बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एवं वहां के लोग संपूर्ण शराबबंदी अभियान को कामयाब बनाने में लगे हैं, तो पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में शराब के कारण कई घरों में मातम छाया हुआ है। ताजा घटना उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले की है, जहां नशे में धुत्त ड्राइवर ने सांस्कृतिक कार्यक्रम देख रहे गांव वालों पर अपनी कार दौड़ा दी, जिसमें आठ लोगों की मौत हो गई और लगभग 35 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। थानाध्यक्ष के अनुसार, पुलिस ने कार से शराब की कई बोतलें जब्त की हैं। स्थानीय लोगों ने बताया कि कार में सवार सभी पांच युवक नशे में धुत्त थे। वे किसी वैवाहिक कार्यक्रम से लौट रहे थे। तेज रफ्तार होने के कारण कार बेकाबू हो गई और सड़क पर नृत्य का आनंद ले रहे दर्शकों की भीड़ को रौंद डाला। नशे में पागल व्यक्ति द्वारा यह कोई पहली घटना नहीं है और न ही आखिरी होगी।
भारत में तकरीबन 400 व्यक्ति प्रतिदिन सड़क हादसों में मारे जा रहे हैं और इनमें से अधिकर दुर्घटनाएं ड्राइवर के नशे में होने के कारण होती हैं। लंबी चौड़ी सड़कें बन गईं, डिवाडर बन गए, ट्रैफिक व्यवस्था में सुधार भी हो गया, फिर भी सड़क दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। जबकि संरचनात्मक एवं तकनीकी सुधार के बाद तो इसमें कमी होनी चाहिए थी। किंतु ऐसा नहीं हो रहा। जब तक नशे का कारोबार चलता रहेगा, इस तरह के दर्दनाक हादसे एवं मौतें रुकने वाली नही हैं।
शराबबंदी के नाम पर केंद्र एवं राज्य सरकारें राजस्व हानि का रोना रोने लगती हैं। उनका कहना है कि शराब बिक्री से बड़े पैमाने पर राजस्व प्राप्त होता है, जिससे तमाम विकासात्मक कार्य करने में मदद मिलती है। दूसरा, इससे हमारा पर्यटन उद्योग प्रभावित होगा और विदेश में हमारी छवि रूढ़ीवादी देश के रूप में स्थापित होगी। कुल मिलाकर उनके अनुसार, शराबबंदी होने पर हम विकास की दौड़ में पिछड़ जाएंगे। पश्चिम से लिए गए विकास के इस मॉडल में उपभोग को ही जीवन मान लिया गया है। पश्चिमी विकास का मॉडल वैसा ही है, जैसे रेगिस्तान में धान की फसल बोना।
पिछले दिनों हमारे एक साथी वाराणसी के एक नामी अस्पताल में अपनी भाभी का इलाज करा रहे थे, इस दौरान उन्होंने लगभग एक महीना अस्पताल में बिताया था। उसी दौरान चंदौली के आसपास का एक नौजवान, जो अपनी किसी रिश्तेदार को खून देकर लौट रहा था, सड़क दुर्घटना का शिकार हो गया। उसकी याद्दाश्त चली गई थी। छानबीन करने पर उन्हें पता चला कि शाम को पार्टी हुई थी, जिसमें उसे शराब पिलाई गई थी। ड्राइविंग करते वक्त वह नशे में था। हादसे के बाद वह कोमा में चला गया। घर-परिवार वाले सब कुछ दांव पर लगाकर किसी भी हालत में उसे बचाना चाहते थे, पर मजबूरन उन्होंने वेन्टिलेटर हटवाया और एक स्वस्थ युवक को असमय अपने परिवार को रोता छोड़ जाना पड़ा। उसके तीन छोटे-छोटे बच्चे हैं। पत्नी सीधी-साधी, अनपढ़ तथा पूरी तरह से पति पर निर्भर थी। अब वह बच्चों का पालन-पोषण के लिए हाड़तोड़ मेहनत भी करे, तो जीवन भर समाज की नजरों में बेचारी, बेबस एवं लाचार बनी रहेगी।
कुल मिलाकर शराब और हर तरह के नशे पर जब तक पूरी तरह रोक नहीं लगती, ऐसे हादसे एवं मौतें होती रहेंगी। बिहार में शराबबंदी लागू होने के एक महीने के दौरान ही जघन्य अपराधों में 27 फीसदी की कमी आई है। केंद्र और राज्य की सरकारों को चाहिए कि वे नशे से संबंधित हर तरह के उत्पादों पर पूरी तरह पाबंदी लगाएं।
लेखक नशामुक्ति अभियान के राष्ट्रीय संयोजक हैं