फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

फिर डरावना बनता जा रहा है बिहार

Wed, 18 May 2016 08:38 AM IST
अवधेश कुमार
विज्ञापन
अवधेश कुमार
विज्ञापन
बिहार के सीवान जिले में एक वरिष्ठ पत्रकार की सरेशाम हत्या हो गई और यह खबर राष्ट्रीय सुर्खियों में है। इसी तरह जदयू की एक महिला विधान पार्षद के पुत्र ने एक नौजवान को गोली मार दी और इस पर भी देशव्यापी चर्चा हो रही है। ये सब तो वे घटनाएं हैं, जो हमारे-आपके सामने आ गईं। वस्तुतः यह सच है कि पिछले कुछ महीनों से बिहार में अपराध ने एक-एक व्यक्ति के अंदर खौफ पैदा किया है। शब्दों में जाने की आवश्यकता नहीं। 'जंगल राज' या ऐसे शब्द से यदि किसी को आपत्ति है, तो उसका प्रयोग न किया जाए, लेकिन क्या यह सच नहीं है कि बिहार में पिछले करीब छह महीने में जघन्य अपराध, खासकर हत्याओं से पूरा राज्य हिला हुआ है? क्या यह सच नहीं है कि देर हो जाने पर लोग गांव लौटने की जगह शहर में ही कहीं रुक जाने की कोशिश करते हैं कि पता नहीं रास्ते में कोई गोली न मार दे? क्या यह सच नहीं है कि कारोबार करने वाले इस भय में रहते हैं कि कौन किस समय धमक जाए और रंगदारी के रूप में मोटी रकम की मांग करे और न देने पर मार दे या दूसरे परिणाम भुगतने की धमकी दे? इस स्थिति को आप कोई भी नाम दे दीजिए, उससे अंतर नहीं आता, जो भयावह सच बिहार का है, वह हमारे सामने है।
विज्ञापन


90 के दशक में अपहरण, लूट, हत्या, सड़क लूट जिस तरह राज्य में सामान्य घटनाएं बन गई थीं, बिहार ठीक उसी ओर लौट रहा है। यह दुखद है कि इसे स्वीकारने की जगह दूसरे राज्यों के अपराधों से इसकी तुलना की जा रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इरादे पर संदेह की गुंजाइश नहीं है, लेकिन वह स्थिति को संभाल नहीं पा रहे हैं। जो लोग सच को नकार रहे हैं, वे न भूलें कि 20 नवंबर, 2015 को नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और उसके दूसरे दिन यानी 21 नवंबर को उन्होंने उच्चाधिकारियों के साथ पहली बैठक कानून व्यवस्था पर ही ली। क्यों? अगर स्थिति विकट नहीं होती, तो वैसा क्यों करते। उसके बाद दिसंबर में जब दरभंगा में एक ही दिन दो इंजीनियरों की रंगदारी न देने के कारण हत्या हो गई, दूसरे दिन रिलायंस के एक इंजीनियर को इसी कारण गोली मारी गई तथा चार दिन में कुल मिलाकर ऐसी आठ हत्याएं हुईं, तो मुख्यमंत्री ने फिर बैठक ली तथा प्रदेश के सभी वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस की। ये दो उदाहरण जहां इस बात के प्रमाण हैं कि मुख्यमंत्री अपराधों को रोकने के लिए गंभीर हैं। वहीं इससे यह भी पता चलता है कि किस तरह पानी सिर से ऊपर जा चुका है।

बिहार अकेला राज्य है, जहां अपराधी गुट माओवाद के नाम पर सरेआम लोगों को धन देने के लिए चिट्ठियां लिखते हैं, फोन करते हैं और लोग जाकर उनके यहां धन पहुंचाते हैं। यह हर जिले की पुलिस के संज्ञान में हो रहा है।
विज्ञापन


गया की घटना का ही उदाहरण लीजिए। अब तो यह स्पष्ट हो गया कि विधान परिषद की सदस्य मनोरमा देवी के पति पर कई दर्जन जघन्य अपराध के मुकदमे हैं। प्रश्न है कि नीतीश कुमार ने मनोरमा देवी को विधान पार्षद क्यों बनाया? मुख्यमंत्री शराबबंदी को अपना यूएसपी बना रहे हैं और उनकी विधान परिषद सदस्य के घर से शराब बरामद हुई है। बहरहाल, बिहार को बचाना आवश्यक है। ऐसे अपराधों से मुक्त करने के लिए सरकार पर जितना संभव हो, दबाव बनाया जाए।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें