत नहीं देने वाले कि कांग्रेस के दलबदलू नेता अपने समर्थकों के साथ पार्टी में आकर चुनाव के समय पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ें और जिला संगठनों में विभिन्न पदों पर काबिज हो जाएं। इससे कांग्रेस के बागी नेताओं को अपने खेमे में बनाए रखना भाजपा के लिए पूरी तरह से नामुमकिन न सही, मुश्किल जरूर होगा।
उत्तराखंड के घटनाक्रम ने राजनीतिक पंडितों को भी हैरान कर दिया है, क्योंकि राज्य में विधानसभा का चुनाव 2017 की पहली तिमाही में होना है। ऐसी स्थिति में सरकार गिराकर राष्ट्रपति शासन लागू करना और बागी कांग्रेसी नेताओं को मंझधार में छोड़ देना गलत है। यह पूरा घटनाक्रम दिग्गज भाजपा नेता और वित्त मंत्री अरुण जेटली के लिए भी झटके से कम नहीं है, जिन्होंने फेसबुक पर एक लंबी टिप्पणी की थी और तर्क दिया था कि अनुच्छेद 356 के कार्यान्वयन का इससे बेहतर उदाहरण नहीं हो सकता। सचमुच, वक्त के पहिये ने एक पूरा चक्कर लगा लिया है। भाजपा नेता संविधान के उसी प्रावधान के इस्तेमाल को उचित ठहरा रहे थे, जिसकी आलोचना विपक्ष में रहने पर वह वर्षों से करते आए थे! हरीश रावत बहुमत हासिल कर पाएं या नहीं, लेकिन उत्तराखंड के घटनाक्रम ने साबित कर दिया है कि भाजपा दूसरी कांग्रेस बन गई है, जिस बारे में उनके नेताओं ने कभी आशंका जताई थी।
-वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक