जमायत-ए-इस्लामी के प्रमुख मोतिउर रहमान निजामी को फांसी देने के बाद से बांग्लादेश में तनाव और बढ़ गया है। कट्टरपंथियों द्वारा अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने की घटनाएं वहां बढ़ती जा रही हैं। पहले ही देश में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों, धर्मनिरपेक्ष ब्लॉगरों, बुद्धिजीवियों और विदेशियों की हत्याओं का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा। इस साल के शुरुआती चार महीनों में ऐसी दस वारदातें हो चुकी हैं, जबकि पिछले साल ऐसी केवल तीन घटनाएं हुई थीं। वर्ष 2013 के बाद से लगभग ऐसे 37 जानलेवा हमले हो चुके हैं मगर अब तक केवल एक मामले में अदालत का फैसला आया है और चार अन्य में आरोपपत्र दाखिल हुए हैं। ऐसा लगता है कि बांग्लादेश भी पाकिस्तान जैसा बनता जा रहा है।
ऐसी घटनाओं के बढ़ने की एक वजह दहशतगर्दी के मामलों की जांच में ढिलाई और अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के बजाय नरमी है। इन घटनाओं को अंजाम देने वालों में से ज्यादातर का संबंध उस जमायत-ए-इस्लामी से है, जिसे पाकिस्तान का हमदर्द माना जा रहा है। आम ख्याल यह है कि शेख हसीना सरकार के पास उग्रवाद के खात्मे के लिए कोई ठोस रणनीति नहीं है। ऐसे तत्वों के खिलाफ युद्ध स्तर पर जवाबी कार्रवाई करने के लिए संसाधनों की कमी भी एक कारण है।
बांग्लादेश में अल कायदा की मौजूदगी है ही, अब वहां आईएस (इस्लामिक स्टेट) भी पैर जमाने की कोशिश कर रहा है। इस बीच उसने कुछ उदारवादियों की हत्याओं की जिम्मेदारी भी ली है। जबकि शेख हसीना इसके वजूद से इन्कार करती हैं और बढ़ती कट्टरता के लिए विरोधी पार्टी बीएनपी और जमायत-ए-इस्लामी को जिम्मेदार बताती हैं।
गौरतलब है कि वर्ष 2013 में डिफेंडर ऑफ इस्लाम नाम की संस्था ने ऐसे 84 उदारवादी बांग्लादेशी विद्वानों, कार्यकर्ताओं और ब्लॉगरों की एक सूची बनाई थी, जिसे उसने सरकार को भेजा भी था। अगर सरकार ने उस सूची को गंभीरता से लेकर उन लोगों की सुरक्षा पर ध्यान दिया होता, तो कट्टरवादी शायद अपने मंसूबों में सफल नहीं हो पाते। बांग्लादेश में कट्टरवाद के बढ़ने का एक और कारण है। वर्ष 1988 में वहां संविधान में आठवां संशोधन विधेयक पारित हुआ था, जिसमें इस्लाम को राजकीय धर्म का दर्जा दिया गया था। इस प्रावधान को कुछ धर्मनिरपेक्ष कार्यकर्ताओं ने अदालत में चुनौती दी थी। अब 28 साल पुरानी इस याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया है। यानी बांग्लादेश अब एक धर्मनिरपेक्ष देश नहीं रहेगा।
वहां अल्पसंख्यकों के हितों पर नजर रखने वाली एक संस्था 'हिंदू-बौद्ध-ईसाई ऐक्यो परिषद' की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, अकेले 2015 में अल्पसंख्यक समुदायों के 24 लोगों को मार डाला गया, 20 महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ और 1,500 से ज्यादा परिवार जुल्म और ज्यादती के शिकार हुए। वहां अल्पसंख्यकों के धर्मस्थलों पर तोड़-फोड़ की घटनाएं तो होती ही रहती हैं।
पर सच यही है कि अल्पसंख्यकों और उदारवादियों की हत्याओं से दुनिया भर में बांग्लादेश की छवि धूमिल हो रही है। उसकी छवि भी पाकिस्तान जैसी बनने लगी है, जहां स्वतंत्र विचारों के लिए कोई जगह नहीं है। हालात और खराब न हों, इसके लिए सरकार को ठोस कदम उठाने होंगे। मौजूदा स्थिति से निपटने के लिए बांग्लादेश ने भारत से भी मदद मांगी है। आने वाले दिनों में वहां कट्टरवादी हिंसा पर अंकुश लग पाता है या नहीं, यह देखने वाली बात होगी।