छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी और मायावती के मिलन पर चुनावी चर्चाएं जोरों पर हैं। मायावती और जोगी के बीच हुए गठबंधन में 35 सीटें बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के खाते में आई हैं और 55 सीटें जनता कांग्रेस को मिली हैं।
छत्तीसगढ़ आदिवासी बहुल राज्य है, यहां बसपा के पास दलित मतदाताओं का खासा समर्थन है। ऐसे में ये कांग्रेस को बसपा से अलग चुनाव लड़ने का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। सियासी गलियारों में चर्चा ये भी है कि कांग्रेस को इस गठजोड़ से एक-डेढ़ दर्जन सीटों का नुकसान हो सकता है।
आपको बता दें कि बसपा संस्थापक कांशीराम ने अपनी सियासी पारी का आगाज भी छत्तीसगढ़ से ही किया था। 1984 के आम चुनाव में कांशीराम ने जांजगीर लोकसभा सीट पर एक निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था, हालांकि इस चुनाव में उन्हें सिर्फ 8.81 फीसदी वोट मिले थे और करारी शिकस्त झेलनी पड़ी थी।
1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ ने नए राज्य के रूप में जन्म लिया। 2003 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में बसपा ने 54 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिनमें उसे सिर्फ 2 सीटों पर ही जीत हासिल हुई। 2013 के चुनाव में बसपा ने सभी 90 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन इस चुनाव में उसका वोट प्रतिशत और भी कम हो गया उसके टिकट पर एक ही विधायक निर्वाचित हो पाया।
दिलचस्प बात यह है कि मायावती और अजीत जोगी दोनों ही अनुसूचित जातियों के मसीहा होने का दावा करते हैं। छत्तीसगढ़ की जनसंख्या के आधार पर देखा जाए, तो यहां 10 सीटें अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हैं, जिसमें से 9 पर मौजूदा समय में कमल खिला हुआ है। बची हुई एक सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार ने जीत दर्ज की थी। अब ऐसे में यह नया गठजोड़ किसी भी तरह का कमाल करता है तो भाजपा को नुकसान होने की आशंकाएं बढ़ जाती हैं।